10 दिन इलाज के बाद अस्पताल से मिली छुट्टी - अन्ना हजारे बोले - 100 साल तक करूंगा देशसेवा

Jitendra Kumar Sinha
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 सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के लिए बीमारी के ये दस दिन भले ही स्वास्थ्य की परीक्षा के रहे हों, लेकिन उनके भीतर देशसेवा का संकल्प पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। वायरल संक्रमण, डिहाइड्रेशन और यूरिन संक्रमण के कारण 31 अगस्त को बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती हुए अन्ना हजारे को दस दिन के इलाज के बाद गुरुवार को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अस्पताल से बाहर निकलते समय उनके चेहरे पर राहत थी, लेकिन उससे कहीं अधिक मजबूत दिखाई दे रहा था उनका आत्मविश्वास। अन्ना हजारे ने कहा कि उनका संकल्प देश की सेवा करना है और वह 100 वर्ष की उम्र तक देशसेवा करते रहना चाहते हैं। उनके इस बयान ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि उम्र और स्वास्थ्य की चुनौतियां उनके सामाजिक जीवन के उद्देश्य को कमजोर नहीं कर सकती।


31 अगस्त को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बाद अन्ना को मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों की निगरानी में उनका उपचार चला। वायरल संक्रमण के साथ शरीर में पानी की कमी और यूरिन संक्रमण ने उनकी परेशानी बढ़ाई थी। करीब दस दिनों तक चले इलाज के बाद चिकित्सकों ने उनकी स्थिति में सुधार को देखते हुए उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी। बढ़ती उम्र में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां स्वाभाविक हैं, लेकिन अन्ना का नजरिया हमेशा से अलग रहा है। उनके लिए जीवन का अर्थ केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं रहा। समाज, गांव, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता जैसे मुद्दे उनके लंबे सामाजिक जीवन का हिस्सा रहे हैं।


अन्ना हजारे का यह कहना कि वह 100 साल तक देशसेवा करेंगे, केवल एक सामान्य बयान नहीं है। यह उनके जीवन-दर्शन का विस्तार है। उनका मानना रहा है कि व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक होता है, जब वह समाज और देश के लिए कुछ योगदान करे। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके भीतर सक्रिय रहने की इच्छा बताती है कि सामाजिक सेवा के लिए सबसे बड़ी ताकत शरीर नहीं, बल्कि संकल्प और इच्छाशक्ति होती है। बीमारी से उबरकर घर लौटते हुए अन्ना ने जिस तरह भविष्य की अपनी भूमिका को लेकर स्पष्टता दिखाई, वह उनके समर्थकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए भी प्रेरणादायक संदेश है।


अन्ना हजारे का नाम महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि गांव के विकास और सामाजिक परिवर्तन के प्रयोगों से जुड़ा रहा है। उन्होंने ग्रामीण विकास, जल संरक्षण, नशामुक्ति और सामाजिक अनुशासन जैसे विषयों पर लंबे समय तक काम किया। बाद में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए। विशेष रूप से लोकपाल की मांग को लेकर चले आंदोलन ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। उस दौर में बड़ी संख्या में लोग उनके साथ खड़े हुए और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना को व्यापक मंच मिला। अन्ना का सार्वजनिक जीवन सत्ता हासिल करने की राजनीति से अलग रहा है। उनका जोर हमेशा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और जनभागीदारी पर रहा। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखते हैं, जिसने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर सामाजिक सरोकार को प्राथमिकता दी।


अन्ना की उम्र अब उनके लिए चुनौती जरूर है, लेकिन उनके विचारों में थकान दिखाई नहीं देती। अस्पताल में भर्ती होना उनके लिए स्वास्थ्य की कठिन घड़ी थी, मगर अस्पताल से बाहर आते ही उन्होंने भविष्य की अपनी दिशा स्पष्ट कर दी।


आज जब सार्वजनिक जीवन में सक्रियता को अक्सर पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है, अन्ना का जीवन इस धारणा से अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनका कहना है कि देशसेवा किसी पद की मोहताज नहीं होती। कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर समाज के लिए काम कर सकता है।


अन्ना का 100 वर्ष तक देशसेवा करने का संकल्प नई पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है। देश को बदलने के लिए केवल सरकार या राजनीतिक दलों की भूमिका पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को भी अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना होगा। अन्ना का जीवन इस बात की याद दिलाता है कि सामाजिक परिवर्तन लंबी प्रक्रिया है। इसमें धैर्य, त्याग और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। बीमारी से उबरकर घर लौटे अन्ना का संकल्प यही कहता है कि संघर्ष की राह पर उम्र केवल एक संख्या है।


दस दिन के इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलना अन्ना के लिए केवल स्वास्थ्य लाभ की खबर नहीं है। यह उनके लंबे सामाजिक सफर में एक और पड़ाव है। उन्होंने साफ कर दिया है कि बीमारी ने उनके इरादों को नहीं बदला है। 100 साल तक देशसेवा करने का संकल्प बताता है कि अन्ना हजारे के लिए सेवा कोई अवसर नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है। अब देखना यह है कि स्वास्थ्य लाभ के बाद वह सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर किस रूप में सक्रिय होते हैं। फिलहाल उनके समर्थकों के लिए सबसे बड़ी राहत यही है कि अन्ना अस्पताल से बाहर हैं और उनका हौसला अब भी बुलंद है।


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