फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ: एक वीर योद्धा जिसे राजनीति ने भुला दिया

Jitendra Kumar Sinha
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फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ — एक ऐसा नाम, जो भारत के सैन्य इतिहास में सोने के अक्षरों से लिखा गया है।

वह पहले भारतीय थे जिन्हें 'फील्ड मार्शल' की सर्वोच्च सैन्य उपाधि प्राप्त हुई। उनका जीवन शौर्य, बुद्धिमत्ता और निर्भीकता की मिसाल रहा है। लेकिन जितनी भव्यता उनके सैन्य जीवन में थी, उतनी ही उदासीनता उन्हें अपने अंतिम दिनों में झेलनी पड़ी — और अफसोस, इसमें सबसे बड़ी भूमिका रही तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की।


सैन्य जीवन की गाथा

सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर, पंजाब में एक पारसी परिवार में हुआ था। ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती होकर उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा के मोर्चे पर अपनी वीरता दिखाई। उन्हें गोली भी लगी, लेकिन उनका जज़्बा और जीवटता अडिग रही।


1947-48 के भारत-पाक युद्ध से लेकर 1962 के चीन युद्ध तक, और फिर 1971 के भारत-पाक युद्ध तक — सैम मानेकशॉ ने हर संघर्ष में नेतृत्व का परचम लहराया। 1971 का भारत-पाक युद्ध उनकी रणनीति का सर्वोच्च उदाहरण है। उनकी योजनाओं ने भारत को निर्णायक विजय दिलाई, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ। पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया — जो आज भी विश्व इतिहास में सबसे बड़े आत्मसमर्पणों में गिना जाता है।


व्यक्तित्व

सैम मानेकशॉ का व्यक्तित्व किसी चमकते हुए तलवार की तरह था — स्पष्ट, धारदार और सच्चा। वे नेताओं के सामने भी सच बोलने से नहीं डरते थे। जब इंदिरा गांधी ने 1971 युद्ध के दौरान जल्दबाज़ी में कार्रवाई का दबाव बनाया, तो उन्होंने पूरी ईमानदारी से कहा था:


"मैं तैयार हूँ, पर अगर आप चाहती हैं कि मैं अभी हमले कर दूँ, तो मुझे लिखित में दीजिए कि आप युद्ध हारने को तैयार हैं।"


 

ऐसी ईमानदारी, आज के ज़माने में दुर्लभ है।


अंतिम दिन और कांग्रेस सरकार का व्यवहार

27 जून 2008 को जब सैम मानेकशॉ का वेलिंगटन (तमिलनाडु) में निधन हुआ, तो जो हुआ वह एक राष्ट्र के लिए शर्म की बात थी।

  • तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री एके एंटनी — कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ।

  • सरकार की ओर से कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि श्रद्धांजलि देने नहीं पहुँचा।

  • मीडिया कवरेज बेहद सीमित रही।

  • सेना ने जरूर अपने स्तर पर फुल मिलिट्री ऑनर्स (21 तोपों की सलामी) दी, लेकिन सरकार का रवैया बेरुखी भरा रहा।

यह व्यवहार न केवल सैम मानेकशॉ के प्रति अन्याय था, बल्कि भारतीय सेना और उसके गौरव के प्रति भी असम्मान था।


राजनीतिक उपेक्षा के कारण

साफ बात करें तो, सैम मानेकशॉ हमेशा "Yes Man" बनने से इंकार करते थे। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक — सभी के सामने वे अपनी स्पष्ट राय रखते थे। भारत जैसे राजनीतिक माहौल में, जहां चाटुकारिता को अधिक महत्व दिया जाता है, वहाँ ईमानदार और स्वाभिमानी व्यक्तित्व अक्सर सत्ता से दूर कर दिए जाते हैं। सच्चाई यह है कि राजनीति बहादुरों को शब्दों में तो सराहती है, लेकिन जब कृतज्ञता दिखाने का समय आता है, तो अक्सर मुंह मोड़ लेती है। सैम मानेकशॉ को भी वही अंधी व्यवस्था निगल गई।


फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उनकी वीरता, रणनीति, और निर्भीकता ने भारत को गौरवान्वित किया।
लेकिन उनका अंतिम विदाई दृश्य यह भी याद दिलाता है कि भारत अपने सच्चे नायकों को जितना सम्मान देना चाहिए, उतना हमेशा नहीं देता। इतिहास उन्हें कभी नहीं भूलेगा। और आने वाली पीढ़ियाँ जब भी 1971 की विजय की कहानी सुनेंगी, सैम मानेकशॉ का नाम उसी गर्व और सम्मान के साथ लिया जाएगा, जैसा वह वास्तव में डिज़र्व करते हैं।


अंतिम शब्द

"यदि मृत्यु के बाद कोई सेना परेड हो, तो सैम मानेकशॉ सबसे आगे चल रहे होंगे — गर्व से, मुस्कुराते हुए, बिना किसी नेता के इंतजार में।"

जय हिन्द। 🇮🇳

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