समान नागरिक संहिता लागू करने वाला दूसरा राज्य बना “गुजरात”

Jitendra Kumar Sinha
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देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही चर्चा के बीच गुजरात ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही गुजरात उत्तराखंड के बाद समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून को मंजूरी प्राप्त करने वाला दूसरा राज्य बन गया है। इस कानून का प्रमुख उद्देश्य विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना है। विधेयक में विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण का प्रावधान किया गया है, जबकि बहुविवाह पर रोक लगाने की व्यवस्था भी शामिल है। यूसीसी का मुद्दा लंबे समय से देश की राजनीति, समाज और कानून से जुड़ी बहस का हिस्सा रहा है। इसके समर्थक इसे समानता और लैंगिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं, जबकि इसके कुछ आलोचक धार्मिक स्वतंत्रता, पारंपरिक रीति-रिवाजों और विभिन्न समुदायों की विशिष्ट सामाजिक व्यवस्थाओं पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। गुजरात में इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इन विषयों पर चर्चा एक बार फिर तेज होने की संभावना है।


समान नागरिक संहिता का अर्थ ऐसे कानूनों की व्यवस्था से है, जिसके अंतर्गत नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कुछ प्रमुख नागरिक मामलों को समान कानूनी ढांचे में लाया जाता है। भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार से संबंधित कई विषयों पर अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून और परंपराएं लागू रही हैं। यूसीसी का उद्देश्य इन मामलों में एक साझा कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। यह प्रावधान राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है। हालांकि, इसे लागू करने के तरीके और इसके दायरे को लेकर देश में लंबे समय से संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श चलता रहा है।


गुजरात यूसीसी कानून में विवाह और तलाक से संबंधित प्रावधानों को समान कानूनी ढांचे में लाने का प्रयास किया गया है। इसके तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है। विवाह धार्मिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक समारोहों के अनुसार संपन्न किए जा सकेंगे, लेकिन उन्हें कानून में निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा। विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। कानून में एक से अधिक विवाह पर रोक का भी प्रावधान है। इसके अनुसार, किसी व्यक्ति का जीवनसाथी जीवित रहने की स्थिति में दूसरा विवाह करना प्रतिबंधित होगा। तलाक के लिए भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसका उद्देश्य वैवाहिक संबंधों के विच्छेद, संबंधित अधिकारों और कानूनी दायित्वों के मामलों में एक समान व्यवस्था स्थापित करना है। हालांकि, कानून का वास्तविक प्रभाव इसके प्रावधानों और लागू करने के लिए बनाए जाने वाले नियमों के अनुरूप होगा।


इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू लिव-इन संबंधों का नियमन है। इसके अंतर्गत ऐसे संबंधों में रहने वाले जोड़ों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पंजीकरण कराना होगा। संबंध समाप्त होने की स्थिति में भी संबंधित प्रक्रिया का पालन करने का प्रावधान है। कानून में लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को मान्यता देने की व्यवस्था भी की गई है। इसके पीछे बच्चों के कानूनी संरक्षण और उनके अधिकारों को स्पष्ट करने का उद्देश्य बताया गया है। हालांकि, पंजीकरण संबंधी प्रावधानों को लेकर निजता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक निगरानी जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण होंगे। इन प्रावधानों का व्यावहारिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य सरकार नियमों को किस प्रकार लागू करती है और संबंधित अधिकारी उनका पालन कैसे सुनिश्चित करते हैं।


गुजरात की समान नागरिक संहिता केवल विवाह और तलाक तक सीमित नहीं है। इसमें उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे विषयों को भी शामिल किया गया है। वसीयत के बिना किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर निर्धारित कानूनी व्यवस्था लागू होगी। कानून में बेटे और बेटी के अधिकारों को समान आधार पर रखने से संबंधित प्रावधान भी हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य पारिवारिक विवादों में कानूनी स्पष्टता बढ़ाना और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों के लिए एक साझा ढांचा तैयार करना है। हालांकि, संपत्ति के वास्तविक बंटवारे में संबंधित प्रावधानों, पारिवारिक परिस्थितियों और कानून के दायरे को ध्यान में रखना होगा।


समान नागरिक संहिता को लेकर एक ओर समानता, लैंगिक न्याय और कानूनी स्पष्टता की अपेक्षाएं हैं, तो दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानूनों और पारंपरिक प्रथाओं के संरक्षण से जुड़े प्रश्न भी हैं। इसीलिए किसी भी समान नागरिक संहिता का मूल्यांकन उसके प्रावधानों, संवैधानिक सीमाओं और विभिन्न समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर किया जाना आवश्यक है। गुजरात के कानून में अनुसूचित जनजातियों तथा संविधान के तहत संरक्षित कुछ पारंपरिक अधिकारों वाले समूहों को दायरे से बाहर रखा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि कानून का दायरा निर्धारित करते समय कुछ संवैधानिक अपवाद भी रखे गए हैं।


राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने से गुजरात की समान नागरिक संहिता को विधायी स्वीकृति मिल गई है। हालांकि, कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार को आवश्यक नियम बनाने और लागू होने की तारीख अधिसूचित करने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसलिए राष्ट्रपति की मंजूरी और कानून के वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर को समझना जरूरी है। गौरतलब है कि गुजरात को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के समय उत्तराखंड के बाद दूसरा राज्य बताया गया था। लेकिन 29 सितंबर 2026 को असम के समान नागरिक संहिता विधेयक को भी राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है। इस प्रकार, तीन राज्यों “उत्तराखंड, गुजरात और असम” के यूसीसी विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल चुकी है। गुजरात का यह कानून देश में व्यक्तिगत नागरिक कानूनों को समान बनाने की बहस में एक नया अध्याय जोड़ता है। इसकी सफलता का आकलन कानून के उद्देश्य के साथ-साथ उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन, नागरिक अधिकारों के संरक्षण और सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर किया जाएगा।


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