पुरी की पवित्र धरती पर बुधवार को एक बार फिर भक्ति और आस्था का उल्लास देखने को मिला। कोविड-19 महामारी के कारण करीब छह वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए बंद चल रहा गुंडिचा मंदिर आखिरकार आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। मंदिर के कपाट खुलते ही परिसर में भक्तिमय वातावरण बन गया। लंबे समय से दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण भावुक करने वाला रहा। मंदिर में प्रवेश करते श्रद्धालुओं के चेहरों पर उत्साह और संतोष दिखाई दिया।
कोरोना महामारी ने केवल जनजीवन और अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया था, बल्कि देश के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की गतिविधियां भी लंबे समय तक प्रभावित रहीं। संक्रमण से बचाव और सुरक्षा को देखते हुए गुंडिचा मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया गया था। समय गुजरता गया और पुरी में धार्मिक गतिविधियां धीरे-धीरे सामान्य होती गईं, लेकिन गुंडिचा मंदिर में आम श्रद्धालुओं के प्रवेश का इंतजार बना रहा। अब छह वर्ष बाद कपाट खुलने से श्रद्धालुओं की वह प्रतीक्षा समाप्त हुई है। मंदिर खुलने के साथ पुरी के धार्मिक पर्यटन को भी नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।
गुंडिचा मंदिर का महत्व भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथयात्रा से गहराई से जुड़ा है। रथयात्रा के अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। यह परंपरा पुरी की धार्मिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। लोकमान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। इसी कारण रथयात्रा के दौरान भगवान का यहां पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। रथयात्रा के समय देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और भगवान के दर्शन के साथ गुंडिचा मंदिर की परंपरा से भी जुड़ते हैं।
मंदिर खुलने के साथ श्रद्धालुओं के प्रवेश के लिए शुल्क व्यवस्था भी निर्धारित की गई है। 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों और पांच वर्ष तक के बच्चों को छोड़कर अन्य श्रद्धालुओं से 10 रुपये प्रवेश शुल्क लिया जाएगा। प्रवेश व्यवस्था का उद्देश्य मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही को व्यवस्थित रखना और दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाना हो सकता है। बुजुर्गों तथा छोटे बच्चों को शुल्क से छूट देकर उनके लिए सुविधा का भी ध्यान रखा गया है।
भारतीय मंदिरों की विशेषता यह रही है कि वे केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं होते। उनके साथ इतिहास, संस्कृति, लोकविश्वास, स्थापत्य और सामाजिक जीवन की अनेक परंपराएं जुड़ी रहती हैं। गुंडिचा मंदिर भी इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ी परंपराएं सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। इन परंपराओं में धार्मिक आस्था के साथ लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का भी समावेश दिखाई देता है। इसलिए गुंडिचा मंदिर के कपाट खुलना श्रद्धालुओं के लिए केवल दर्शन की सुविधा बहाल होना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जुड़ने का अवसर भी है।
पुरी भारत के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में गिना जाता है। भगवान जगन्नाथ मंदिर के अलावा गुंडिचा मंदिर, समुद्र तट और आसपास के अनेक धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल देशभर से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। गुंडिचा मंदिर के दोबारा खुलने से पुरी आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक यात्रा और व्यापक होगी। इससे स्थानीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन से जुड़े व्यवसायों और सेवाओं को भी लाभ मिलने की संभावना है।
छह वर्षों का अंतराल लंबा होता है। इस दौरान एक पूरी पीढ़ी के छोटे बच्चों ने गुंडिचा मंदिर को केवल रथयात्रा की कहानियों और तस्वीरों में देखा होगा। अब उनके लिए इस पवित्र स्थल को प्रत्यक्ष देखने का अवसर उपलब्ध हुआ है। मंदिर के कपाट खुलने के साथ पुरी की धार्मिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण कड़ी फिर सक्रिय हुई है। भगवान जगन्नाथ की नगरी में आस्था का यह पुनर्मिलन श्रद्धालुओं के लिए विशेष अनुभूति लेकर आया है। छह साल का इंतजार खत्म हुआ, कपाट खुले और फिर गूंज उठा ‘जय जगन्नाथ’। यह उद्घोष केवल भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उस जीवंत परंपरा की निरंतरता है जो सदियों से पुरी को भारत की आध्यात्मिक चेतना के मानचित्र पर विशिष्ट स्थान देती आई है।

