'नैनोपोरस मल्टीलेयर्ड पॉलीमर मेम्ब्रेन' तकनीक से बदलेगा खारा पानी

Jitendra Kumar Sinha
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भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ती जनसंख्या और जल प्रबंधन की विफलताएं इस संकट को और भी विकराल बना रही हैं। खासकर तटीय क्षेत्रों और द्वीपों में पीने योग्य जल की अनुपलब्धता गंभीर समस्या बनती जा रही है। ऐसे में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक तकनीकी खोज उम्मीद की नई किरण लेकर आई है, वह है 'नैनोपोरस मल्टीलेयर्ड पॉलीमर मेम्ब्रेन'।

इस स्वदेशी तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह समुद्र के खारे पानी को कम खर्च और अत्याधुनिक तरीके से पीने योग्य, मीठे पानी में बदल सकती है। न केवल यह भारत को जल संकट से उबारने में सहायक होगी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती देगी।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की कानपुर स्थित लैब ने, मात्र आठ महीनों में यह चमत्कार कर दिखाया है। यह तकनीक को 'मेक इन इंडिया' पहल का बेहतरीन उदाहरण कहा जा सकता है, जहां बिना विदेशी सहायता के, भारत के वैज्ञानिकों ने विश्वस्तरीय तकनीक विकसित की है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने इसे खास तौर पर भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) के जहाजों के लिए तैयार किया है। इसकी सहायता से अब समुद्र में लंबे समय तक गश्त कर रहे जहाजों को मीठे पानी की समस्या से जूझना नहीं पड़ेगा।

इस अत्याधुनिक प्रणाली में उपयोग की गई 'नैनोपोरस मल्टीलेयर्ड पॉलीमर मेम्ब्रेन' एक विशेष झिल्ली होती है, जिसमें अति सूक्ष्म छिद्र (नैनोपोर्स) होते हैं। इन छिद्रों से सिर्फ जल के अणु ही गुजर सकते हैं, जबकि नमक, खनिज, बैक्टीरिया और अन्य अशुद्धियां बाहर रह जाती हैं। इस झिल्ली की परतें बहुस्तरीय होती हैं, जिससे इसकी दक्षता कई गुना बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में विलवणीकरण (Desalination) कहा जाता है।

इस प्रणाली में खारे पानी को एक उच्च-दबाव प्रणाली के तहत झिल्ली से गुजारा जाता है। यह प्रक्रिया तीन चरणों में संपन्न होती है। पहले चरण में खारे पानी को एक प्री-फिल्टर से गुजारा जाता है, जिससे मोटे कण और मलबा निकल जाता है। दूसरे चरण में पानी को मेम्ब्रेन के भीतर डाला जाता है। नैनोपोर्स केवल जल अणुओं को ही पार होने देता हैं। तीसरे चरण में परिशोधित मीठे पानी को अलग टैंक में जमा किया जाता है, जबकि अवशिष्ट खारे जल को अलग किया जाता है।

इस तकनीक की परिकल्पना पहले भारतीय तटरक्षक बल के जहाजों के लिए की गई थी। समुद्र में गश्त पर निकले जहाजों को अक्सर मीठे पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ता है। यह तकनीक जहाजों पर ही खारे पानी को शुद्ध कर पीने योग्य बना सकती है। लेकिन इसकी उपयोगिता यहीं तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण और तटीय इलाकों, समुद्री द्वीपों, जलवायु संकट झेल रहे क्षेत्रों, और सेना के सुदूरवर्ती कैंपों में भी बेहद कारगर साबित हो सकता है।

भारत की तटरेखा लगभग 7500 किलोमीटर लंबी है, जिसमें करोड़ों लोग रहते हैं। इनमें से कई क्षेत्रों में भूजल खारा हो चुका है या भूजल उपलब्ध ही नहीं है। ऐसे में यह तकनीक इन बस्तियों के लिए जीवनदायिनी बन सकता है। इस तकनीक का उपयोग अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्र, गुजरात, तमिलनाडु, ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्य और राजस्थान के कुछ इलाके जैसे बंजर व खारे क्षेत्र में किया जा सकता है।

तकनीक को भारतीय तटरक्षक बल के ऑफशोर पेट्रोलिंग वेसल (OPV) पर परीक्षण के लिए लगाया गया है। इसके प्रदर्शन परीक्षण (परफॉर्मेंस टेस्ट) में यह तकनीक सफल रहा है। अब इसे 500 घंटे की ऑपरेशनल टेस्टिंग से गुजारा जाएगा। इसके बाद इसे अंतिम मंजूरी दी जाएगी और बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया जाएगा।

'नैनोपोरस मल्टीलेयर्ड पॉलीमर मेम्ब्रेन' का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी है। अब तक भारत को इस तरह की झिल्लियों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन अब यह निर्भरता समाप्त हो गई है। इसके मुख्य लाभ होगा विदेशी तकनीक पर निर्भरता खत्म होगा, लागत में भारी कमी होगी,
स्थानीय रोजगार सृजन होगा और वैश्विक बाजार में निर्यात की संभावना बढ़ेगी। इस तकनीक के व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोग की संभावनाएं भी बहुत अधिक हैं। अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई देशों में पीने योग्य जल की समस्या है। भारत यहां इस तकनीक को निर्यात कर वाटर टेक्नोलॉजी हब बन सकता है।

जहां एक ओर जल संकट से निपटना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण पर इसके प्रभाव को कम रखना भी उतना ही जरूरी है। यह मेम्ब्रेन तकनीक बिजली की कम खपत करती है, रसायनों का प्रयोग न्यूनतम होता है,
शुद्ध जल की गुणवत्ता WHO मानकों के अनुसार होती है और पर्यावरणीय अपशिष्ट सीमित रहता है। 

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) इस तकनीक के विभिन्न संस्करणों पर भी कार्य कर रहा है, जैसे बिजली न होने वाले क्षेत्रों के लिए, आपदा राहत और सैन्य अभियानों के लिए और शहरी जल संकट के लिए समाधान के लिए कार्य किया जा रहा है।

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