कला ने इमारत को दिया 3डी रूप

Jitendra Kumar Sinha
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शहरों की पहचान केवल उनकी सड़कों, बाजारों और इमारतों से नहीं बनती, बल्कि उन इमारतों पर उकेरी गई कला भी शहर के व्यक्तित्व को नया रूप दे सकती है। रूस के बालाशिखा शहर में इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। यहां बहुमंजिला इमारतों की सामान्य और एक जैसी दिखाई देने वाली दीवारें अब विशाल कैनवास में बदल रही है। स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकार अपनी कल्पनाशील कृतियों के माध्यम से इन दीवारों को ऐसा रूप दे रहे हैं कि राह चलते लोग कुछ क्षणों के लिए ठिठककर उन्हें देखने को मजबूर हो जाते हैं।


बालाशिखा की नोवाया स्ट्रीट स्थित 14 मंजिला पैनल हाउस इस बदलाव का शानदार उदाहरण है। इस इमारत पर कलाकार शोजी की बनाई कृति ‘द वेव इज कमिंग’ ने वास्तुकला और कला के बीच की दूरी को लगभग समाप्त कर दिया है। पहली नजर में यह एक सामान्य बहुमंजिला इमारत दिखाई देती है, लेकिन जैसे ही नजर इसकी विशाल दीवार पर बने चित्र पर पड़ती है, पूरा दृश्य किसी कल्पनालोक में बदलता हुआ नजर आता है। इस म्यूरल में इमारत की ज्यामिति के साथ इस तरह प्रयोग किया गया है कि दीवारें सपाट न होकर उखड़ती, मुड़ती और लहराती हुई प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है जैसे इमारत का एक हिस्सा किसी विशाल लहर के प्रभाव में अपनी वास्तविक आकृति खो रहा हो।


‘द वेव इज कमिंग’ की सबसे बड़ी खासियत इसका ऑप्टिकल इल्यूजन है। कलाकार ने रंग, रेखा, प्रकाश और वास्तु संरचना का ऐसा संयोजन किया है कि वास्तविकता और चित्र के बीच अंतर करना आसान नहीं रहता। चित्र में दिखाई देने वाली संरचना और आकाश का प्रतिबिंब वास्तविक इमारत से इस तरह जुड़ता है कि देखने वाले को कुछ क्षण के लिए भ्रम हो सकता है कि वह वास्तव में दीवार देख रहा है या किसी दूसरी दुनिया की खिड़की। यही ऑप्टिकल इल्यूजन इस कृति को केवल एक सजावटी चित्र से आगे ले जाता है। यह दर्शाता है कि कला किस प्रकार किसी साधारण और विशाल वास्तु ढांचे की दृश्य धारणा को पूरी तरह बदल सकती है।


आमतौर पर किसी इमारत का डिजाइन उसके निर्माण के समय तय हो जाता है। लेकिन स्ट्रीट आर्ट और म्यूरल पेंटिंग उस स्थापित डिजाइन को एक नया अर्थ देने का अवसर प्रदान करती हैं। कलाकार इमारत की ऊंचाई, खिड़कियों, कोनों और दीवारों को अपनी रचना का हिस्सा बना लेते हैं। बालाशिखा की इस इमारत पर भी यही प्रयोग दिखाई देता है। यहां कला इमारत पर चिपकाई गई कोई अलग वस्तु नहीं लगती, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है मानो चित्र स्वयं इमारत के वास्तुशिल्प का हिस्सा हो। यही कारण है कि कृति को देखने पर तीन आयामों का अनुभव होता है।


स्ट्रीट आर्ट का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि इसे देखने के लिए किसी संग्रहालय या कला दीर्घा में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। सड़क पर चलते हुए, बस में बैठे हुए या किसी बाजार से गुजरते समय भी लोग कला से रूबरू हो सकते हैं। इससे कला आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनती है। बालाशिखा में विकसित हो रही स्ट्रीट आर्ट संस्कृति इसी सोच को आगे बढ़ाती दिखाई देती है। यहां सार्वजनिक स्थानों को जीवंत बनाने के लिए बड़े आकार के म्यूरल बनाए जा रहे हैं। इससे शहर की सामान्य इमारतें भी अलग पहचान हासिल कर रही है।


बालाशिखा की इस कला संस्कृति को ‘अर्बन मॉर्फोजेनेसिस (कल्चरल कोड) फेस्टिवल’ जैसी पहलों से भी प्रोत्साहन मिला है। ऐसे आयोजन कलाकारों को सार्वजनिक स्थानों पर अपनी कल्पना को आकार देने का अवसर देते हैं। इन पहलों का महत्व केवल सौंदर्य बढ़ाने तक सीमित नहीं है। विशाल भित्तिचित्र शहर के वातावरण में रचनात्मकता, रंग और संवाद जोड़ते हैं। किसी साधारण दीवार का कलात्मक रूपांतरण उस स्थान को लोगों की स्मृति में भी अधिक प्रभावशाली बना सकता है।


‘द वेव इज कमिंग’ जैसी कलाकृतियां यह संदेश देती हैं कि कला के लिए किसी पारंपरिक कैनवास की आवश्यकता हमेशा नहीं होती। कभी कोई दीवार, कभी पुल और कभी पूरी इमारत कलाकार की कल्पना का आधार बन सकती है। बालाशिखा की 14 मंजिला इमारत पर बनी यह कृति इसी बदलती कला-दृष्टि का उदाहरण है। यहां इमारत स्थिर है, लेकिन चित्र उसे गतिशीलता का एहसास देता है। दीवारें मानो लहरों के साथ झुक रही हैं और आसमान इमारत के भीतर उतर आया है। यही वह क्षण है जब वास्तुकला और कला एक-दूसरे में घुल जाती हैं और एक साधारण इमारत शहर की दृश्य पहचान का हिस्सा बन जाती है। वास्तव में, ऐसी स्ट्रीट आर्ट शहरों को केवल सुंदर नहीं बनाती, बल्कि लोगों को अपने आसपास की दुनिया को एक अलग नजरिए से देखने के लिए भी प्रेरित करती है।


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