11 अक्तूबर से शुरू होगा नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र

Jitendra Kumar Sinha
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शारदीय नवरात्र केवल नौ दिनों तक चलने वाला धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में शक्ति, साधना, संयम और आत्मविश्वास का पर्व है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले इस पर्व का इंतजार श्रद्धालुओं को पूरे वर्ष रहता है। इस बार 11 अक्तूबर से शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी। पटना सहित पूरे बिहार में इसकी तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। शहर के विभिन्न इलाकों में पूजा पंडालों का निर्माण शुरू हो चुका है, वहीं मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने के लिए कलाकार दिन-रात जुटे हुए हैं। पटना की दुर्गापूजा की अपनी अलग पहचान है। यहां पूजा केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि मोहल्लों, बाजारों और प्रमुख सड़कों तक इसकी भव्यता दिखाई देती है। बाहर से आए कलाकारों ने भी शहर में डेरा डाल दिया है। कहीं विशाल पंडाल की नींव तैयार हो रही है तो कहीं मिट्टी से देवी प्रतिमा का स्वरूप आकार ले रहा है। जैसे-जैसे नवरात्र की तारीख नजदीक आएगी, वैसे-वैसे शहर का धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण और अधिक जीवंत होता जाएगा।


इस वर्ष मां दुर्गा का आगमन हाथी पर होने की मान्यता बताई जा रही है। ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं में देवी के वाहन को विशेष संकेत के रूप में देखा जाता है। हाथी को ज्ञान, शांति, स्थिरता, वर्षा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण देवी का हाथी पर आगमन श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्सुकता पैदा कर रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हाथी विशालता, धैर्य और विवेक का प्रतीक है। ऐसे में देवी के हाथी पर आने को प्रकृति की अनुकूलता, सुख-समृद्धि और सामाजिक शांति से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन को लेकर अलग-अलग पंचांगों और क्षेत्रीय परंपराओं में गणना का अंतर मिल सकता है। इसलिए इसे ज्योतिषीय परंपरा और लोकमान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है।


इस बार मां की विदाई मुर्गे यानि चरणायुध पर होने की बात कही जा रही है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार नवरात्र का समापन मंगलवार को होने के कारण देवी के प्रस्थान का वाहन मुर्गा माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन को प्रतीकात्मक संकेतों के रूप में देखा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए इसका भाव यह है कि मां अपने भक्तों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति, साहस और विवेक प्रदान कर रही हैं। हाथी से जुड़े ज्ञान और स्थिरता के प्रतीक तथा मुर्गे से जुड़े जागरण और सक्रियता के भाव को मिलाकर देखें तो नवरात्र का संदेश और व्यापक हो जाता है कि शक्ति के साथ विवेक और साधना के साथ कर्म।


नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। प्रत्येक दिन देवी के अलग रूप की पूजा होती है। इन नौ रूपों को श्रद्धालु शक्ति के विभिन्न आयामों का प्रतीक मानते हैं।


11 अक्तूबर- नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी। पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में पूजित मां शैलपुत्री को शक्ति और दृढ़ता का स्वरूप माना जाता है। नवरात्र की शुरुआत उनके पूजन से होती है। भक्त इस दिन कलश स्थापना कर नौ दिनों की साधना का संकल्प लेते हैं।


12 अक्तूबर- दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाएगी। उनका स्वरूप तप, त्याग और संयम का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से साधक को धैर्य और आत्मसंयम की प्रेरणा मिलती है।


13 अक्तूबर- तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होगी। उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका स्वरूप शौर्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता है।


14 अक्तूबर- चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होगी। धार्मिक परंपरा में उन्हें सृष्टि की ऊर्जा और प्रकाश से जोड़कर देखा जाता है। भक्त इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और मंत्र जाप करते हैं।


15 अक्तूबर- पंचमी तिथि को मां स्कंदमाता की आराधना होगी। उन्हें भगवान कार्तिकेय की माता के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप मातृत्व, करुणा और शक्ति का संदेश देता है।


16 अक्तूबर- षष्ठी के दिन मां कात्यायनी की आराधना होगी। इस दिन से दुर्गापूजा का माहौल और अधिक व्यापक होने लगेगा। कई स्थानों पर पूजा पंडालों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे।


17 अक्तूबर- सप्तमी को मां कालरात्रि की पूजा होगी। उनका स्वरूप शक्ति के उग्र और रक्षक रूप का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और साहस की कामना करते हैं।


18 अक्तूबर- अष्टमी को मां महागौरी की पूजा होगी। यह दिन नवरात्र के प्रमुख दिनों में शामिल है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अष्टमी व्रत रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।


19 अक्तूबर- नवमी को मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नवरात्र के अंतिम दिन भक्त विशेष हवन, कन्या पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इस बार तिथियों की स्थिति के कारण अष्टमी और नवमी से जुड़े अनुष्ठानों का विशेष महत्व रहेगा।


20 अक्तूबर- 20 अक्तूबर को दशमी के दिन मां की विदाई होगी। पूजा पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा और इसके साथ नौ दिवसीय नवरात्र तथा दुर्गापूजा का समापन होगा।


नवरात्र का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान कलश या घट स्थापना माना जाता है। इस वर्ष 11 अक्तूबर को घट स्थापना की जाएगी। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 5:46 बजे से 9:39 बजे तक बताया गया है। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त सुबह 11.13 बजे से 11.59 बजे तक रहेगा। बताया जा रहा है कि इस दिन चित्रा नक्षत्र रात 10.32 बजे तक तथा वैधृति योग रात 9.05 बजे तक रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ये स्थितियां सामान्य रूप से घट स्थापना के लिए निषिद्ध मानी जाती हैं, लेकिन शास्त्रीय विधान में मध्याह्न से पहले घट स्थापना का प्रावधान बताया गया है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग और विद्वान आचार्य से समय की पुष्टि करके पूजा करना उचित रहेगा। घट स्थापना के साथ ही नवरात्र की विधिवत शुरुआत मानी जाती है। कलश में जल भरकर उसके ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है और देवी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक अखंड दीप, दुर्गा सप्तशती पाठ, मंत्र जाप और अन्य अनुष्ठान किए जाते हैं।


इस वर्ष अष्टमी और नवमी की तिथियों को लेकर भी विशेष स्थिति रहेगी। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 19 अक्तूबर को सुबह 10.51 बजे तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि शुरू होगी, जो 20 अक्तूबर को दोपहर बाद समाप्त होगी। 19 अक्तूबर को अष्टमी और नवमी तिथि के बीच संधि काल रहेगा। धार्मिक परंपरा में इस समय की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। संधि पूजा के दौरान देवी की विशेष आराधना की जाती है। इसी दिन नवमी तिथि का हवन और कन्या पूजन करना भी श्रेयस्कर माना गया है। महानवमी हवन के लिए सुबह 11.44 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक का समय विशेष रूप से उपयुक्त बताया गया है।


दुर्गापूजा की परंपराओं में क्षेत्रीय विविधता सदियों से दिखाई देती रही है। बिहार और उत्तर भारत में जहां नवरात्र के नौ दिनों की पूजा की अपनी विशिष्ट परंपरा है, वहीं पश्चिम बंगाल की दुर्गापूजा में षष्ठी से लेकर विजयादशमी तक अलग-अलग अनुष्ठानों का विशेष महत्व रहता है। इसी कारण इस वर्ष भी बंगाल और उत्तर भारतीय परंपराओं के बीच तिथियों को लेकर थोड़ा अंतर दिखाई देगा। ऋषिकेश पंचांग के अनुसार 16 अक्तूबर को मां कात्यायनी की महाषष्ठी पूजा होगी। बंगाल की परंपरा के अनुसार 17 अक्तूबर को देवी का बोधन, आमंत्रण और अधिवास किया जाएगा। यह अंतर किसी विवाद का विषय नहीं है, बल्कि भारत की विविध धार्मिक परंपराओं की विशेषता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पंचांग गणना, पूजा पद्धति और अनुष्ठानों के क्रम में अंतर होते हुए भी केंद्र में मां दुर्गा की आराधना और शक्ति की उपासना ही रहती है।


नवरात्र और दुर्गापूजा को लेकर पटना में तैयारियां अब दिखाई देने लगी हैं। शहर के विभिन्न हिस्सों में पूजा समितियों ने पंडाल निर्माण शुरू कर दिया है। कई जगहों पर बांस-बल्लियों का ढांचा तैयार किया जा रहा है तो कुछ स्थानों पर थीम आधारित पंडालों की नींव रखी जा चुकी है। मां दुर्गा की प्रतिमाओं के निर्माण का काम भी तेजी से चल रहा है। प्रतिमा निर्माण के लिए शहर के बाहर से दर्जनों कलाकार पटना पहुंच चुके हैं। मिट्टी के ढांचे से लेकर रंग-रोगन और आभूषणों तक, प्रतिमा निर्माण के अलग-अलग चरणों में कारीगर जुटे हैं। दुर्गापूजा के साथ पटना में स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। पंडाल निर्माण से जुड़े मजदूरों, कलाकारों, मूर्तिकारों, सजावट करने वाले कारीगरों, बिजली और रोशनी से जुड़े तकनीशियनों तथा छोटे-बड़े दुकानदारों के लिए यह समय विशेष गतिविधियों वाला होता है।


शारदीय नवरात्र भारतीय जीवन में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता का भी पर्व है। पूजा पंडाल लोगों के मिलने-जुलने का केंद्र बनते हैं। परिवार के सदस्य साथ निकलते हैं, बच्चे सजावट देखते हैं और युवा पूजा समितियों की व्यवस्थाओं में भाग लेते हैं। पटना जैसे शहर में नवरात्र का स्वरूप और भी व्यापक हो जाता है। यहां धार्मिक आयोजन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन, जागरण और सामाजिक गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं। अलग-अलग मोहल्लों की पूजा समितियां अपनी-अपनी परंपराओं और रचनात्मकता के अनुसार आयोजन करती हैं। लेकिन इस पूरे उत्सव का मूल भाव मां दुर्गा की आराधना ही है। नवरात्र मनुष्य को यह संदेश देता है कि जीवन में शक्ति का अर्थ केवल बाहरी सामर्थ्य नहीं, बल्कि धैर्य, संयम, विवेक, साहस और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता भी है।


नवरात्र की नौ रातें साधना की प्रतीक है और विजयादशमी उसके पूर्ण होने का उत्सव। मां के नौ स्वरूपों की पूजा के माध्यम से भारतीय परंपरा शक्ति के अलग-अलग रूपों को सामने रखती है। कहीं मां तप की प्रेरणा देती हैं, कहीं मातृत्व की, कहीं साहस की और कहीं अज्ञान पर ज्ञान की विजय का संदेश देती हैं। इस बार हाथी पर देवी के आगमन की मान्यता को ज्ञान, शांति और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जबकि मुर्गे पर विदाई की परंपरा को जागरण और सक्रियता के भाव से जोड़ा जा सकता है। इन धार्मिक प्रतीकों का वास्तविक उद्देश्य भक्त के भीतर सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और सद्भाव की भावना जगाना है। 11 अक्तूबर से शुरू होकर 20 अक्तूबर तक चलने वाला यह पर्व पटना को भक्ति, रोशनी, रंग और सांस्कृतिक उल्लास से भर देगा। मंदिरों से लेकर पूजा पंडालों तक देवी मंत्रों की गूंज सुनाई देगी और श्रद्धालु मां के नौ स्वरूपों के दर्शन कर सुख-शांति, समृद्धि और शक्ति की कामना करेंगे। नवरात्र का संदेश यही है कि मन में श्रद्धा हो, कर्म में शक्ति हो, विचारों में विवेक हो और जीवन में सत्य का प्रकाश हो।


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