राजनीति का व्यवहारिक अर्थ सत्ता, शासन और व्यवस्था के संचालन की प्रक्रिया में भागीदारी से जुड़ा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति के मूलतः दो ही स्वरूप होते हैं ‘पक्ष और विपक्ष’। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करके तय करती है कि सत्ता का संचालन कौन करेगा और सरकार के निर्णयों पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी किस विपक्ष को सौंपी जाएगी। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि सत्ता किसी की स्थायी जागीर नहीं होती है। जनता चाहे तो किसी को सत्ता के शिखर पर पहुंचा सकती है और चाहे तो उसे विपक्ष की पंक्ति में बैठा सकती है।
सवाल यह है कि पक्ष में कैसे आया जाए? जनता का विश्वास कैसे जीता जाए? सत्ता तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दल क्या-क्या करते हैं? यहीं से राजनीति का वह व्यावहारिक और कभी-कभी विवादास्पद चेहरा सामने आता है, जहां सिद्धांतों के साथ रणनीतियां, जनसेवा के साथ सत्ता की महत्वाकांक्षा और सच्चाई के साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी अपना स्थान बना लेते हैं। चुनावी राजनीति में वास्तविकता भी होती है और अवास्तविकता भी, निश्छलता भी होती है और कपटता भी। कहीं जनहित की चिंता दिखाई देती है तो कहीं सत्ता प्राप्ति की बेचैनी।
राजनीति के इस खेल में साम, दाम, दंड और भेद की नीति का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। अंतर केवल इतना है कि लोकतंत्र में इन राजनीतिक हथकंडों की अंतिम परीक्षा जनता की अदालत में होती है। जनता ही तय करती है कि कौन पक्ष में बैठेगा और कौन विपक्ष में। लेकिन जब इसी निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े होने लगे, तब मामला केवल सत्ता और विपक्ष का नहीं रह जाता है, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है।
पिछले कुछ महीनों से, या कहें कि लगभग एक वर्ष से, देश की राजनीति में मतदान प्रक्रिया को लेकर एक असामान्य संघर्ष देखने को मिल रहा है। विपक्ष लगातार वोट चोरी, मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर चुनाव आयोग इन आरोपों के संदर्भ में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों और प्रक्रियाओं का पक्ष रखता रहा है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव कराना अपने आप में दुनिया की सबसे जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं में से एक है। करोड़ों मतदाता, लाखों मतदान केंद्र, अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां और विविध सामाजिक परिवेश के बीच चुनाव संपन्न कराना आसान काम नहीं है। इसके बावजूद भारत की चुनावी व्यवस्था ने दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। आजादी के बाद से लगातार हुए चुनावों ने लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत किया है। समय-समय पर चुनावी व्यवस्था में सुधार भी हुए हैं और कमियां सामने आने पर उन्हें दूर करने के प्रयास भी किए गए हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि भारतीय चुनाव व्यवस्था कभी विवादों से पूरी तरह अछूती रही है। चुनावी शिकायतें, धांधली के आरोप और राजनीतिक असंतोष पहले भी सामने आते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि आज जिस व्यापकता और तीव्रता से पूरी चुनावी प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, उसके पीछे ठोस तथ्य कितने हैं और राजनीतिक रणनीति कितनी?
यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची से संबंधित गड़बड़ी है, किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है या किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है, तो इसकी जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार किसी एक दल की बपौती नहीं है। लेकिन सवाल पूछने और पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने के बीच एक महीन अंतर है। इस अंतर को समझना आज की राजनीति के लिए बेहद जरूरी है।
भारत के चुनावी इतिहास में टी.एन. शेषन का नाम एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में चुनाव आयोग की शक्तियों का प्रभावशाली इस्तेमाल किया और चुनावी आचार संहिता को गंभीरता से लागू कराने की दिशा में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट संदेश मिला कि चुनाव आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं, बल्कि चुनावी मर्यादाओं की रक्षा करने वाला संवैधानिक प्रहरी भी है।
उनके बाद भी अनेक मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। के.जे. राव जैसे चुनाव अधिकारियों की भूमिका भी चुनावी निष्पक्षता और निगरानी के संदर्भ में चर्चा में रही। अलग-अलग समय पर चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों और सरकारों के दबाव के बीच अपनी संवैधानिक भूमिका निभाने का प्रयास किया।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर इतने बड़े स्तर पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? क्या चुनावी व्यवस्था में वास्तव में ऐसी गंभीर खामियां पैदा हुई हैं जिन्हें तत्काल सुधारने की जरूरत है? या फिर चुनावी पराजय के बाद राजनीतिक दलों ने संस्थाओं को निशाने पर लेने की रणनीति अपना ली है? इन दोनों संभावनाओं पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। केवल इसलिए किसी आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता है कि उसे विपक्ष ने लगाया है और केवल इसलिए किसी संस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उस पर सत्ता पक्ष के विरोधियों ने सवाल उठाए हैं।
संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा किसी सरकार या राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा से बड़ी होती है। उनकी आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आलोचना तथ्य, प्रमाण और संवैधानिक मर्यादा के दायरे में होनी चाहिए। इसी तरह संस्थाओं से भी अपेक्षा की जाती है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता बनाए रखें।
भारतीय राजनीति में चुनावी मुद्दों की कमी कभी नहीं रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किसान, युवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय और विकास जैसे मुद्दे हमेशा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। सरकार की उपलब्धियों और कमियों पर बहस होना स्वाभाविक है। विपक्ष का काम भी यही है कि वह सरकार को उसके निर्णयों और वादों के आधार पर चुनौती दे। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श में ठोस मुद्दों के स्थान पर चुनावी प्रक्रिया ही सबसे बड़ा मुद्दा बन जाए, तब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि राजनीति किस दिशा में जा रही है।
वोट चोरी का आरोप गंभीर है। यदि कहीं मतदाता के अधिकारों का हनन हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन यदि हर चुनावी हार के बाद चुनाव प्रक्रिया को ही संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है। विपक्ष को यह समझना होगा कि जनता केवल आरोपों से प्रभावित नहीं होती है। उसे यह भी देखना होता है कि आरोप लगाने वाला दल अपने शासनकाल, अपने राजनीतिक आचरण और अपनी वैकल्पिक नीतियों के माध्यम से कितना भरोसा पैदा कर रहा है। किसी चुनाव में हारना लोकतंत्र की पराजय नहीं है। हार के बाद अपनी रणनीति की समीक्षा करना राजनीतिक परिपक्वता है। लेकिन हार का कारण केवल चुनाव आयोग, मतदाता सूची या मतदान प्रक्रिया को बताना राजनीतिक आत्ममंथन से बचने का रास्ता भी बन सकता है।
दिल्ली का रामलीला मैदान भारतीय राजनीति के इतिहास में कई बड़े आंदोलनों और राजनीतिक अभियानों का साक्षी रहा है। यहां से उठी आवाजों ने कभी सरकारों को चुनौती दी है तो कभी देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया है। इसलिए जब विपक्षी दल यहां एकत्र होकर वोट चोरी के आरोपों और लोकतंत्र की रक्षा का सवाल उठाते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का विषय बन जाता है। विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल करे। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन, जनसभा और राजनीतिक लामबंदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन रामलीला मैदान की राजनीतिक हुंकार का वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पीछे कितनी तथ्यात्मक ताकत और जनसमर्थन है।
क्या यह अभियान मतदाता के अधिकारों की रक्षा के लिए एक ठोस आंदोलन बनेगा? क्या इससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक सुझाव सामने आएंगे? या फिर यह केवल राजनीतिक दलों की एकजुटता प्रदर्शित करने का मंच बनकर रह जाएगा? यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है। जो राजनीतिक दल अपने-अपने राज्यों में एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते हैं, जिनके बीच नेतृत्व और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर मतभेद है, वे राष्ट्रीय मंच पर कितने समय तक एकजुट रह पाएंगे? क्या उनकी एकजुटता किसी साझा सकारात्मक कार्यक्रम पर आधारित है या फिर केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार का विरोध ही इस गठबंधन का आधार है? राजनीति में विरोध एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन केवल विरोध के आधार पर जनता का विश्वास हासिल करना आसान नहीं होता। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार की आलोचना करने वाले दल सत्ता में आने पर कौन-सा विकल्प प्रस्तुत करेंगे।
अब मूल प्रश्न पर लौटते हैं कि वोट चोरी के आरोपों से लेकर रामलीला मैदान तक चल रही राजनीतिक रणनीति आखिर किसे नुकसान पहुंचा रही है? पहला पक्ष केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार है। विपक्ष का स्वाभाविक लक्ष्य सरकार को घेरना और उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता को चुनौती देना है। चुनावी प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों के माध्यम से सरकार पर भी राजनीतिक दबाव बनाया जाता है। विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि लोकतंत्र की संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रही हैं। लेकिन यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो इसका राजनीतिक लाभ विपक्ष को मिलने के बजाय उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंच सकता है।
दूसरा पक्ष चुनाव आयोग है। संवैधानिक संस्था होने के कारण उसकी जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्षता के साथ चुनाव संपन्न कराए और अपनी कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवालों का संतोषजनक जवाब दे। आयोग को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में विश्वास केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से भी बनता है। उसे आलोचना से बचने के बजाय तथ्यों के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी चाहिए।
तीसरा पक्ष स्वयं विपक्ष है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मजबूत विपक्ष सरकार को निरंकुश होने से रोकता है, नीतियों पर बहस करता है और जनता के सामने वैकल्पिक नेतृत्व प्रस्तुत करता है। लेकिन यदि विपक्ष अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा केवल चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने में लगा देगा तो उसके सामने सबसे बड़ा संकट अपनी प्रासंगिकता बचाने का होगा। विपक्ष को यह बताना होगा कि वह जनता के जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर क्या सोचता है। बेरोजगार युवा, महंगाई से परेशान परिवार, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां तथा आर्थिक विकास की अपेक्षाएं, इन सब पर उसका दृष्टिकोण क्या है? केवल यह कहना कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए, जनता के सामने भविष्य की राजनीति का विकल्प प्रस्तुत नहीं करता है।
इन सभी पक्षों के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता है, जिसके मत से सरकार बनती है और विपक्ष तय होता है। जनता का वोट केवल एक राजनीतिक दल को चुनने का माध्यम नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में उसकी संप्रभुता का प्रतीक है। यदि जनता को यह विश्वास हो जाए कि उसका वोट निर्णायक नहीं है, चुनाव परिणाम पहले से प्रभावित हैं या मतदान प्रक्रिया में उसकी इच्छा का सम्मान नहीं किया जा रहा है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी। दूसरी ओर यदि बिना पर्याप्त प्रमाण के लगातार यह संदेश दिया जाए कि चुनावी व्यवस्था ही अविश्वसनीय है, तब भी जनता का विश्वास प्रभावित होगा। यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नुकसान केवल उनके चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहता है। इसका असर उस आम मतदाता पर पड़ता है, जो सुबह से कतार में लगकर मतदान करता है और यह मानकर घर लौटता है कि उसने देश की राजनीतिक दिशा तय करने में अपनी भूमिका निभाई है। जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसका एक-एक वोट सुरक्षित है, उसकी आवाज सुनी जाती है और किसी भी तरह की अनियमितता सामने आने पर निष्पक्ष कार्रवाई होगी। यह जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग की नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यह नहीं है कि उसमें कभी विवाद नहीं होते। उसकी खूबसूरती यह है कि विवादों का समाधान संवैधानिक प्रक्रियाओं, संस्थागत जवाबदेही और जनविश्वास के माध्यम से किया जाता है। विपक्ष को सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन उसे अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण भी देने होंगे। चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता पर विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता दिखानी होगी। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा अक्षुण्ण रहे। यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे सुधारा जाए। यदि किसी अधिकारी ने पक्षपात किया है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में अनियमितता के प्रमाण हैं तो कानून के अनुसार जांच हो। लेकिन राजनीतिक आरोपों को सत्य मान लेना या बिना जांच के खारिज कर देना, दोनों ही लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। यह भी याद रखना चाहिए कि चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का प्रतिद्वंद्वी नहीं है और न ही विपक्ष का विरोधी। वह संविधान के प्रति जवाबदेह संस्था है। इसी तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जनता के प्रति जवाबदेह है।
राजनीति में हर दल सत्ता में आना चाहता है। सत्ता में आने के लिए रणनीति बनाना, गठबंधन करना, जनसभाएं करना और सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इन सबका अंतिम उद्देश्य जनता का विश्वास जीतना होना चाहिए। रामलीला मैदान में कितनी भी बड़ी भीड़ जुट जाए, कितने भी प्रभावशाली भाषण हो जाएं और कितने भी गंभीर आरोप लगा दिए जाएं, लोकतंत्र का अंतिम फैसला वहां नहीं होता है। वह फैसला मतदान केंद्र पर होता है, जहां एक सामान्य नागरिक अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। यहां कोई राजनीतिक दल हमेशा सत्ता में रहने का अधिकार लेकर पैदा नहीं होता है और कोई विपक्ष हमेशा विपक्ष में रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। जनता के निर्णय से सत्ता बदलती है, नेतृत्व बदलता है और राजनीतिक समीकरण बदलते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति का संघर्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के बजाय उन्हें और मजबूत बनाए। विपक्ष अपनी भूमिका निभाए, सरकार अपनी जिम्मेदारी समझे और चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता का प्रमाण अपने कार्यों से देता रहे। आखिरकार सवाल केवल यह नहीं है कि वोट चोरी हुई या नहीं, सवाल यह भी है कि क्या हम अपने लोकतंत्र पर विश्वास बनाए रख पा रहे हैं? क्या राजनीतिक दल सत्ता की लड़ाई में जनता के विश्वास को दांव पर लगाने से बचेंगे? क्योंकि लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष बदलते रहते हैं, सरकारें आती-जाती रहती हैं, नेता बनते और बिगड़ते रहते हैं, लेकिन जनता का विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे फिर से स्थापित करना सबसे कठिन काम होता है। याद रखना चाहिए, लोकतंत्र में सत्ता का असली मालिक कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राजनीतिक दल या चुनाव आयोग नहीं है, बल्कि जनता है। पक्ष और विपक्ष तो जनता के निर्णय से बनते हैं। इसलिए जनता के वोट की पवित्रता पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, बल्कि राजनीति की पवित्रता के लिए जनता के वोट का सम्मान होना चाहिए।

