सात मिनट की फिल्म - ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ का हुआ अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में चयन

Jitendra Kumar Sinha
0

 


जयपुर से उठी एक छोटी-सी कहानी अब अंतरराष्ट्रीय फिल्म मंचों तक पहुंचने जा रही है। बाल विवाह और पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था जैसे गंभीर विषयों को केंद्र में रखकर बनाई गई जयपुर की शॉर्ट फिल्म ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ का चयन दो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों के लिए हुआ है। महज सात मिनट की यह फिल्म अपने छोटे आकार में समाज की उन जटिल सच्चाइयों को सामने रखने का प्रयास करती है, जिनका असर विशेष रूप से लड़कियों और महिलाओं के जीवन पर पड़ता है। फिल्म का चयन कुल्लू मनाली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल तथा मुंबई में आयोजित होने वाले वेव ग्लोबल फिल्म फेस्टिवल 2026 में शॉर्ट फिल्म श्रेणी के लिए हुआ है। दोनों मंचों पर फिल्म का प्रदर्शन होना इसके निर्माताओं और कलाकारों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।


फिल्म का शीर्षक ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ अपने आप में प्रतीकात्मक है। चोटी भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में लंबे समय से स्त्री के व्यक्तित्व और पहचान से जुड़ी रही है। लेकिन फिल्म इसी परिचित प्रतीक के माध्यम से उन अदृश्य सामाजिक बंधनों की ओर संकेत करती है, जिनमें लड़कियों और महिलाओं को कई बार परंपरा, परिवार और सामाजिक दबाव के नाम पर बांध दिया जाता है। बाल विवाह इसी व्यवस्था की एक गंभीर अभिव्यक्ति है। कम उम्र में विवाह केवल एक लड़की के बचपन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसकी शिक्षा, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता, स्वास्थ्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भविष्य की संभावनाओं पर भी असर डाल सकता है। फिल्म इन सवालों को किसी लंबे भाषण के बजाय कहानी और दृश्य माध्यम से सामने रखने का प्रयास करती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता हो सकती है।


फिल्म की अवधि केवल सात मिनट है। सामान्य तौर पर इतने कम समय में किसी सामाजिक समस्या की पृष्ठभूमि, पात्रों की मन:स्थिति और उसके प्रभावों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ का महोत्सवों में चयन इस बात का संकेत है कि फिल्म ने अपने संक्षिप्त कथानक के माध्यम से प्रभाव पैदा किया है। लघु फिल्में आज केवल बड़े सिनेमा की छोटी बहन नहीं रह गई हैं। डिजिटल तकनीक और फिल्म महोत्सवों के विस्तार ने कम बजट और सीमित अवधि वाली फिल्मों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय मंच तैयार किए हैं। सामाजिक विषयों पर बनी ऐसी फिल्मों को दर्शकों और फिल्म समीक्षकों के बीच अलग पहचान मिल रही है।


फिल्म का दूसरा प्रमुख विषय पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था है। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति में पिछले दशकों में काफी बदलाव आया है, लेकिन अनेक स्तरों पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता, शिक्षा, विवाह और सामाजिक भूमिकाओं को लेकर पारंपरिक सोच अभी भी दिखाई देती है। ऐसे विषयों को सिनेमा के माध्यम से उठाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फिल्म केवल समस्या बताती नहीं, बल्कि दर्शक को उसके बारे में सोचने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ संभवतः इसी संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। फिल्म का उद्देश्य किसी एक परिवार या समुदाय को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर सवाल उठाना है जो लड़की के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों को उसकी इच्छा से अधिक सामाजिक अपेक्षाओं के आधार पर तय करती है।


फिल्म में ताम्हणकर थियेटर अकादमी के कलाकारों ने अभिनय किया है। रंगमंच से जुड़े कलाकारों के लिए कैमरे के सामने अभिनय की अपनी अलग चुनौती होती है। रंगमंच पर भावों को दूर बैठे दर्शकों तक पहुंचाने के लिए अभिनय अपेक्षाकृत मुखर होता है, जबकि कैमरा चेहरे के छोटे से छोटे भाव को भी पकड़ लेता है। ऐसे कलाकारों का फिल्म में शामिल होना कहानी को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सीमित अवधि की फिल्म में संवाद, भाव-भंगिमा और दृश्य संरचना के माध्यम से कहानी को तेजी से आगे बढ़ाना पड़ता है।


राजस्थान लंबे समय से कला, संस्कृति, लोक परंपरा और रंगमंच की समृद्ध भूमि रहा है। जयपुर जैसे शहर में फिल्म निर्माण से जुड़ी नई पीढ़ी अब स्थानीय विषयों को आधुनिक सिनेमाई भाषा में प्रस्तुत कर रही है। ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ इसी बदलते रचनात्मक परिदृश्य की एक झलक है। निर्देशक अरशिया परवीन के निर्देशन में बनी इस फिल्म का दो अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में चयन जयपुर के स्वतंत्र फिल्म निर्माण के लिए भी उत्साहजनक है। यह उपलब्धि यह संदेश देती है कि कहानी कहने के लिए बड़े बजट की आवश्यकता हमेशा नहीं होती। प्रभावी विषय, मजबूत दृष्टिकोण और संवेदनशील प्रस्तुति भी फिल्म को दूर तक पहुंचा सकती है।


कुल्लू मनाली और मुंबई के फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शन से फिल्म को अलग-अलग पृष्ठभूमि के दर्शकों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। साथ ही, फिल्म से जुड़े कलाकारों और तकनीकी टीम को नए फिल्मकारों, निर्माताओं और सिनेमा से जुड़े लोगों के साथ संवाद का अवसर भी मिल सकता है। ‘एक सख्त गुंथी हुई चोटी’ की यात्रा अभी छोटी है, लेकिन इसका विषय बड़ा है। सात मिनट की यह फिल्म अगर दर्शकों को बाल विवाह और पितृसत्ता जैसे मुद्दों पर कुछ देर रुककर सोचने के लिए मजबूर करती है, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी। अच्छा सिनेमा हमेशा लंबा नहीं होता है। कई बार सात मिनट ही समाज के सामने वर्षों पुराने सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त होते हैं।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top