भारतीय उद्यमी गगन बियानी की अनूठी एआई एकेडमी

Jitendra Kumar Sinha
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आज की दुनिया में शिक्षा का अर्थ तेजी से बदल रहा है। कभी किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की डिग्री को सफलता की पहली सीढ़ी माना जाता था, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि एआई के दौर में ज्ञान और कौशल की अहमियत लगातार बढ़ रही है। तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि चार साल पहले सीखी गई कई चीजें आज पुरानी पड़ सकती है। ऐसे समय में यदि किसी युवा को बिना डिग्री, बिना प्रवेश परीक्षा और बिना ट्यूशन फीस के अत्याधुनिक तकनीक सीखने का अवसर मिले, तो यह पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था से अलग एक महत्वपूर्ण प्रयोग कहा जा सकता है। भारतीय मूल के उद्यमी और यूडेमी के सह-संस्थापक गगन बियानी ने इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ‘होरोविट्ज एंड्रीसन एकेडमी’ शुरू की है। इस एकेडमी का उद्देश्य ऐसे युवाओं को अवसर देना है, जो एआई, टेक्नोलॉजी और उद्यमिता के क्षेत्र में कुछ नया करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन पारंपरिक शैक्षणिक व्यवस्था उनकी प्रतिभा को पूरी तरह अभिव्यक्त करने का माध्यम नहीं बन पाती। एकेडमी का सबसे आकर्षक पहलू यह है कि यहां डिग्री प्राप्त करना लक्ष्य नहीं है, बल्कि वास्तविक ज्ञान और कौशल हासिल करना लक्ष्य है। कार्यक्रम में फिलहाल केवल 50 छात्रों को स्थान मिलेगा और उन्हें एक वर्ष तक ट्यूशन फीस नहीं देनी होगी।


दुनिया की शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से एक धारणा रही है कि किसी अच्छे संस्थान से डिग्री हासिल करना सफल करियर की अनिवार्य शर्त है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कंप्यूटर विज्ञान या अन्य तकनीकी क्षेत्रों में प्रवेश के लिए वर्षों तक विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इसके बाद भी डिग्री मिलने के बाद रोजगार की गारंटी नहीं होती है। एआई ने इस पारंपरिक सोच को और चुनौती दी है। आज कंपनियां ऐसे लोगों की तलाश कर रही हैं जो नई तकनीक को समझ सके, समस्याओं का समाधान कर सके और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सके। गगन बियानी की एकेडमी इसी बदलाव को ध्यान में रखती दिखाई देती है। यहां प्रवेश के लिए परीक्षा या पारंपरिक डिग्री को प्राथमिक शर्त नहीं बनाया गया है। इसका संदेश साफ है कि यदि प्रतिभा है, सीखने की इच्छा है और कुछ नया करने का जुनून है तो अवसर केवल डिग्री की मोहताज नहीं होना चाहिए। यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के अनेक प्रतिभाशाली युवा आर्थिक या शैक्षणिक कारणों से प्रतिष्ठित संस्थानों तक नहीं पहुंच पाते हैं। ऐसी व्यवस्था उनके लिए वैकल्पिक रास्ता खोल सकती है।


एकेडमी का पहला कार्यक्रम केवल 50 छात्रों के लिए होगा। संख्या छोटी है, लेकिन प्रयोग का प्रभाव व्यापक हो सकता है। एक वर्ष के इस कार्यक्रम में छात्रों को एआई, तकनीक और उद्यमिता से जुड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाएगा। उद्देश्य केवल किताबों का ज्ञान देना नहीं है, बल्कि प्रतिभागियों को उस वातावरण में तैयार करना है जहां वे तकनीकी समस्याओं पर काम कर सके, नए विचार विकसित कर सकें और भविष्य की कंपनियों या तकनीकी परियोजनाओं की नींव रख सके। 50 छात्रों का छोटा समूह होने का एक फायदा यह भी हो सकता है कि प्रत्येक प्रतिभागी को सीखने और संवाद का अधिक अवसर मिले। पारंपरिक विश्वविद्यालयों की बड़ी कक्षाओं की तुलना में छोटे समूह में प्रशिक्षकों, उद्यमियों और विशेषज्ञों से बातचीत संभवतः अधिक व्यक्तिगत हो सकती है। यहां शिक्षा का मॉडल भी पारंपरिक कॉलेज से अलग दिखाई देता है। लक्ष्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि कुछ बनाना, प्रयोग करना और वास्तविक समस्याओं का समाधान तलाशना है।


कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज केवल कंप्यूटर विज्ञान का विषय नहीं रह गया है। स्वास्थ्य, बैंकिंग, कृषि, शिक्षा, रक्षा, परिवहन, मीडिया, मनोरंजन और व्यापार, लगभग हर क्षेत्र में एआई की भूमिका बढ़ रही है। ऐसे समय में एआई की शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम के एक अध्याय तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए प्रयोग, परियोजना और वास्तविक परिस्थितियों में काम करने की आवश्यकता है। होरोविट्ज एंड्रीसन एकेडमी का प्रस्ताव इसी दिशा में दिखाई देता है। छात्रों को एआई और तकनीक के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। वे यह समझ सकेंगे कि नई तकनीक केवल कैसे काम करती है, बल्कि उससे वास्तविक दुनिया की समस्याओं का समाधान कैसे निकाला जा सकता है। एआई की दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है लगातार सीखते रहना। नई तकनीक, नए मॉडल और नए उपकरण तेजी से सामने आ रहे हैं। इसलिए आज का विशेषज्ञ भी कल विद्यार्थी बन सकता है। इस बदलती दुनिया में सीखने की क्षमता स्वयं एक महत्वपूर्ण कौशल बनती जा रही है।


इस एकेडमी की चर्चा का एक बड़ा कारण इसके संभावित अतिथि शिक्षक और वक्ता भी हैं। कार्यक्रम में तकनीकी और कारोबारी दुनिया की चर्चित हस्तियों के छात्रों से संवाद या कक्षाएं लेने की संभावना बताई गई है। इनमें सैम ऑल्टमैन, सत्या नडेला और जेन्सेन हुआंग जैसे नाम शामिल है। यदि ऐसी हस्तियां छात्रों के साथ सीधे संवाद करती हैं, तो यह पारंपरिक पाठ्यक्रम से अलग अनुभव होगा। किसी पुस्तक में उद्यमिता पढ़ने और किसी सफल उद्यमी से यह सुनने में अंतर होता है कि उसने वास्तविक जीवन में कौन-सी कठिनाइयों का सामना किया, किस प्रकार निर्णय लिए और असफलताओं से क्या सीखा। इसी तरह एआई और कंप्यूटिंग के क्षेत्र के दिग्गजों से बातचीत छात्रों को तकनीकी बदलाव की दिशा समझने में मदद कर सकती है। हालांकि इन हस्तियों की भागीदारी को कार्यक्रम की संभावित संभावना के रूप में ही देखना चाहिए; किसी विशेष व्यक्ति की कक्षा या उपस्थिति को निश्चित कार्यक्रम मानना उचित नहीं होगा।


एकेडमी ने लगभग 350 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई है। यह राशि इस प्रयोग को केवल एक छोटे शैक्षणिक प्रोजेक्ट के बजाय बड़े स्तर की महत्वाकांक्षा से जोड़ती है। फंडिंग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि एआई और आधुनिक तकनीक की शिक्षा पारंपरिक कक्षा और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है। इसके लिए कंप्यूटिंग संसाधन, अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर, विशेषज्ञ प्रशिक्षक, प्रयोगशालाएं और वास्तविक परियोजनाओं पर काम करने की सुविधा चाहिए। यदि किसी छात्र को अत्याधुनिक एआई मॉडल पर प्रयोग करना है, तो उसके लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता होती है। एकेडमी की ओर से छात्रों को 50,000 डॉलर तक के कंप्यूट क्रेडिट्स देने की व्यवस्था इसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारतीय मुद्रा में यह राशि करोड़ों रुपये के बराबर बैठती है। इससे छात्रों को बड़े स्तर पर एआई प्रयोग करने के लिए कंप्यूटिंग संसाधन मिल सकते हैं।


इस कार्यक्रम की एक और विशेषता छात्रों के लिए 5,000 डॉलर के ट्रैवल बजट की व्यवस्था है। आज तकनीकी शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं है। सम्मेलन, तकनीकी कार्यक्रम, कंपनियों का दौरा, विशेषज्ञों से मुलाकात और विभिन्न देशों के नवाचार वातावरण को समझना भी सीखने का हिस्सा बन सकता है। ट्रैवल बजट छात्रों को ऐसे अवसरों तक पहुंचने में मदद कर सकता है। इससे उन्हें यह समझने का अवसर मिलेगा कि अलग-अलग स्थानों पर तकनीक और उद्यमिता किस तरह विकसित हो रही है। इस तरह एकेडमी का मॉडल केवल ‘क्लासरूम एजुकेशन’ के बजाय क्लासरूम, प्रयोगशाला, उद्योग और वास्तविक दुनिया को जोड़ने का प्रयास करता दिखाई देता है।


कार्यक्रम की संरचना भी पारंपरिक विश्वविद्यालय से अलग है। जानकारी के अनुसार छात्र सितंबर से अप्रैल तक सैन फ्रांसिस्को में रहेंगे, जहां वे सीखने और परियोजनाओं पर काम करेंगे। इसके बाद जून से अगस्त तक कंपनियों में काम करने का अवसर मिलेगा। यह व्यवस्था शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी कम कर सकती है। कक्षा में सीखी गई किसी तकनीक का वास्तविक कंपनी में उपयोग किस तरह होता है, इसे समझने का अवसर छात्रों को मिलेगा। उदाहरण के लिए, कोई छात्र एआई आधारित उत्पाद विकसित करना सीखता है तो कंपनी में काम करते समय उसे उपयोगकर्ता की जरूरत, उत्पाद की लागत, सुरक्षा, बाजार और टीमवर्क जैसी वास्तविक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यही अनुभव आगे चलकर उद्यमिता की नींव बन सकता है।


परंपरागत शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी अक्सर पूछता है कि “परीक्षा में क्या आएगा?” लेकिन नई तकनीकी शिक्षा का सवाल बदल सकता है कि “मैं क्या बना सकता हूं?” यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। परीक्षा आधारित शिक्षा में सही उत्तर खोजना प्राथमिक उद्देश्य होता है। नवाचार आधारित शिक्षा में कई बार सही प्रश्न खोजना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। किसी समस्या को पहचानना, उसके कारणों को समझना और फिर तकनीक के माध्यम से समाधान तैयार करना उद्यमिता की मूल प्रक्रिया है। एआई एकेडमी का यह प्रयोग इसी मानसिकता को बढ़ावा देने की कोशिश करता है। यदि विद्यार्थी को केवल तकनीक सिखाई जाए तो वह एक तकनीकी कर्मचारी बन सकता है। लेकिन यदि उसे तकनीक के साथ समस्या पहचानना, उत्पाद बनाना, टीम तैयार करना और बाजार को समझना भी सिखाया जाए तो वह भविष्य का उद्यमी बन सकता है।


गगन बियानी भारतीय मूल के उद्यमी हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े युवा आबादी वाले देशों में शामिल है और यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी तकनीक तथा इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत में आईआईटी, आईआईएम और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों की अपनी विशिष्ट भूमिका है। लेकिन हर प्रतिभाशाली युवा इन संस्थानों तक नहीं पहुंच सकता। प्रवेश परीक्षा की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक परिस्थितियां और भौगोलिक सीमाएं कई युवाओं के सामने बाधाएं पैदा करती है। ऐसे में बिना पारंपरिक डिग्री के उच्चस्तरीय तकनीकी प्रशिक्षण का मॉडल एक वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत कर सकता है। यह भारत के लिए विशेष रूप से इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि देश में बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं जो ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से स्वयं सीख रहे हैं। यदि उन्हें उच्चस्तरीय मार्गदर्शन, कंप्यूटिंग संसाधन और उद्योग का अनुभव भी मिल जाए तो उनकी क्षमता को अधिक व्यवस्थित रूप से विकसित किया जा सकता है।


क्या भविष्य में डिग्री की भूमिका खत्म हो जाएगी? यह प्रश्न स्वाभाविक है, लेकिन इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। डिग्री की उपयोगिता कई क्षेत्रों में बनी रहेगी। चिकित्सा, कानून, वास्तुकला, शोध और अनेक पेशों में औपचारिक शिक्षा और प्रमाणन की आवश्यकता महत्वपूर्ण है। वहीं तकनीक और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में कौशल आधारित अवसरों का महत्व बढ़ रहा है। इसलिए नई शिक्षा व्यवस्था को पारंपरिक विश्वविद्यालयों का पूर्ण विकल्प मानने के बजाय एक अतिरिक्त मार्ग के रूप में देखना अधिक उचित होगा। होरोविट्ज एंड्रीसन एकेडमी का महत्व इस बात में हो सकता है कि वह शिक्षा के एक वैकल्पिक मॉडल को प्रयोग के रूप में सामने रख रही है।


तकनीकी दुनिया में किसी व्यक्ति ने क्या बनाया है, यह कई बार उसके प्रमाणपत्रों से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। किसी युवा ने ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट बनाया है, कोई एआई मॉडल विकसित किया है, किसी वास्तविक समस्या के लिए सॉफ्टवेयर तैयार किया है या कोई सफल स्टार्टअप शुरू किया है, ये उपलब्धियां उसके कौशल का प्रत्यक्ष प्रमाण बन सकती है। भविष्य में डिग्री + कौशल + अनुभव + पोर्टफोलियो का संयोजन अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। एकेडमी का मॉडल इसी बदलाव को संस्थागत रूप देने का प्रयास माना जा सकता है।


उद्यमिता की सबसे बड़ी सीख किताबों से नहीं है, प्रयोगों से मिलती है। हर विचार सफल नहीं होता है। कई उत्पाद असफल होते हैं, कई स्टार्टअप बंद हो जाते हैं और कई तकनीकी प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं देते। लेकिन असफलता से मिलने वाला अनुभव अगली सफलता का आधार बन सकता है। यदि एकेडमी छात्रों को प्रयोग करने और असफल होने की स्वतंत्रता देती है, तो यह उनकी रचनात्मक क्षमता को बढ़ा सकती है। उन्हें केवल यह नहीं सिखाया जाएगा कि सफलता कैसे प्राप्त करें, बल्कि यह भी समझना होगा कि असफलता के बाद अगला कदम कैसे उठाया जाए।


एआई की शक्ति जितनी बड़ी है, उससे जुड़ी जिम्मेदारियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। एआई से उत्पादकता बढ़ सकती है, लेकिन गलत सूचना, गोपनीयता, पक्षपात, रोजगार में बदलाव और तकनीक के दुरुपयोग जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। इसलिए एआई शिक्षा केवल कोडिंग या मशीन लर्निंग तक सीमित नहीं होनी चाहिए। छात्रों को यह भी समझना होगा कि तकनीक का सामाजिक प्रभाव क्या है। भविष्य के एआई उद्यमियों के लिए सवाल केवल यह नहीं होगा कि “क्या बनाया जा सकता है?” बल्कि यह भी होगा कि “क्या बनाया जाना चाहिए और उसका उपयोग कैसे किया जाना चाहिए?” यही जिम्मेदार तकनीकी विकास की आधारशिला हो सकती है।


इस अनूठे प्रयोग का पहला बैच सितंबर 2027 में शुरू होने की योजना है। यानि छात्रों के पास तैयारी के लिए पर्याप्त समय होगा। पहले बैच के केवल 50 छात्रों को अवसर मिलने के कारण चयन प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण होगी। हालांकि कार्यक्रम में पारंपरिक परीक्षा और डिग्री को प्रवेश की शर्त नहीं बनाया गया है, इसका अर्थ यह नहीं कि प्रतिभा या क्षमता का मूल्यांकन नहीं होगा। किसी भी सीमित सीट वाले उच्चस्तरीय कार्यक्रम में उम्मीदवारों के विचार, क्षमता, सीखने की इच्छा और संभावित योगदान जैसे पहलुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।


इस प्रयोग की असली सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि 50 छात्रों ने कितना पाठ्यक्रम पूरा किया। असली प्रभाव इस बात से सामने आ सकता है कि इन छात्रों ने आगे क्या किया। क्या वे नई कंपनियां शुरू करेंगे? क्या वे एआई के नए उत्पाद बनाएंगे? क्या वे वैज्ञानिक शोध में जाएंगे? क्या वे मौजूदा कंपनियों में तकनीकी बदलाव लाएंगे? या फिर शिक्षा के नए मॉडल विकसित करेंगे? इन सवालों के उत्तर आने वाले वर्षों में मिलेंगे। यदि इन 50 छात्रों में से कुछ भी महत्वपूर्ण तकनीकी या कारोबारी पहल खड़ी करते हैं, तो यह प्रयोग अपने शुरुआती आकार से कहीं बड़ा प्रभाव पैदा कर सकता है।


होरोविट्ज एंड्रीसन एकेडमी की कहानी केवल एक नई संस्था शुरू होने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की ओर संकेत करती है जिसमें शिक्षा की परिभाषा बदल रही है। एक समय शिक्षा का अर्थ था स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, परीक्षा और डिग्री। अब इसके साथ जुड़ रहे हैं ऑनलाइन लर्निंग, एआई, प्रोजेक्ट, प्रयोग, उद्योग अनुभव, नेटवर्किंग और लगातार सीखने की क्षमता। गगन बियानी की पहल इस बदलाव को एक प्रयोगात्मक रूप देती है। केवल 50 छात्रों से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम भले ही संख्या में छोटा हो, लेकिन इसका विचार बड़ा है प्रतिभा को अवसर देने के लिए हमेशा पारंपरिक डिग्री की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती भी यही होगी कि बिना पारंपरिक विश्वविद्यालय संरचना के उच्च गुणवत्ता और विश्वसनीयता को कैसे कायम रखा जाए। यदि एकेडमी अपने छात्रों को वास्तविक कौशल, उद्योग अनुभव और जिम्मेदार तकनीकी सोच दे पाती है, तो यह शिक्षा की दुनिया में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक मॉडल बन सकती है और शायद आने वाले समय में रोजगार देने वाली कंपनियां उम्मीदवार से यह पूछने के साथ-साथ कि “आपने क्या पढ़ा है?”, यह भी पूछेगी कि “आपने क्या बनाया है?” एआई के युग में यही सवाल शिक्षा की दिशा बदल सकता है। क्योंकि भविष्य केवल डिग्री रखने वालों का नहीं, बल्कि सीखने, सोचने, बनाने और बदलती दुनिया के साथ खुद को लगातार विकसित करने वालों का होगा।




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