सेना और केंद्रीय बलों की जनगणना पूरी

Jitendra Kumar Sinha
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देश की जनगणना केवल घरों और परिवारों की संख्या दर्ज करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारत की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर तैयार करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार भी है। इसी व्यापक प्रक्रिया के तहत जनगणना-2027 के लिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) तथा अन्य केंद्रीय बलों से जुड़े विशेष प्रतिष्ठानों में रहने वाली आबादी की गणना पूरी कर ली गई है। सुरक्षा संवेदनशीलता को देखते हुए इन प्रतिष्ठानों के लिए सामान्य जनगणना प्रक्रिया से अलग व्यवस्था अपनाई गई।


जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सेना तथा केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी सामान्य नागरिक क्षेत्रों से अलग होती है। यहां सुरक्षा व्यवस्था, रणनीतिक स्थान और सैन्य प्रतिष्ठानों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए जनगणना संबंधी जानकारी जुटाने की प्रक्रिया भी विशेष रखी गई। इन विशेष प्रतिष्ठानों से संबंधित आबादी की जानकारी कागजी प्रपत्रों के माध्यम से एकत्र की गई। इसका उद्देश्य जनगणना की आवश्यकता को पूरा करना और साथ ही सुरक्षा संबंधी संवेदनशील सूचनाओं को सार्वजनिक होने से बचाना है। डिजिटल माध्यमों की तुलना में कागजी प्रक्रिया यहां अधिक नियंत्रित और सुरक्षित मानी गई।


जनगणना अधिकारियों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में सेना, सीएपीएफ और अन्य केंद्रीय बलों से संबंधित 125 विशेष प्रतिष्ठान हैं। वहीं केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में ऐसे 47 प्रतिष्ठान चिह्नित किए गए हैं। इन सभी स्थानों पर रहने वाली आबादी की गणना पूरी कर ली गई है। इस प्रक्रिया से जनगणना के आंकड़ों में सुरक्षा बलों से संबंधित आबादी का भी समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा। देश की कुल आबादी का आकलन करते समय यह आवश्यक है कि ऐसे सभी वर्गों को आंकड़ों में शामिल किया जाए, जो अपने कार्यस्थल और तैनाती के कारण सामान्य नागरिक क्षेत्रों से अलग रहते हैं।


जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जनगणना संचालन निदेशक अमित शर्मा ने बताया कि इन विशेष प्रतिष्ठानों के लिए केवल आबादी की गणना की जाती है। यहां सामान्य नागरिक क्षेत्रों की तरह मकान सूचीकरण अभियान (एचएलओ) नहीं चलाया जाता है। इस अंतर को समझना जरूरी है। सामान्य जनगणना प्रक्रिया में मकानों, आवासीय सुविधाओं और परिवारों से संबंधित विभिन्न जानकारियां जुटाई जाती हैं। लेकिन सेना और केंद्रीय बलों के विशेष प्रतिष्ठानों की प्रकृति अलग होने के कारण वहां ऐसी विस्तृत आवासीय जानकारी एकत्र करने के बजाय केवल वहां रहने वाली आबादी का आंकड़ा दर्ज किया जाता है।


भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जनगणना के आंकड़े केवल संख्या नहीं होते। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर सरकार को विकास योजनाएं तैयार करने, संसाधनों का वितरण करने, आधारभूत सुविधाओं की आवश्यकता समझने और भविष्य की नीतियों को दिशा देने में मदद मिलती है। सेना और केंद्रीय बलों के जवान देश के अलग-अलग हिस्सों में तैनात रहते हैं। कई बार उनकी तैनाती ऐसी जगहों पर होती है, जहां वे सामान्य नागरिक आबादी से अलग परिसरों में रहते हैं। इसलिए उनकी आबादी को सही तरीके से दर्ज करना भी जनगणना की पूर्णता के लिए जरूरी है।


जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जनगणना की यह विशेष व्यवस्था एक महत्वपूर्ण संतुलन को सामने रखती है, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांख्यिकीय पारदर्शिता का संतुलन। एक तरफ सरकार को देश की वास्तविक जनसंख्या से संबंधित विश्वसनीय आंकड़े चाहिए, वहीं दूसरी तरफ सैन्य प्रतिष्ठानों की संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। इसीलिए विशेष प्रतिष्ठानों में सामान्य मकान सूचीकरण से अलग केवल आबादी की गणना की व्यवस्था की गई है। इससे जनगणना के आंकड़े भी पूरे होंगे और सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील पहलुओं की गोपनीयता भी बनी रहेगी।


जनगणना-2027 देश की बदलती सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना को समझने का महत्वपूर्ण अवसर होगी। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सेना तथा केंद्रीय बलों की आबादी की गणना पूरी होना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रक्रिया बताती है कि जनगणना केवल नागरिक बस्तियों तक सीमित नहीं है। देश की सुरक्षा में तैनात जवान भी उसी राष्ट्रीय जनसंख्या का हिस्सा हैं, जिसकी सही तस्वीर तैयार करना जनगणना का मूल उद्देश्य है। सीमा पर सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वालों की संख्या भी देश की जनगणना में दर्ज हो—यही व्यापक और समावेशी जनगणना की पहचान है।


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