डिजिटल भुगतान व्यवस्था में यूपीआई ने देश के व्यापार और आम उपभोक्ताओं के बीच लेन-देन को बेहद आसान बना दिया है। छोटी दुकानों से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक, यूपीआई आज भुगतान का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में ग्राहक से व्यापारी को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाए जाने के प्रस्ताव ने व्यापारिक संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। इसके विरोध में देशभर के व्यापारिक संगठन 2 अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ मनाने की तैयारी में है।
फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया व्यापार मंडल और कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने प्रस्तावित शुल्क का विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। दोनों संगठनों का कहना है कि यूपीआई ने देश में डिजिटल भुगतान को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में लेन-देन पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से व्यापारियों और ग्राहकों दोनों पर असर पड़ सकता है। व्यापारी संगठनों ने 15 अक्टूबर से प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत एमडीआर को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका तर्क है कि डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने के बजाय यदि लेन-देन की लागत बढ़ेगी तो छोटे व्यापारियों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है।
एमडीआर यानि मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से भुगतान प्रणाली से जुड़े पक्षों के माध्यम से लिया जाता है। सामान्य तौर पर यह शुल्क लेन-देन की राशि के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में निर्धारित किया जाता है। व्यापारियों की चिंता खास तौर पर इस बात को लेकर है कि यदि बड़े मूल्य के यूपीआई भुगतान पर भी शुल्क लागू होता है तो नियमित रूप से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है। खासकर ऐसे कारोबार जहां रोजाना बड़ी संख्या में डिजिटल लेन-देन होते हैं, वहां छोटी प्रतिशत राशि भी समय के साथ महत्वपूर्ण रकम बन सकती है।
व्यापारी संगठनों ने अपने विरोध के लिए 2 अक्टूबर, यानि महात्मा गांधी जयंती का दिन चुना है। इस दिन ‘नो यूपीआई डे’ के माध्यम से व्यापारियों के बीच प्रस्तावित शुल्क के खिलाफ जागरूकता पैदा करने और सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। हालांकि इसका उद्देश्य केवल यूपीआई के खिलाफ माहौल बनाना नहीं, बल्कि व्यापारियों की उस चिंता को सामने रखना है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था में किसी भी नए शुल्क का असर छोटे और मध्यम कारोबार पर किस प्रकार पड़ सकता है।
भारत में यूपीआई ने भुगतान व्यवस्था को काफी बदल दिया है। मोबाइल फोन के माध्यम से कुछ ही सेकंड में भुगतान संभव होने के कारण नकदी पर निर्भरता कम हुई है। ग्राहक दुकानों, रेस्तरां, परिवहन सेवाओं और अन्य कारोबारों में आसानी से भुगतान कर सकते हैं। छोटे व्यापारियों के लिए भी यूपीआई ने भुगतान स्वीकार करने की प्रक्रिया को सरल बनाया है। क्यूआर कोड के माध्यम से भुगतान लेना आज सामान्य कारोबारी गतिविधि बन चुका है। यही कारण है कि यूपीआई से जुड़ी शुल्क व्यवस्था में किसी भी बदलाव का प्रभाव व्यापक हो सकता है।
व्यापारी संगठनों की मांग है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें व्यापारी को भुगतान स्वीकार करने के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ न उठाना पड़े। उनका कहना है कि यूपीआई की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी सरलता और कम लागत वाली व्यवस्था रही है। यदि शुल्क बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल व्यापारी तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। कुछ कारोबारी अपनी लागत की भरपाई के लिए वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव कर सकते हैं। इससे अंततः उपभोक्ता भी प्रभावित हो सकता है।
‘नो यूपीआई डे’ के जरिए व्यापारिक संगठन सरकार और संबंधित संस्थाओं का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। उनकी मुख्य मांग है कि 15 अक्टूबर से प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत एमडीआर को वापस लिया जाए और यूपीआई भुगतान को व्यापारियों के लिए आर्थिक रूप से सहज बनाए रखा जाए। अब देखना होगा कि व्यापारिक संगठनों के इस देशव्यापी अभियान के बाद सरकार और डिजिटल भुगतान से जुड़े संस्थानों की ओर से क्या कदम उठाया जाता है। एक ओर देश तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर व्यापारियों की लागत और उपभोक्ताओं की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण चुनौती है।
यूपीआई ने जिस तेजी से भारतीय भुगतान व्यवस्था में अपनी जगह बनाई है, उसके पीछे व्यापारी और उपभोक्ता दोनों की भागीदारी रही है। इसलिए किसी भी शुल्क व्यवस्था में बदलाव का असर व्यापक स्तर पर महसूस किया जा सकता है। ‘नो यूपीआई डे’ के जरिए व्यापारी संगठन इसी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाना चाहते हैं। अब 2 अक्टूबर और 15 अक्टूबर, दोनों तारीखें इस विवाद के अगले चरण के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।

