भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराना सिंधु जल समझौता एक बार फिर चर्चा में है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की हत्या के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं, जिनमें सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला प्रमुख है। इस कदम ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।
भारत की सख्त कार्रवाईयाँ
भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करते हुए यह स्पष्ट किया कि आतंकवाद को समर्थन देने वालों के साथ सामान्य संबंध अब संभव नहीं हैं। यह संधि 1960 में बनी थी और अब तक जल बंटवारे का आधार रही थी।
भारत और पाकिस्तान ने अपने-अपने उच्चायोगों में राजनयिक स्टाफ की संख्या घटा दी है, जिससे दोनों देशों के बीच संवाद और भी सीमित हो सकता है।
दक्षेस वीजा छूट योजना को भी निलंबित कर दिया गया है। इसके अंतर्गत पाकिस्तान के नागरिकों को भारत आने-जाने की सुविधा थी, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है। भारत में पहले से मौजूद नागरिकों को 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने के निर्देश दिए गए हैं।
भारत ने पाकिस्तान के सैन्य, नौसेना और वायु सलाहकारों को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ घोषित किया है और उन्हें एक सप्ताह के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया गया है।
साथ ही भारत ने इस्लामाबाद स्थित अपने उच्चायोग से रक्षा, नौसेना और वायु सलाहकारों को भी वापस बुला लिया है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भारत के फैसलों की आलोचना की। उनका कहना था कि भारत ने इस हमले में पाकिस्तान की संलिप्तता को लेकर कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारत हर आतंकी घटना का दोष पाकिस्तान पर डालता है। पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने इस स्थिति पर विचार कर प्रतिक्रिया देने की योजना बनाई है।
भारत का रुख बेहद स्पष्ट है — अब शब्दों से नहीं, काम से जवाब दिया जाएगा। सिंधु जल संधि जैसी ऐतिहासिक संधियों को रोकने का कदम इस बात का संकेत है कि भारत अब आतंक के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतेगा।
यह घटनाक्रम इस क्षेत्र में कूटनीतिक संतुलन के लिहाज़ से एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है — या तो इससे नई बातचीत की शुरुआत होगी, या फिर रिश्तों में और खटास आएगी।
