बिहार में खरीफ विपणन मौसम 2026-27 के तहत धान खरीद की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। राज्य सरकार ने किसानों से धान की अधिप्राप्ति चरणबद्ध तरीके से शुरू करने की योजना बनाई है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, उत्तर बिहार में एक नवंबर से और दक्षिण बिहार में 15 नवंबर से सरकारी स्तर पर धान खरीद शुरू होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना, बिचौलियों की भूमिका कम करना और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करना है। सहकारिता मंत्री राम कृपाल यादव ने स्पष्ट किया है कि धान खरीद की पूरी प्रक्रिया में शत-प्रतिशत पारदर्शिता बरती जाएगी। किसानों को धान बेचने के बाद भुगतान के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सरकार ने धान बेचने के 48 घंटे के भीतर किसानों के बैंक खातों में भुगतान सुनिश्चित करने की बात कही है। यदि इस व्यवस्था को निर्धारित समयसीमा के अनुसार प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे किसानों को खेती के अगले चरण की तैयारी करने में बड़ी मदद मिलेगी।
बिहार में धान की खेती का व्यापक क्षेत्र होने के कारण अलग-अलग इलाकों में फसल की तैयारी और कटाई का समय भिन्न हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने धान अधिप्राप्ति की शुरुआत दो चरणों में करने का निर्णय लिया है। उत्तर बिहार में एक नवंबर से धान खरीद शुरू होगी, जबकि दक्षिण बिहार के किसानों को 15 नवंबर से सरकारी खरीद केंद्रों पर अपनी उपज बेचने का अवसर मिलेगा। चरणबद्ध शुरुआत से खरीद व्यवस्था को व्यवस्थित करने, केंद्रों पर आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए पर्याप्त अवसर देने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, खरीद की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित केंद्र समय पर तैयार हों, किसानों को प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी मिले और किसी भी स्तर पर अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।
धान की फसल तैयार होने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उपज की बिक्री और समय पर धन प्राप्त करना है। खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, कृषि उपकरण और परिवहन पर खर्च होता है। ऐसे में फसल बेचने के बाद भुगतान में देरी होने से किसानों की आर्थिक योजना प्रभावित होती है। सरकार की ओर से 48 घंटे के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का आश्वासन इसी समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। समय पर राशि मिलने से किसान रबी फसलों की बुआई, खाद-बीज की खरीद और घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए धन का इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे उन्हें साहूकारों या अन्य स्रोतों से तत्काल कर्ज लेने की जरूरत भी कम पड़ सकती है। लेकिन भुगतान संबंधी इस आश्वासन को धरातल पर उतारना आवश्यक होगा। किसानों के बैंक खातों का सही विवरण, खरीद संबंधी अभिलेखों का समय पर सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया में तकनीकी बाधाओं का समाधान प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकारी खरीद व्यवस्था की विश्वसनीयता पारदर्शिता पर निर्भर करती है। किसानों को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि धान बेचने के लिए पंजीकरण कैसे कराना है, खरीद केंद्र कहां स्थित हैं, उपज की गुणवत्ता के क्या मानक हैं और धान की निर्धारित कीमत कितनी है। खरीद केंद्रों पर तौल की निष्पक्ष व्यवस्था, सही रसीद, अभिलेखों का उचित संधारण और शिकायतों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था भी जरूरी है। यदि किसानों को अपनी उपज की बिक्री के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें या अनावश्यक कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़े, तो सरकारी व्यवस्था का लाभ सीमित रह जाएगा। इसलिए सहकारिता विभाग, संबंधित समितियों और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। किसानों को समय रहते जानकारी उपलब्ध कराना और खरीद प्रक्रिया की नियमित निगरानी करना पारदर्शिता के लक्ष्य को पूरा करने में सहायक होगा।
किसानों की लंबे समय से यह अपेक्षा रही है कि उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिले और मजबूरी में कम कीमत पर धान बेचने की नौबत न आए। सरकारी खरीद केंद्र इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब किसानों को अपनी उपज बेचने का भरोसेमंद विकल्प मिलता है, तो उन्हें स्थानीय बाजार में कीमतों के दबाव का सामना करने में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि खरीद केंद्रों की संख्या और उनकी क्षमता स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हो। किसानों को केंद्रों तक धान पहुंचाने में अधिक परिवहन खर्च न उठाना पड़े तथा खरीद प्रक्रिया में देरी के कारण उन्हें निजी व्यापारियों को कम कीमत पर उपज बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटे और सीमांत किसानों को खरीद व्यवस्था का पूरा लाभ मिले। जानकारी के अभाव या तकनीकी कठिनाइयों के कारण कोई पात्र किसान सरकारी खरीद से वंचित नहीं रहना चाहिए।
धान खरीद की शुरुआत से पहले तैयारियों को अंतिम रूप देना सरकार के लिए महत्वपूर्ण चरण है। खरीद केंद्रों की कार्यशीलता, तौल की व्यवस्था, कर्मचारियों की उपलब्धता, आवश्यक उपकरण और किसानों की शिकायतों के समाधान की तैयारी समय पर पूरी होनी चाहिए। उत्तर बिहार में एक नवंबर और दक्षिण बिहार में 15 नवंबर से प्रस्तावित खरीद कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विभागीय स्तर पर नियमित निगरानी आवश्यक होगी। साथ ही, किसानों को खरीद की तारीखों और आवश्यक प्रक्रियाओं की जानकारी गांवों तक पहुंचाई जानी चाहिए। बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में धान की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए धान अधिप्राप्ति केवल सरकारी खरीद का कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसानों की आय, ग्रामीण बाजार और कृषि क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा विषय है। सरकार का 48 घंटे में भुगतान और शत-प्रतिशत पारदर्शिता का आश्वासन किसानों के लिए उम्मीद जगाता है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ये घोषणाएं खरीद केंद्रों पर व्यवहार में दिखाई दें। यदि समय पर खरीद, उचित मूल्य, पारदर्शी तौल और त्वरित भुगतान सुनिश्चित होते हैं, तो खरीफ विपणन मौसम 2026-27 बिहार के किसानों के लिए राहत और भरोसे का नया अवसर बन सकता है।

