नौसेना के बेड़े में स्वदेशी ‘सूर्या’

Jitendra Kumar Sinha
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भारत की समुद्री शक्ति के लिए मंगलवार का दिन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया। विशाखापत्तनम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) में भारतीय नौसेना के पहले स्वदेशी फ्लीट सपोर्ट शिप ‘सूर्या’ का जलावतरण किया। यह केवल एक युद्धपोत का नौसेना के बेड़े में शामिल होना नहीं है, बल्कि समुद्री क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता और रक्षा उत्पादन की शक्ति का प्रतीक भी है। ‘सूर्या’ का जलावतरण ऐसे समय हुआ है, जब भारत अपनी समुद्री सुरक्षा को पहले से अधिक मजबूत बनाने के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका का विस्तार कर रहा है। आधुनिक नौसेना के लिए केवल युद्धपोत और पनडुब्बियां ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि लंबे समय तक समुद्र में तैनात रहने वाले जहाजों को निरंतर रसद और ईंधन उपलब्ध कराने वाले फ्लीट सपोर्ट शिप भी उतने ही आवश्यक है।


किसी भी नौसेना की वास्तविक क्षमता केवल उसके हथियारों से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह कितने लंबे समय तक समुद्र में अपने अभियानों को जारी रख सकती है। फ्लीट सपोर्ट शिप इसी आवश्यकता को पूरा करते हैं। ये जहाज समुद्र में तैनात नौसैनिक पोतों को ईंधन, आवश्यक सामग्री और अन्य लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रक्षा मंत्री ने ‘सूर्या’ को नौसेना की परिचालन पहुंच और लंबे समय तक अभियान चलाने की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया। इसका अर्थ है कि भारतीय नौसेना अपने युद्धपोतों को दूर-दराज के समुद्री क्षेत्रों में अधिक समय तक प्रभावी ढंग से तैनात रख सकेगी। आज जब हिंद महासागर क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुका है, तब ऐसी क्षमता भारत की समुद्री सुरक्षा नीति को नई मजबूती प्रदान करती है।


‘सूर्या’ की सबसे बड़ी विशेषता उसका स्वदेशी निर्माण है। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने और देश में ही अत्याधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्वदेशी फ्लीट सपोर्ट शिप इसी अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह उपलब्धि भारतीय जहाज निर्माण उद्योग के लिए भी उत्साह बढ़ाने वाली है। युद्धपोतों और सहायक पोतों का निर्माण अत्यंत जटिल तकनीकी प्रक्रिया है। इसमें डिजाइन, इंजीनियरिंग, भारी औद्योगिक उत्पादन, समुद्री परीक्षण और अत्याधुनिक प्रणालियों का एकीकरण शामिल होता है। इसलिए ‘सूर्या’ का निर्माण केवल नौसेना की जरूरत पूरी करने तक सीमित नहीं है। इससे देश के सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रमों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और संबंधित उद्योगों की क्षमता को भी बल मिलता है।


कार्यक्रम के दौरान राजनाथ सिंह ने एचएसएल में पांचवें फ्लीट सपोर्ट शिप के निर्माण कार्यक्रम की शुरुआत भी की। इससे स्पष्ट है कि भारत फ्लीट सपोर्ट क्षमता को एक जहाज तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत और व्यवस्थित बेड़ा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही उन्नत स्लिपवे-4 और 300 टन क्षमता वाले गोलियथ क्रेन का उद्घाटन भी किया गया। ये सुविधाएं जहाज निर्माण की क्षमता और गति बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास यह संकेत देता है कि भारत अब रक्षा उत्पादन में केवल आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बजाय दीर्घकालीन औद्योगिक क्षमता तैयार करने पर भी जोर दे रहा है।


भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर में स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण शक्ति बनाती है। देश के समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है। ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में निगरानी और संकट की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूत नौसैनिक क्षमता आवश्यक है। फ्लीट सपोर्ट शिप नौसेना के प्रमुख युद्धपोतों को लंबे अभियानों में बनाए रखने में मदद करते हैं। इससे भारतीय नौसेना की रीच, रफ्तार और स्थायित्व तीनों को मजबूती मिलती है। जरूरत पड़ने पर भारत अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए अधिक दूर तक और अधिक समय तक नौसैनिक उपस्थिति बनाए रख सकता है।


कुछ वर्ष पहले तक भारत को कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों और प्लेटफॉर्म के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। विमानवाहक पोत, विध्वंसक, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और विभिन्न प्रकार के सहायक पोत देश में बनाए जा रहे हैं। ‘सूर्या’ इसी बदलती तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। यह उपलब्धि बताती है कि आत्मनिर्भरता केवल नारा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे औद्योगिक क्षमता में बदल रही है।


‘सूर्या’ नाम अपने आप में प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक है। भारतीय नौसेना के बेड़े में इसका शामिल होना देश की समुद्री शक्ति के लिए भी नई रोशनी का संकेत माना जा सकता है। यह जहाज भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को बढ़ाने के साथ स्वदेशी जहाज निर्माण उद्योग के आत्मविश्वास को भी मजबूत करेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि रक्षा उत्पादन में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी को लगातार बढ़ाया जाए। ‘सूर्या’ का जलावतरण इसी दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। समुद्र की गहराइयों और विशाल विस्तार के बीच भारत अब अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए दूसरों की ओर देखने के बजाय अपने सामर्थ्य, अपनी तकनीक और अपने उद्योग पर भरोसा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।


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