नए महीने का सूरज, नई सत्ता की चाल और सिपहसालारों की बदलती निष्ठा

Jitendra Kumar Sinha
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कहते हैं कि नया महीना नई उम्मीदें लेकर आता है। कैलेंडर का एक पन्ना पलटता है और आदमी सोचता है कि शायद अब कुछ बदलेगा। वेतन की तारीख वही रहती है, बिजली का बिल वही रहता है, पेट्रोल की कीमत देखकर वही पुराना माथा घूमता है और सरकारी दफ्तर में फाइल की चाल भी लगभग वही रहती है। लेकिन सरकारें चाहें तो महीने के पहले दिन ही इतना कुछ बदल सकती है कि आदमी को अपने ही राज्य में नया नागरिक होने का अहसास होने लगे। सरकार का निर्णय आखिर सरकार का निर्णय होता है। कब क्या बदलना है, कितना बदलना है, किसे बदलना है और किसे यथावत रखना है, इसका गणित आम आदमी की समझ से बाहर ही रहता है। वह तो केवल परिणाम देखता है। सत्ता के गलियारों में इसका अपना विज्ञान है और राजनीति में इसकी अपनी कला। राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो वर्षों पुरानी व्यवस्था भी रातोंरात बदल सकती है और इच्छा शक्ति न हो तो नई व्यवस्था भी पुरानी आदतों के साथ चलती रहती है। लेकिन सत्ता की मशीनरी को चलाने के लिए केवल कुर्सी पर्याप्त नहीं होती। कुर्सी पर बैठा व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, व्यवस्था को गति देने के लिए उसके आसपास बैठे सिपहसालारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है और यहीं से शुरू होती है हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे दिलचस्प कहानी “सत्ता बदलती है तो निष्ठा की परिभाषा भी बदल जाती है”।


बिहार की राजनीति ने लंबे समय से सत्ता परिवर्तन, गठबंधन परिवर्तन और राजनीतिक समीकरणों के अनेक रंग देखे हैं। अप्रैल 2026 में एक बड़ा बदलाव हुआ। 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बस, इसके बाद राजनीति के साथ-साथ सरकारी गलियारों में भी एक स्वाभाविक सवाल पैदा हुआ, अब व्यवस्था किस अंदाज में चलेगी? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार केवल मुख्यमंत्री और मंत्रियों से नहीं चलती है। सरकार सचिवालय की फाइलों, विभागीय अधिकारियों, सलाहकारों, कर्मचारियों और उन तमाम अदृश्य पहियों से चलती है, जिन्हें जनता चुनावी मंच पर कभी नहीं देखती। मुख्यमंत्री बदलता है तो सबसे पहले कुर्सी बदलती है। उसके बाद कमरे की सजावट बदलती है। फिर बैठने का क्रम बदलता है। उसके बाद मुलाकात का समय बदलता है। फिर धीरे-धीरे यह पता चलता है कि कौन पहले दरवाजे तक जाता था और अब किस दरवाजे से लौट रहा है। राजनीति में इसे परिवर्तन कहते हैं और व्यंग्यकार इसे कहते हैं “हवा का रुख समझना।”


राजनीति में विचारधारा की चर्चा खूब होती है। सिद्धांतों की चर्चा होती है। जनसेवा की चर्चा होती है। विकास की चर्चा होती है। लेकिन सत्ता के गलियारों में एक और शब्द चुपचाप चलता रहता है “निष्ठा”। निष्ठा बड़ी अद्भुत चीज है। यह कभी व्यक्ति के प्रति होती है, कभी पद के प्रति, कभी पार्टी के प्रति, कभी विचार के प्रति और कभी-कभी परिस्थितियों के प्रति भी। समस्या तब पैदा होती है जब निष्ठा का केंद्र बदल जाता है। कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को देखकर यदि कोई व्यक्ति कहे कि “हम तो हमेशा से आपके साथ थे”, तो कुर्सी पर बैठा व्यक्ति मुस्कुराता जरूर है, लेकिन मन ही मन शायद यह जरूर सोचता है कि “हमसे पहले वाली कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के साथ भी क्या आप हमेशा से ऐसे ही थे?” यही लोकतंत्र का सबसे मनोरंजक प्रश्न है। क्योंकि सत्ता के गलियारों में पुरानी तस्वीरें बहुत कुछ बताती है। कौन किसके साथ खड़ा था, कौन किसके साथ बैठा था, किसकी गाड़ी में कौन बैठता था और किसके कमरे में किसका आना-जाना था, यह सब सत्ता बदलते ही अचानक इतिहास बन जाता है।


बिहार ने करीब दो दशक तक नीतीश कुमार के नेतृत्व का लंबा दौर देखा है। आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल 24 नवंबर 2005 से दर्ज है, हालांकि बीच में राजनीतिक घटनाक्रम और पद परिवर्तन भी हुए। अप्रैल 2026 में उनके मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सम्राट चौधरी ने पद संभाला। इतने लंबे राजनीतिक दौर को केवल वर्षों की संख्या से नहीं समझा जा सकता है। यह एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी का अनुभव है। इस दौरान अधिकारी बदले, मंत्री बदले, विभाग बदले, गठबंधन बदले, राजनीतिक समीकरण बदले और समय के साथ गंगा में पानी भी घटा-बढ़ा। लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो बदलती हुई भी नहीं बदलती। मसलन “व्यवस्था से तालमेल”। जो अधिकारी एक सरकार की प्राथमिकताओं को समझने में माहिर होता है, वह दूसरी सरकार की प्राथमिकताओं को भी समझने में देर नहीं लगाता। जो राजनीतिक कार्यकर्ता वर्षों तक सत्ता की भाषा समझता आया है, वह नई सत्ता की भाषा भी जल्दी सीख लेता है। यही प्रशासनिक निरंतरता भी है और राजनीतिक व्यावहारिकता भी। व्यंग्यकार बस इतना पूछता है कि इतनी जल्दी नई भाषा कैसे आ जाती है?


सत्ता के लंबे गलियारों में कुछ नाम दीपक की लौ की तरह दिखाई देते हैं। कोई अंजनी, कोई चंचल, कोई अमीर, कोई अनुपम, कोई रवि, कोई चंद्रशेखर, कोई सुधीर, कोई किशोर… इन नामों को केवल व्यक्तियों की सूची समझना भूल होगी। यह तो उस व्यवस्था का प्रतीक हैं जिसमें अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोग अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। कुछ दीपक टिमटिमाते हैं। कुछ तेज जलते हैं। कुछ हवा का रुख देखकर अपनी लौ संभाल लेते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो पूरी रात अखंड दीप की तरह जलते दिखाई देते हैं। लेकिन सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अखंड दीप भी अंततः दीप ही होता है। तेल समाप्त हुआ तो लौ समाप्त। कल तक जो दीपक सत्ता के गलियारे को रोशन कर रहा था, आज उसके स्थान पर नया दीपक रखा जा सकता है। नई सरकार आती है तो वह केवल नई योजनाएं नहीं लाती। वह यह भी देखती है कि पुराने दीपकों में से कौन कितनी रोशनी दे सकता है और कौन अपनी लौ लेकर इतिहास के अंधेरे कमरे में चला जाए।


सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार सरकार की आधिकारिक सूचनाओं में नई सरकार की गतिविधियां लगातार दर्ज होती रही हैं। 16 अप्रैल को उन्होंने उपमुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली पर चर्चा की थी। यानि नई कुर्सी पर बैठते ही सबसे पहला काम यही था कि पुरानी मशीनरी को समझा जाए। यह जरूरी भी है। क्योंकि मुख्यमंत्री चाहे नया हो, लेकिन सचिवालय नया नहीं होता। फाइलें पुरानी होती है, नियम पुराने होते हैं, कानून पुराने होते हैं, विभागों की संरचना पुरानी होती है और जनता की समस्याएं तो उससे भी पुरानी होती है। नई सरकार को इन्हीं पुराने औजारों से नई तस्वीर बनानी होती है। यहीं असली परीक्षा शुरू होती है।


कुर्सी बदलना राजनीतिक प्रक्रिया है। कुर्सी की संस्कृति बदलना प्रशासनिक चुनौती। किसी मुख्यमंत्री के आते ही नामपट्ट बदल सकता है। तस्वीर बदल सकती है। बैठक की व्यवस्था बदल सकती है। संबोधन बदल सकता है। लेकिन क्या फाइल की गति बदलती है? क्या आम आदमी को कार्यालय के चक्कर कम लगाने पड़ते हैं? क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होती है? क्या भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कार्रवाई की गति बढ़ती है? क्या अधिकारी जवाबदेह महसूस करते हैं? क्या जनता को लगता है कि सरकार उसके दरवाजे तक पहुंची है? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब समय देता है। क्योंकि सत्ता के शुरुआती दिनों में हर सरकार तेज दिखाई देती है। असली परीक्षा तब होती है जब शुरुआती उत्साह समाप्त हो जाता है और रोजमर्रा का प्रशासन शुरू होता है।


राजा बदलता है तो दरबारियों की परीक्षा होती है, यह कहावत पुरानी है। लोकतंत्र में राजा नहीं होता, सरकार होती है, दरबारी नहीं होते, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक तंत्र होता है। लेकिन व्यंग्य को अपना रास्ता चाहिए, इसलिए हम इन्हें सिपहसालार ही कहेंगे। सिपहसालार की असली परीक्षा तब होती है जब उसे नई सरकार की प्राथमिकताओं के अनुसार काम करना पड़ता है। कल तक जिस फाइल को “बहुत महत्वपूर्ण” बताया जा रहा था, आज वही फाइल अलमारी में नीचे क्यों चली गई? कल जिस योजना को “ऐतिहासिक” कहा जा रहा था, आज उसके बारे में कोई बात क्यों नहीं कर रहा? कल जिस अधिकारी की कार्यशैली की प्रशंसा हो रही थी, आज उसके कमरे का रास्ता लंबा क्यों हो गया? यही तो सत्ता का खेल है और इसमें सबसे चतुर वह नहीं जो किसी एक व्यक्ति के प्रति निष्ठावान दिखाई दे, बल्कि वह है जो संविधान, कानून और संस्थागत जिम्मेदारी के प्रति अपनी निष्ठा कायम रखे। क्योंकि व्यक्ति बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन राज्य चलता रहता है।


राजनीतिक व्यंग्य में इसे चाहे “सम्राट युग” कहें या नई सरकार का दौर, तथ्य इतना है कि अप्रैल 2026 से बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं। बिहार सरकार की आधिकारिक वेबसाइट भी 1 अक्टूबर 2026 को उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज करती है। इसलिए 1 अक्टूबर को नए महीने के साथ एक अलग राजनीतिक प्रतीक जरूर दिखाई देता है। अब प्रश्न यह नहीं है कि कुर्सी पर कौन बैठा है। प्रश्न यह है कि कुर्सी पर बैठने के बाद वह कुर्सी को किस तरह चलाता है। कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। वह जनता की ओर से मिली जिम्मेदारी होती है। इसलिए “सम्राट राज” का असली अर्थ भी व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि नई प्रशासनिक कार्यशैली की परीक्षा होना चाहिए। नाम बदलने से शासन नहीं बदलता है। शासन तब बदलता है जब निर्णय लेने की गति बदलती है, जवाबदेही बदलती है और जनता को मिलने वाली सेवा बदलती है।


सही व्यंग्यात्मक संकेत है कि कुर्सी बदली तो पांव भी बदलने जरूरी होते हैं। वरना पुरानी कुर्सी के हिसाब से बने पांव नई कुर्सी को कब असंतुलित कर दे, पता नहीं चलता है। लेकिन एक और बात भी जरूरी है। पांव बदलने के साथ दिशा भी बदलनी चाहिए। यदि कुर्सी नई है, पांव नए हैं, गाड़ी नई है, ड्राइवर नया है, लेकिन रास्ता वही पुराना है और मंजिल भी वही है, तो यात्रा में नया क्या हुआ? नई सरकार का मतलब केवल नए चेहरे नहीं होना चाहिए। नई सरकार का मतलब होना चाहिए, नई प्राथमिकताएं, नई कार्यसंस्कृति, नई जवाबदेही और पुराने प्रशासनिक ढर्रे पर नई नजर। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक परिवर्तन प्रशासनिक परिवर्तन में बदलता है।


केंद्र सरकार समय-समय पर ऐसे निर्णय लेती है जिनका प्रभाव देशभर के नागरिकों की जेब, कारोबार, तकनीक और दैनिक जीवन पर पड़ता है। नए महीने के साथ केंद्र के कई नियम और प्रावधान लागू होते हैं। आम आदमी के लिए इनका अर्थ अक्सर यही होता है कि किसी फॉर्म में एक कॉलम बढ़ गया, किसी भुगतान पर नया नियम आ गया, किसी सेवा का तरीका बदल गया या किसी सुविधा की शर्त बदल गई। लेकिन बिहार का बदलाव थोड़ा अलग है। यहां प्रश्न सीधे प्रशासन से जुड़ता है। पटना के सचिवालय से निकला आदेश गांव के प्रखंड कार्यालय तक जाता है। वहां से पंचायत तक पहुंचता है और अंततः उसी आम आदमी के दरवाजे तक आता है जिसने सरकार को चुना है। इसलिए बिहार सरकार में परिवर्तन का वास्तविक अर्थ तभी दिखाई देगा जब सत्ता की नई ऊर्जा प्रशासन के अंतिम छोर तक पहुंचेगी।


नई सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि वह पुराने दौर से कितनी अलग दिखाई देती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने निर्णयों की जिम्मेदारी कितनी मजबूती से उठा पाती है। आत्मनिर्भर सरकार का अर्थ केवल यह नहीं कि मुख्यमंत्री स्वतंत्र होकर निर्णय ले। आत्मनिर्भरता का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने फैसलों के परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करे। अच्छा हुआ तो श्रेय लेना आसान है। मुश्किल हुआ तो परिस्थिति, पूर्ववर्ती सरकार, अधिकारी, मौसम, बाजार और कभी-कभी विपक्ष तक को दोष देना भी आसान है। लेकिन शासन का असली अर्थ है ‘निर्णय मेरा, जिम्मेदारी भी मेरी’। यही किसी भी नई सरकार की सबसे कठिन परीक्षा है।


हमारे लोकतंत्र को सबसे ज्यादा जरूरत इसी बात की है कि निष्ठा किसी व्यक्ति की कुर्सी से नहीं, संविधान और जनता से हो। सरकार बदले तो अधिकारी कानून के प्रति उतना ही निष्ठावान रहे। मंत्री बदले तो विभागीय व्यवस्था नियमों के अनुसार चलती रहे। मुख्यमंत्री बदले तो विकास योजनाएं केवल राजनीतिक रंग बदलने के कारण बंद न हो और नई सरकार आए तो केवल इसलिए पुराने लोगों को किनारे न किया जाए कि वे पुरानी व्यवस्था में काम करते थे। क्योंकि प्रशासन में अनुभव भी संपत्ति है। हां, जहां जवाबदेही का प्रश्न हो वहां कार्रवाई भी आवश्यक है। लेकिन बदलाव का अर्थ प्रतिशोध नहीं होना चाहिए। नई सत्ता की सबसे बड़ी ताकत यही होगी कि वह व्यक्ति-आधारित व्यवस्था से संस्थागत व्यवस्था की ओर बढ़े।


नया महीना शुरू हो गया है। राजनीति कह रही है कि बिहार में नई सरकार का दौर चल रहा है। प्रशासन कह रहा है कि काम पहले भी था, अब भी है और जनता शायद चुपचाप कह रही है कि हमें तारीख नहीं, परिणाम चाहिए। जनता को इससे बहुत मतलब नहीं कि फाइल पर किसके हस्ताक्षर है। उसे मतलब है कि उसका काम हुआ या नहीं। उसे इससे मतलब नहीं कि सचिवालय में किसका कक्ष बड़ा है। उसे मतलब है कि प्रखंड कार्यालय में उसका काम कितने दिनों में हुआ। उसे इससे मतलब नहीं है कि किस नेता की निष्ठा किसके प्रति है। उसे मतलब है कि सरकार उसकी निष्ठा यानि उसके वोट और विश्वास का सम्मान करती है या नहीं।


सत्ता में व्यक्ति आते-जाते हैं। दीपक जलते-बुझते हैं। सिपहसालार बदलते हैं। दरबार की कुर्सियां बदलती हैं। नामपट्ट बदलते हैं। लेकिन बिहार की जनता वहीं रहती है। वही किसान खेत में जाता है। वही मजदूर काम की तलाश में निकलता है। वही युवा नौकरी की उम्मीद करता है। वही माता-पिता बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंतित रहते हैं। वही व्यापारी बाजार में ग्राहक तलाशता है। वही बुजुर्ग पेंशन और स्वास्थ्य की चिंता करता है। इसलिए किसी भी सत्ता का मूल्यांकन अंततः इन्हीं लोगों के जीवन से होना चाहिए। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने यही अवसर है कि राजनीतिक परिवर्तन को प्रशासनिक परिणामों में बदला जाए। आधिकारिक रूप से सरकार ने विकास, सुशासन, निवेश और सार्वजनिक सेवा जैसे लक्ष्यों को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। अब देखना यही है कि ये शब्द फाइलों में कितने सुंदर दिखते हैं और धरातल पर कितने उपयोगी साबित होते हैं।


व्यंग्य का सबसे बड़ा मजा यही है कि वह मुस्कुराते हुए गंभीर प्रश्न पूछ देता है। आज प्रश्न यह नहीं है कि बिहार में कौन आया और कौन गया। प्रश्न यह है कि बिहार कितना बदला? प्रश्न यह नहीं है कि किस सिपहसालार की लौ तेज रही और किसका दीपक बुझ गया। प्रश्न यह है कि राज्य की व्यवस्था में रोशनी कितनी बढ़ी। प्रश्न यह नहीं है कि किसकी निष्ठा किस कुर्सी से थी। प्रश्न यह है कि व्यवस्था की निष्ठा जनता के प्रति कितनी रही। सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है। लेकिन हर परिवर्तन अपने साथ उम्मीद लेकर आता है। नई सरकार को उस उम्मीद का हिसाब देना होता है। कुर्सी बदलना आसान है। कुर्सी पर बैठकर इतिहास बदलना कठिन है। नामपट्ट बदलना आसान है। व्यवस्था की आदत बदलना कठिन है। सिपहसालार बदलना आसान है। सिपहसालारों में जवाबदेही पैदा करना कठिन है और सबसे कठिन है जनता के मन में यह विश्वास पैदा करना कि सरकार बदली है तो शासन भी बदलेगा। इसलिए नए महीने की शुरुआत में बिहार की राजनीति के लिए यही सबसे बड़ा व्यंग्यात्मक संदेश है कि दीपक चाहे पुराना हो या नया, जनता को रोशनी चाहिए। कुर्सी चाहे किसी की हो, जनता को शासन चाहिए। सत्ता चाहे किसी की हो, जवाबदेही जनता के प्रति होनी चाहिए और अगर सचमुच “सम्राट युग” शुरू हो चुका है, तो इतिहास इसका फैसला भाषणों से नहीं, काम के परिणामों से करेगा। क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सी पांच साल की हो सकती है, लेकिन जनता की याददाश्त उससे कहीं लंबी होती है।


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