भारत का लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है, जिसकी नींव संविधान के उस संतुलन पर टिकी है, जिसमें विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या और उसकी रक्षा करती है। यह त्रिकोणात्मक व्यवस्था एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए सुचारु रूप से शासन प्रणाली को सशक्त बनाती है। लेकिन जब कोई एक अंग अपनी भूमिका से आगे बढ़ने लगे, तब न केवल संविधान का मूल स्वरूप खतरे में पड़ता है, बल्कि जनता का विश्वास भी डगमगाने लगता है। देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका के संदर्भ में टिप्पणी की है, जो सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दिया गया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों के अनुमोदन की समय सीमा तय करने का सुझाव दिया था। उपराष्ट्रपति का सबसे बड़ा ऐतराज इस बात पर था कि सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रपति को निर्देश देने का अधिकार नहीं है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 142 को 'लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध न्यूक्लियर मिसाइल' तक कह दिया। इसके साथ ही, उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को 'सुपर संसद' कहने की बात कही और अनुच्छेद 145(3) में संशोधन की जरूरत पर बल दिया है।
अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय को "पूर्ण न्याय" करने का विशेषाधिकार देता है। जब किसी मामले में अन्य सभी संवैधानिक या विधिक रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं, तब यह अनुच्छेद अंतिम उपाय के रूप में सामने आता है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि किसी संस्था के अधिकारों को चुनौती देना। लेकिन उपराष्ट्रपति का यह कहना कि इसे लोकतांत्रिक शक्तियों के विरुद्ध न्यूक्लियर मिसाइल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण है, बल्कि जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति भ्रम उत्पन्न कर रहा है।
उपराष्ट्रपति का यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट “सुपर पार्लियामेंट” बनने की दिशा में बढ़ रहा है, एक अत्यंत गंभीर आरोप नहीं बल्कि यथार्थ चिंतन है। संविधान की भावना यह नहीं थी कि न्यायपालिका नीति निर्धारण या प्रशासनिक निर्देशों में भूमिका निभाए। उदाहरण के लिए, विधेयकों के अनुमोदन की समय-सीमा तय करने का सुझाव देना सीधे तौर पर कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है। यह लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में शक्ति-संतुलन को हिला सकता है।
उपराष्ट्रपति की बातों को केवल एक राजनीतिक बयान कह कर खारिज कर देना लोकतांत्रिक विवेक का अपमान होगा। उन्होंने एक ऐसी सच्चाई की ओर इशारा किया है, जो लंबे समय से अनदेखी की जा रही थी “न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता”।
उपराष्ट्रपति ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के घर से मिली जली हुई नोटों के बंडलों का उदाहरण देते हुए न्यायपालिका में जवाबदेही की मांग उठाई है। न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं। ऐसे में कोलेजियम प्रणाली की गोपनीयता, जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही का अभाव, इस तरह के बिंदु समय-समय पर उठते रहते हैं।
न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया, विशेषकर कोलेजियम प्रणाली, लंबे समय से आलोचनाओं के घेरे में है। कोलेजियम प्रणाली में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं और यह प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय होती है।
उपराष्ट्रपति का यह सुझाव कि अनुच्छेद 145(3) में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि संविधान पीठ के गठन की प्रक्रिया अधिक संतुलित और व्यावहारिक हो सके, विचारणीय विषय है। यह विषय केवल सत्ता संघर्ष का प्रतीक नहीं है, बल्कि न्यायिक सुधार की दिशा में आवश्यक पहल प्रतीत होता है।
न्यायपालिका संदेह के घेरे में इसलिए भी दिखता है कि राम जन्मभूमि के मामले में कागजात और साक्ष्य खोजती थी और मुकदमा एक लंबी अवधि तक चली, लेकिन वक्फ बोर्ड के मामले में ऐसा नहीं खोजना और ताबड़तोड़ डेट देकर मामले को निपटाने की दिशा में बढ़ना, न्यानालय के प्रति संदेह की ओर अकारण ध्यान खींचता है। ऐसे आज भी देश का आम नागरिक, जब अन्य सभी दरवाजे बंद पाता है, तो न्यायपालिका ही उसकी अंतिम आशा बनती है। ऐसे में उसकी स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
उपराष्ट्रपति की टिप्पणियाँ कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं हैं, बल्कि वे संवैधानिक विमर्श की एक गंभीर शुरुआत हैं। जब लोकतंत्र का कोई स्तंभ अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है, तो दूसरे स्तंभों का यह कर्तव्य बनता है कि वे संतुलन की बहाली बनाये रखने की पहल करें। यदि इस बहस का उद्देश्य न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता लाना है, तो यह केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का प्रयास है।
मुझे लगता है कि कार्यपालिका को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए और न्यायपालिका को भी अपनी सीमाओं में रहकर ही निर्णय देने चाहिए। किसी भी संवैधानिक संस्थाओं को चाहिए कि वह सार्वजनिक मंचों की बजाय, संवाद और आपसी विचार-विमर्श का रास्ता अपना कर ही कार्य करना चाहिए। भारत का संविधान सभी संस्थाओं को उनके अधिकार, सीमाएं और दायित्व देता है। कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों लोकतंत्र के रक्षक हैं, इसलिए दोनों के बीच प्रतिद्वंद नहीं होना चाहिए। उपराष्ट्रपति की चिंता अगर न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर है, तो यह गंभीर विचार का विषय है। उपराष्ट्रपति की टिप्पणी को एक सकारात्मक लोकतांत्रिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि टकराव के प्रयास के रूप में।
