बेंगलूरु के मुरुडेश्वर मंदिर में लागू हुआ ड्रेस कोड - अब पारंपरिक वेशभूषा में ही मिलेगा प्रवेश

Jitendra Kumar Sinha
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देश के प्रमुख शिव मंदिरों में शुमार कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले की भटकल तहसील स्थित मुरुडेश्वर मंदिर में अब भक्तों को पारंपरिक भारतीय पोशाक में ही भगवान के दर्शन की अनुमति होगी। मंदिर प्रशासन ने मंदिर की धार्मिक गरिमा बनाए रखने और श्रद्धालुओं की लगातार मिलती शिकायतों के मद्देनजर ड्रेस कोड अनिवार्य कर दिया है। इस निर्णय के साथ ही अब मंदिर परिसर में आधुनिक, पश्चिमी या अंगप्रदर्शन करने वाले वस्त्रों में प्रवेश पूरी तरह वर्जित होगा।

मुरुडेश्वर मंदिर प्रशासन द्वारा लागू किए गए नियमों के अनुसार, पुरुषों को अब शर्ट, धोती, पैंट या कुर्ता-पायजामा पहनकर ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति होगी। महिलाओं को साड़ी, सलवार-कुर्ता या चूड़ीदार जैसे भारतीय परिधानों में ही भगवान के दर्शन करने की अनुमति दी जाएगी। जींस, टी-शर्ट, शॉर्ट्स, मिनी स्कर्ट, स्लीवलेस टॉप्स और ऐसे अन्य पश्चिमी वस्त्र अब मंदिर क्षेत्र में पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि कई भक्त मंदिर में ऐसे कपड़ों में आते हैं जो हिंदू धार्मिक परंपराओं और मंदिर की गरिमा के अनुकूल नहीं हैं। कई बार ऐसे वस्त्रों से मंदिर परिसर में मौजूद अन्य श्रद्धालु असहज महसूस करते थे। इसको लेकर स्थानीय श्रद्धालुओं और कई हिन्दू संगठनों ने मंदिर प्रबंधन से ड्रेस कोड लागू करने की मांग की थी, जिसे गंभीरता से लेते हुए अब यह निर्णय लिया गया है।

ड्रेस कोड की जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार और प्रमुख स्थानों पर सूचना बोर्ड लगाए गए हैं। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कौन-कौन सी वेशभूषा को अनुमति दी गई है और कौन से वस्त्र प्रतिबंधित हैं।

मुरुडेश्वर मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। यहां विश्व की दूसरी सबसे ऊंची भगवान शिव की मूर्ति है और हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर प्रशासन का मानना है कि ऐसे धार्मिक स्थलों में भारतीय परंपराओं और संस्कृति का सम्मान अनिवार्य होना चाहिए। आधुनिकता की दौड़ में धार्मिक आस्था और रीति-नीति से समझौता उचित नहीं है।

ड्रेस कोड लागू करने के इस निर्णय को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जहां कई लोग इसे संस्कृति की रक्षा का सही कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश कहकर विरोध भी जता रहे हैं। हालांकि, मंदिर प्रशासन अपने निर्णय पर दृढ़ है और इसे वापस लेने की कोई संभावना फिलहाल नहीं है।

मुरुडेश्वर मंदिर का यह कदम धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह निर्णय बताता है कि आस्था के स्थलों पर आचरण और वेशभूषा में भी मर्यादा आवश्यक है, जिससे न केवल श्रद्धालुओं की भावना सुरक्षित रहती है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान भी अक्षुण्ण बनी रहती है।



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