कर्नाटक में गन्ने के उचित मूल्य और किसानों की अन्य मांगों को लेकर हुब्बल्ली में चल रहा किसान आंदोलन फिलहाल समाप्त हो गया है। आंदोलन के बाद अब किसानों की नजर केंद्र सरकार के साथ होने वाली वार्ता पर टिक गई है। किसानों की मांगों पर चर्चा के लिए 30 सदस्यीय किसान प्रतिनिधिमंडल 10 अक्टूबर को नई दिल्ली जाएगा। प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के साथ बैठक कर गन्ने के मूल्य सहित किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को सामने रखेगा। आंदोलन का नेतृत्व कर्नाटक राज्य रायथा संघ और हसीरु सेना ने किया। इसमें कर्नाटक के विभिन्न जिलों के किसानों के साथ महाराष्ट्र के किसानों ने भी भाग लिया। किसानों ने हुब्बल्ली के रानी चन्नम्मा सर्कल पर प्रदर्शन कर अपनी मांगों को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। आंदोलन समाप्त होने के बाद अब बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशने की कोशिश शुरू हो गई है।
किसानों की सबसे प्रमुख मांग 2026-27 के पेराई सत्र के लिए गन्ने का मूल्य 5,500 रुपये प्रति टन निर्धारित करना है। किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई, बिजली और कृषि मशीनरी जैसी लागतों में वृद्धि का सीधा असर खेती की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऐसे में गन्ने का ऐसा मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए, जिससे किसानों को उनकी मेहनत और निवेश का उचित प्रतिफल मिल सके। गन्ना ऐसी फसल है जिसमें किसान को फसल तैयार करने से लेकर उसे चीनी मिल तक पहुंचाने तक लंबा इंतजार करना पड़ता है। लागत और समय दोनों अधिक होने के कारण किसानों के लिए उचित मूल्य का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
गन्ना किसानों ने केवल गन्ने के मूल्य को लेकर ही आवाज नहीं उठाई है। उनकी दूसरी महत्वपूर्ण मांग चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य से जुड़ी है। किसानों ने चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये से बढ़ाकर 60 रुपये प्रति किलो करने की मांग रखी है। किसानों का तर्क है कि चीनी के बाजार मूल्य और उससे बनने वाली पूरी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए गन्ना उत्पादकों को भी बेहतर मूल्य मिलना चाहिए। उनका मानना है कि चीनी उद्योग में किसानों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी कच्चे माल से पूरी उत्पादन प्रक्रिया शुरू होती है।
हुब्बल्ली में हुए आंदोलन में कर्नाटक के अलग-अलग जिलों के किसानों के अलावा महाराष्ट्र के किसानों की भागीदारी भी देखने को मिली। इससे गन्ने के मूल्य और चीनी उद्योग से जुड़े मुद्दों का व्यापक स्वरूप सामने आता है। गन्ना उत्पादन देश के कई राज्यों में किसानों की आय का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए गन्ने के मूल्य को लेकर होने वाली किसी भी चर्चा का प्रभाव केवल एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रहता। चीनी मिलों, किसानों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं के हित भी इससे जुड़े होते हैं।
हुब्बल्ली में आंदोलन समाप्त होने के बाद किसानों ने अब बातचीत का रास्ता अपनाया है। 30 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का दिल्ली जाना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 10 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के साथ होने वाली बैठक में किसान अपनी मांगों और समस्याओं को विस्तार से रखेंगे। इस बैठक में सबसे अधिक ध्यान गन्ने के प्रस्तावित मूल्य और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य पर रहेगा। किसानों की अपेक्षा है कि केंद्र सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करे और ऐसा रास्ता निकाले जिससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
आंदोलन खत्म होने के बाद अब किसानों की अगली उम्मीद दिल्ली में होने वाली वार्ता से जुड़ी है। हुब्बल्ली में उठी आवाज अब राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंचने वाली है। किसान प्रतिनिधिमंडल के सामने अपनी मांगों को मजबूती से रखने की जिम्मेदारी होगी, वहीं सरकार के सामने किसानों की चिंताओं पर विचार कर व्यावहारिक समाधान तलाशने की चुनौती रहेगी। गन्ने की कीमत केवल एक कृषि उपज का मूल्य तय करने का विषय नहीं है। इसके साथ किसानों की आय, चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था, उत्पादन लागत और बाजार व्यवस्था भी जुड़ी हुई है। ऐसे में 10 अक्टूबर की वार्ता से किसानों को अपनी मांगों पर ठोस प्रगति की उम्मीद है। अब देखना होगा कि बातचीत की मेज पर रखी गई मांगों पर केंद्र और किसान प्रतिनिधियों के बीच किस तरह की सहमति बनती है।

