पश्चिम एशिया में फैला हुआ है अमेरिका के सैन्य अड्डा

Jitendra Kumar Sinha
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पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की आशंका के घेरे में है। अमरीका द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान और उसके समर्थक समूहों में आक्रोश देखा जा रहा है। इस तनावपूर्ण वातावरण में सबसे अधिक खतरा उन अमरीकी सैन्य ठिकानों पर मंडरा रहा है जो इस क्षेत्र के कई देशों में फैला हुआ है। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका ने इस्लामी दुनिया के हृदय स्थल माने जाने वाले पश्चिम एशिया में रणनीतिक सैन्य अड्डों की एक पूरी श्रृंखला खड़ी की है। यह बेस खुफिया संचालन, हवाई हमलों, रसद आपूर्ति, नौसेना गतिविधियों से लेकर ड्रोन मिशनों तक के लिए इस्तेमाल होता हैं।

1996 में बना अल उदीद एयर बेस, कतर की राजधानी दोहा से 30 किमी दूर स्थित है। यह अमरीका का सबसे बड़ा सैन्य बेस है जो 24 हेक्टेयर (60 एकड़) क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां 100 से अधिक फाइटर जेट्स और ड्रोन तैनात हैं। 10,000 अमरीकी सैनिक तैनात हैं। इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में हुए कई ऑपरेशन यहीं से संचालित हुए हैं। यह बेस सेंटकॉम (US Central Command) के एयर ऑपरेशनों की रीढ़ है। ईरान जानता है कि यह अड्डा हमले की स्थिति में अमरीका की जवाबी कार्रवाई की प्राथमिक जगह होगा, इसीलिए यह उसका प्रमुख संभावित लक्ष्य भी है।

बहरीन में स्थित यह नौसैनिक अड्डा HMS Juffair के पुराने ब्रिटिश बेस पर विकसित किया गया है। इसमें 9,000 से अधिक सैन्य और नागरिक कर्मचारी कार्यरत हैं। अमरीकी नौसेना की पांचवीं फ्लीट (Fifth Fleet) की तैनाती है। फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और अरब सागर पर पैनी नजर रखता है। यह बेस जहाजों, विमानों और सैन्य टुकड़ियों को ईंधन, मरम्मत, सुरक्षा और खुफिया सूचना प्रदान करता है। फारस की खाड़ी में अमरीका की उपस्थिति ईरान को कूटनीतिक रूप से संतुलन में रखने का काम करता है।

इराक के उत्तरी क्षेत्र कुर्दिस्तान की राजधानी एरबिल में स्थित यह एयर बेस अमरीकी सेना की हवाई गतिविधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा अल-हरीर और अल-असद जैसे अन्य बेस भी इराक में मौजूद है। एरबिल से IS के खिलाफ अभियान चलाया गया था। यह बेस सीरिया और ईरान की सीमा के करीब है, जिससे इसे रणनीतिक बढ़त मिलती है। ईरान समर्थित मिलिशिया गुट पहले भी इन बेसों को रॉकेट और ड्रोन हमलों से निशाना बना चुका है।

कुवैत में अमेरिका के कई बेस हैं लेकिन सबसे अहम है कैंप आरिफजान, जो 1999 में बनाया गया था। यह बेस दक्षिण-पूर्व कुवैत में स्थित है। लॉजिस्टिक सपोर्ट, ट्रेनिंग और कमांड सेंटर का कार्य करता है। इसमें हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं। इराक युद्ध के समय यह बेस युद्ध सामग्री के ट्रांजिट प्वाइंट के रूप में भी प्रयोग हुआ था।

अबू धाबी के पास स्थित अल दहफरा एयर बेस में 10 विमान स्क्वाड्रन है। MQ-9 रीपर ड्रोन, एफ-22 रैप्टर स्टील्थ फाइटर, AWACS जैसे विमानों की तैनाती है। टोही, निगरानी और हवाई लड़ाई के लिए पूरी तरह सक्षम है। यह बेस अमेरिका के खुफिया नेटवर्क का एक अहम हिस्सा है, जिससे ईरान की गतिविधियों पर निगरानी रखा जाता है।

अमरीका के कई बेस और फॉरवर्ड ऑपरेटिंग लोकेशंस (FOLs) जॉर्डन में जरका और अज-जरका है। सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयर बेस है। मिस्र में सिनाई प्रायद्वीप के पास छोटा बेस है। यह सभी अड्डा संभावित संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभा सकता है।

अमरीका ने सिर्फ एयरबेस और नौसैनिक अड्डा नहीं बनाया हैं, बल्कि रडार चौकियों और सैटेलाइट निगरानी केंद्रों की भी एक मजबूत श्रृंखला खड़ा किया है। उदाहरण के लिए तुर्किए (तुर्की) में इंकिरलिक एयर बेस, सीरिया के उत्तर-पूर्व में गुप्त चौकियां, लेबनान की सीमा के करीब खुफिया चौकियां। इन चौकियों का कार्य है, खतरे की पहचान, ईरान समर्थित गुटों की हलचल पर नजर रखना और आवश्यक स्थिति में तेजी से जवाब देना।

ईरान समर्थक समूहों द्वारा अमेरिकी अड्डों पर हमला कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि 2020 में इराक में अल-असद एयर बेस पर मिसाइल हमला, सीरिया में 2023 में अमेरिकी चौकियों पर ड्रोन अटैक, यमन से हौथी विद्रोहियों द्वारा यूएई में अमेरिकी प्रतिष्ठानों पर निशाना। इन हमलों में यह देखा गया है कि ईरान सीधे हमला नहीं करता है, बल्कि अपने प्रॉक्सी मिलिशिया के जरिए सटीक और रणनीतिक वार करता है।

संभावना कम है कि ईरान सीधे इन अड्डों पर मिसाइल दागेगा, क्योंकि इससे अमेरिका-ईरान पूर्ण युद्ध की स्थिति आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समर्थन खो सकता है। अमेरिका के पास जवाबी कार्रवाई की क्षमता कहीं अधिक है। परंतु, ‘असिमेट्रिक वारफेयर’ यानि छिपे हुए गुटों द्वारा हमला या साइबर युद्ध की संभावना बहुत अधिक है।

अमेरिका इन सभी बेसों को इंटरलिंक्ड नेटवर्क से जोड़ता है। THAAD और पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात हैं। रेड अलर्ट मोड में कई बेस चलाया जा रहा है। ड्रोन निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की व्यवस्था की गई है। यदि हमला होता है तो अमेरिका का प्रतिउत्तर सीमित न होकर क्षेत्रीय स्तर पर बड़ा हो सकता है।

पश्चिम एशिया एक बार फिर एक चिंगारी से जल उठने के कगार पर है। अमेरिका के सैन्य अड्डा न केवल सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ईरान के लिए हमेशा से एक ‘प्रोवोकेशन पॉइंट’ रहा हैं। ईरान चाहे सीधे हमला करे या अपने सहयोगी गुटों के जरिए, टकराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इन अड्डों की मौजूदगी यह भी दिखाता है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सुपरपावर की पकड़ किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता है। वहीं, ईरान क्षेत्रीय शक्ति बनने की आकांक्षा में इन ठिकानों को ‘आधुनिक औपनिवेशिक प्रतीक’ मानता है।

इसलिए, आने वाले दिनों में यदि पश्चिम एशिया का तापमान युद्ध की लपटों से गरम हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ईरान के निशाने पर जो दिख नहीं रहा, वही सबसे ज्यादा खतरा में है।



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