पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। राज्य का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ किए जाने की तैयारी की खबर ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को वाराणसी में प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि राज्य सरकार जल्द ही नाम परिवर्तन से संबंधित संकल्प विधानसभा में पेश कर सकती है। संभावना जताई गई है कि यह प्रस्ताव विधानसभा के मौजूदा सत्र में ही लाया जा सकता है। नाम में बदलाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता। इसके पीछे इतिहास, संस्कृति, भाषा और राजनीतिक पहचान जैसे कई पहलू जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि पश्चिम बंगाल का नाम ‘पश्चिम बंग’ किया जाता है तो इसे राज्य की ऐतिहासिक जड़ों और मूल पहचान से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जाएगा।
‘बंग’ शब्द का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। प्राचीन भारतीय साहित्य, पुराणों और ऐतिहासिक संदर्भों में बंग क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। समय के साथ इस भूभाग की भौगोलिक सीमाएं और राजनीतिक स्वरूप बदलते रहे, लेकिन ‘बंग’ नाम सांस्कृतिक स्मृति में बना रहा। बंगाल केवल एक प्रशासनिक प्रदेश नहीं रहा है। यह साहित्य, संगीत, कला, दर्शन, शिक्षा और सामाजिक आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमि रहा है। रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, स्वामी विवेकानंद और सुभाषचंद्र बोस जैसे महान व्यक्तित्वों ने इस क्षेत्र की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। ऐसे में ‘पश्चिम बंग’ नाम को सामने लाने का तर्क यही है कि आधुनिक प्रशासनिक नाम के साथ क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को भी प्रमुखता दी जाए।
समिक भट्टाचार्य के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव का उद्देश्य राज्य को उसकी ऐतिहासिक जड़ों और पहचान से जोड़ना है। ‘पश्चिम बंग’ नाम अपने भीतर उस भौगोलिक पहचान को भी स्पष्ट करता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के संदर्भ में अधिक स्पष्ट हुई। राज्य के नाम में ‘पश्चिम’ शब्द इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐतिहासिक बंग क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा आज बांग्लादेश में है। भारत में स्थित बंगाल को पश्चिम बंग के रूप में संबोधित करना उसके भौगोलिक स्वरूप को रेखांकित करता है। हालांकि, नाम बदलने का निर्णय केवल राजनीतिक घोषणा से पूरा नहीं होता। इसके लिए संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद केंद्र सरकार और संसद की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
पश्चिम बंगाल में नाम और पहचान हमेशा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय अस्मिता और इतिहास को लेकर यहां की राजनीति काफी संवेदनशील रही है। इसलिए नाम परिवर्तन का मुद्दा भी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस को जन्म देगा। एक पक्ष इसे ऐतिहासिक पहचान की पुनर्स्थापना के रूप में देख सकता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक प्रतीकवाद मान सकता है। यही कारण है कि विधानसभा में प्रस्ताव आने के बाद इस पर व्यापक चर्चा और राजनीतिक तकरार की संभावना रहेगी।
किसी राज्य का नाम उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। नाम सुनते ही उसके इतिहास, भूगोल, संस्कृति और सामाजिक स्मृतियां सामने आती हैं। इसलिए नाम बदलने की प्रक्रिया को केवल शब्दों का परिवर्तन मानना उचित नहीं होगा। यदि ‘पश्चिम बंग’ नाम को मंजूरी मिलती है तो यह बंगाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को नए प्रशासनिक नाम के साथ जोड़ने का प्रयास होगा। हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन तभी संभव होगा जब प्रस्ताव विधानसभा से लेकर केंद्र की संवैधानिक प्रक्रिया तक आगे बढ़ेगा।
फिलहाल सबसे अधिक नजर विधानसभा के आगामी कदम पर है। यदि मौजूदा सत्र में नाम परिवर्तन का संकल्प पेश होता है तो यह निश्चित रूप से सदन के प्रमुख मुद्दों में शामिल होगा। इसके बाद बहस केवल नाम पर नहीं, बल्कि बंगाल के इतिहास, विरासत और राजनीतिक पहचान पर भी हो सकती है। ‘पश्चिम बंगाल’ से ‘पश्चिम बंग’ तक का संभावित सफर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बदलाव एक शब्द हटाने या जोड़ने भर का मामला नहीं है। इसके पीछे यह विचार है कि आधुनिक प्रशासनिक पहचान के साथ प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति को भी स्थान दिया जाए। अंततः नाम चाहे ‘पश्चिम बंगाल’ रहे या ‘पश्चिम बंग’ हो, बंगाल की असली पहचान उसकी समृद्ध संस्कृति, भाषा, साहित्य, कला और सामाजिक चेतना में ही निहित है। यदि नाम परिवर्तन होता है तो उसके साथ यह अपेक्षा भी रहेगी कि राज्य अपनी ऐतिहासिक विरासत को केवल नाम में नहीं, बल्कि विकास और सांस्कृतिक संरक्षण की नीतियों में भी जीवित रखे।-

