शराबबंदी का धर्मसंकट - पीने वालों के लिए मायूसी, तस्करों के लिए उम्मीद का नया दरवाजा?

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार में शराब चाहने वालों के लिए यह समय निश्चित रूप से निराशा का है, लेकिन शराब की तस्करी करने वालों के लिए शायद खुशी का सागर है। पिछले कुछ महीनों से शराबबंदी को लेकर जिस तरह की आर्थिक चर्चाएं और रिपोर्टें सामने आती रही हैं, उनसे यह उम्मीद जरूर बनी थी कि सरकार शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था में कोई व्यावहारिक बदलाव कर सकती है। शराब के वैध कारोबार को सीमित रूप में खोलने, राजस्व बढ़ाने और अवैध तस्करी पर लगाम लगाने की संभावनाओं पर बहस होती रही है। लेकिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शराबबंदी में किसी तरह की ढील की संभावना को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने आर्थिक नुकसान की कीमत स्वीकार करने का संकेत भी दिया है। यहीं से प्रश्न पैदा होता है कि सरकार आखिर किस धर्मसंकट में फंसी हुई है? क्या यह केवल शराबबंदी बनाम शराब की लड़ाई है? या फिर यह उस राजनीतिक विरासत, महिला सम्मान, सरकारी राजस्व, सामाजिक सुरक्षा और जनता के भरोसे के बीच चल रहा संघर्ष है, जिसमें हर रास्ता किसी न किसी सवाल को जन्म देता है?


शराब से मिलने वाला संभावित राजस्व बिहार के लिए मामूली रकम नहीं है। करीब 20 हजार करोड़ रुपये सालाना राजस्व के नुकसान की चर्चा जब होती है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इतनी बड़ी राशि को सरकार आखिर कब तक छोड़ सकती है? 20 हजार करोड़ रुपये का अर्थ केवल सरकारी खाते में आने वाली रकम नहीं है। यह रकम सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, रोजगार, आधारभूत संरचना और कल्याणकारी योजनाओं में लग सकती है। राज्य के सीमित संसाधनों वाले बजट में इतनी बड़ी राशि की अपनी महत्ता है। लेकिन दूसरी तरफ सरकार का तर्क भी उतना ही गंभीर है। यदि शराबबंदी समाप्त या कमजोर की जाती है तो उसका राजनीतिक और सामाजिक संदेश क्या होगा? क्या इससे उन महिलाओं को यह महसूस नहीं होगा कि जिस नीति को उनके सम्मान, परिवार की सुरक्षा और घरेलू हिंसा से मुक्ति के नाम पर लागू किया गया था, उसे आर्थिक लाभ के लिए वापस ले लिया गया? यही वह बिंदु है जहां अर्थशास्त्र और राजनीति आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।


शराबबंदी के समर्थन में सबसे मजबूत राजनीतिक तर्क महिलाओं का रहा है। बिहार की राजनीति में शराबबंदी केवल एक आर्थिक नीति नहीं रही। इसे महिलाओं के सम्मान, परिवार की शांति और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा गया। अनेक महिलाओं ने यह तर्क दिया कि शराब के कारण परिवारों में आर्थिक संकट, घरेलू विवाद और हिंसा बढ़ती थी। इसलिए जब शराबबंदी पर सवाल उठता है तो सरकार के सामने केवल राजस्व का प्रश्न नहीं आता है। प्रश्न यह भी आता है कि क्या शराबबंदी हटाना उन महिलाओं से किया गया वादा तोड़ना होगा जिन्होंने इस नीति का समर्थन किया था? यही सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक धर्मसंकट हो सकता है। एक तरफ राजस्व का आकर्षण है। दूसरी तरफ महिला मतदाताओं का भरोसा है। एक तरफ आर्थिक विशेषज्ञों की संभावित गणना है। दूसरी तरफ उस सामाजिक भावना की राजनीति है, जिसे शराबबंदी ने जन्म दिया। सरकार अगर शराबबंदी हटाती है तो विपक्ष पूछेगा कि महिलाओं से किया वादा कहां गया? सरकार अगर शराबबंदी जारी रखती है तो दूसरा सवाल उठेगा कि 20 हजार करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का क्या? और सबसे कठिन प्रश्न होगा कि क्या मौजूदा व्यवस्था वास्तव में अपने उद्देश्य को प्राप्त कर रही है?


किसी भी कानून की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कानून की किताब में क्या लिखा है। सफलता इस बात से मापी जाती है कि जमीन पर क्या हो रहा है। अगर शराबबंदी के बावजूद शराब आसानी से उपलब्ध हो रही है, तस्करी के नेटवर्क लगातार सक्रिय हैं, सीमावर्ती क्षेत्रों से शराब बिहार में पहुंच रही है और उपभोक्ता किसी न किसी माध्यम से शराब हासिल कर रहे हैं, तो प्रश्न कानून की नीयत पर नहीं बल्कि उसके क्रियान्वयन पर उठता है। यहीं से शराबबंदी का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। कानून कहता है कि शराब नहीं। बाजार कहता है कि शराब उपलब्ध है। तस्कर कहते हैं कि मांग है तो आपूर्ति होगी। यह स्थिति किसी भी प्रतिबंधित बाजार में पैदा हो सकती है। जब मांग पूरी तरह खत्म नहीं होती और वैध आपूर्ति बंद कर दी जाती है, तो अवैध आपूर्ति के लिए जगह बनती है और यही जगह तस्करों की ताकत बन जाती है।


शराबबंदी के बाद बिहार में तस्करी एक अलग तरह की अर्थव्यवस्था का रूप ले चुकी है, ऐसा आरोप और चर्चा लगातार सामने आती रही है। राज्य की सीमाएं, सड़क मार्ग, निजी वाहन, छोटे-बड़े गिरोह और अलग-अलग सामाजिक नेटवर्क इस अवैध कारोबार के माध्यम बन सकते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब कोई अवैध कारोबार लंबे समय तक चलता है तो वह केवल कुछ पेशेवर अपराधियों तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग भी उसमें जुड़ने लगते हैं। यहीं से एक नया खतरा सामने आता है।


शराबबंदी की बहस का यह शायद सबसे संवेदनशील पहलू है। यदि शराब की तस्करी में महिलाओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है या महिलाएं आर्थिक मजबूरी, लालच अथवा किसी नेटवर्क के दबाव में इस कारोबार में प्रवेश कर रही हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता है। यह सामाजिक चेतना का प्रश्न बन जाता है। जिस शराबबंदी को महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से जोड़ा गया था, उसी व्यवस्था में यदि महिलाएं शराब की अवैध ढुलाई या तस्करी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल होने लगें तो यह नीति के सामने एक गंभीर नैतिक प्रश्न खड़ा करता है। क्या हम उस सामाजिक समस्या को खत्म कर रहे हैं जिसके लिए कानून बनाया गया था, या केवल उसके स्वरूप को बदल रहे हैं? यह प्रश्न सरकार को असहज कर सकता है, लेकिन इससे बचा नहीं जा सकता।


शराबबंदी की बहस का दूसरा और उससे भी अधिक गंभीर पक्ष है “जहरीली शराब”। जब शराब की वैध बिक्री का रास्ता बंद होता है लेकिन मांग बनी रहती है, तब अवैध शराब बनाने और बेचने वालों के लिए बाजार तैयार हो जाता है। ऐसे में गुणवत्ता और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रहती है। परिणाम कभी-कभी मौत के रूप में सामने आता है। जहरीली शराब से होने वाली मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं। प्रत्येक आंकड़े के पीछे एक परिवार है, बच्चे हैं, माता-पिता हैं, पत्नी है और एक अधूरा जीवन है। सरकार के सामने यहां दोहरी चुनौती है। एक ओर शराबबंदी की नीति को बचाना है, दूसरी ओर जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकना है। लेकिन अगर अवैध बाजार मजबूत होता रहा तो केवल छापेमारी और गिरफ्तारियों से समस्या का स्थायी समाधान संभव होगा या नहीं, यह भी विचारणीय प्रश्न है।


यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि शराबबंदी हटते ही सारी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। वैध शराब बिक्री से सरकार को राजस्व मिलेगा, लेकिन शराब की खपत बढ़ने के सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों की कीमत भी समाज को चुकानी पड़ सकती है। इसलिए बहस को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि 20 हजार करोड़ रुपये चाहिए या शराबबंदी चाहिए, शायद अधूरा दृष्टिकोण होगा। असल सवाल यह है कि सरकार ऐसी नीति कैसे बनाए जिसमें अवैध शराब का कारोबार समाप्त हो, जहरीली शराब से मौतें रुके, महिलाओं की सुरक्षा बनी रहे, परिवारों पर आर्थिक बोझ न बढ़े, सरकारी राजस्व के नुकसान का विकल्प मिले और कानून के प्रति जनता का विश्वास कायम रहे। यानि प्रश्न शराब की बोतल का नहीं है बल्कि पूरी नीति के संतुलन का है।


बिहार की राजनीति में शराबबंदी का संबंध केवल वर्तमान सरकार से नहीं है। यह पिछली सरकार की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नीतियों में रही है। इसलिए सम्राट चौधरी के सामने एक और राजनीतिक प्रश्न है। यदि शराबबंदी को खत्म किया जाता है तो क्या यह केवल एक नीति में परिवर्तन माना जाएगा या इसे नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण राजनीतिक विरासत को तोड़ने के रूप में देखा जाएगा? राजनीति में विरासत का अपना महत्व होता है। जो नेता सत्ता संभालता है, वह केवल कुर्सी नहीं संभालता। उसे पिछली सरकारों के फैसलों की राजनीतिक कीमत भी संभालनी पड़ती है। सम्राट चौधरी के सामने भी शायद यही स्थिति है। वह यदि शराबबंदी हटाते हैं तो एक वर्ग कहेगा कि उन्होंने आर्थिक विवशता में फैसला लिया। यदि नहीं हटाते तो आर्थिक नुकसान का प्रश्न उनके सामने बना रहेगा। इसलिए दोनों रास्तों में राजनीतिक जोखिम है।


सरकार का संदेश यदि शराबबंदी जारी रखने का है तो उसे केवल यह कहने से आगे जाना होगा कि शराबबंदी नहीं हटेगी। उसे यह भी बताना होगा कि मौजूदा व्यवस्था को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाएगा। कितनी तस्करी रोकी गई? कितने बड़े नेटवर्क समाप्त हुए? सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी कितनी मजबूत हुई? जहरीली शराब के खिलाफ क्या स्थायी व्यवस्था बनी? महिलाओं को तस्करी के नेटवर्क से कैसे बचाया जा रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या शराबबंदी के सामाजिक लाभ का कोई स्वतंत्र और पारदर्शी मूल्यांकन हुआ है? जनता केवल नारा नहीं चाहती है। जनता परिणाम देखना चाहती है।


यहीं शराबबंदी की पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। सरकार के पास आंकड़े हैं। राजस्व के आंकड़े हैं। गिरफ्तारियों के आंकड़े हैं। जब्ती के आंकड़े हैं। मौतों के आंकड़े हैं। लेकिन जनता के पास अपना अनुभव है। किसी गांव में यदि शराब आसानी से उपलब्ध है तो वहां के लिए शराबबंदी का अर्थ अलग है। किसी परिवार में यदि शराब के कारण हिंसा कम हुई है तो उसके लिए शराबबंदी का अर्थ अलग है। किसी परिवार ने जहरीली शराब में अपना सदस्य खोया है तो उसके लिए यह नीति एक अलग दर्द है और किसी गरीब राज्य के नागरिक के लिए 20 हजार करोड़ रुपये का विकासात्मक उपयोग एक अलग सवाल है। इसलिए सरकार को कागज के आंकड़ों और जमीन के सच के बीच पुल बनाना होगा।


शराबबंदी पर अब बहस को केवल 'शराब चाहिए या नहीं चाहिए' तक सीमित करना आसान होगा, लेकिन सही नहीं। असली लड़ाई शराब की नहीं है। असली लड़ाई भरोसे की है। महिलाओं का भरोसा कि सरकार उनकी सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं करेगी। करदाताओं का भरोसा कि सरकार आर्थिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करेगी। युवाओं का भरोसा कि राज्य में रोजगार और विकास के अवसर बढ़ेंगे। कानून मानने वाले नागरिकों का भरोसा कि कानून सबके लिए समान होगा और सबसे बढ़कर जनता का भरोसा कि सरकार जो कहती है, उसे जमीन पर लागू भी करती है। यदि शराबबंदी जारी रहती है तो सरकार को यह साबित करना होगा कि प्रतिबंध केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी प्रभावी है। यदि कभी इसमें बदलाव किया जाता है तो सरकार को यह साबित करना होगा कि बदलाव महिलाओं के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की कीमत पर नहीं है। दोनों परिस्थितियों में जनता जवाब मांगती रहेगी।


राजनीति में हर निर्णय का एक समय होता है। कभी आर्थिक गणित भारी पड़ता है, कभी सामाजिक भावना। कभी प्रशासनिक वास्तविकता निर्णायक होती है तो कभी चुनावी राजनीति। शराबबंदी भी अब इसी राजनीतिक लय का हिस्सा बन चुकी है। सम्राट चौधरी के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि शराबबंदी रखनी है या हटानी है। चुनौती यह है कि बिहार को कौन-सा रास्ता ऐसा दिया जाए जिसमें महिला सम्मान भी सुरक्षित रहे, जहरीली शराब से मौतें भी रुकें, तस्करी का नेटवर्क भी टूटे और राज्य की आर्थिक जरूरतें भी पूरी हो। 


सरकार अगर शराबबंदी को जारी रखने का फैसला करती है तो उसे इसे और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे। सिर्फ कानून की कठोरता पर्याप्त नहीं होगी। मांग, आपूर्ति, तस्करी, सीमावर्ती निगरानी, सामाजिक जागरूकता और नशामुक्ति, इन सभी को एक साथ देखना होगा और यदि भविष्य में नीति में परिवर्तन पर विचार होता है तो वह भी भावनात्मक या राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन और पारदर्शी सार्वजनिक विमर्श के आधार पर होना चाहिए। क्योंकि आखिरकार प्रश्न यह नहीं है कि बोतल बंद है या खुली। प्रश्न यह है कि बिहार का समाज किस दिशा में खुल रहा है और किस दिशा में बंद हो रहा है। 


शराबबंदी की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितनी बोतलें पकड़ी गईं। सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि कितने परिवार बचे, कितनी महिलाएं सुरक्षित हुईं, कितने युवाओं का भविष्य बचा, कितनी मौतें रुकी और जनता का कानून पर कितना भरोसा बढ़ा और यदि 20 हजार करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान का प्रश्न सामने है तो उसका उत्तर भी सरकार को देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार केवल भावनाओं से नहीं चलती है। उसे भावना और अर्थव्यवस्था, कानून और समाज, वर्तमान और भविष्य, इन सभी के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। यही बिहार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न भी है।


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