भारतीय हॉकी के सबसे भरोसेमंद और अनुभवी फॉरवर्ड खिलाड़ियों में शुमार ललित कुमार उपाध्याय ने सोमवार को अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास की घोषणा कर दी है। एफआईएच प्रो लीग के यूरोपीय चरण में बेल्जियम के खिलाफ भारत के अंतिम मुकाबले के बाद ललित ने सोशल मीडिया पर अपने संन्यास की जानकारी दी। उन्होंने 15 जून को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच खेला था। यह दिन भारतीय हॉकी प्रेमियों के लिए भावुक कर देने वाला रहा।
वाराणसी, उत्तर प्रदेश से आने वाले ललित कुमार उपाध्याय ने 2014 में हॉकी विश्व कप में भारत के लिए पदार्पण किया था। उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक दशक तक भारत की राष्ट्रीय टीम के लिए खेला और 183 मैचों में ललित ने कुल 67 गोल दागा। वह न केवल एक शानदार गोल स्कोरर रहा, बल्कि टीम के लिए एक अहम प्लेमेकर की भूमिका भी निभाता रहा।
ललित कुमार उपाध्याय भारत की उस ऐतिहासिक हॉकी टीम का हिस्सा रहा है जिसने टोक्यो ओलंपिक (2021) में 41 वर्षों बाद देश को हॉकी में ओलंपिक पदक दिलाया। यह कांस्य पदक पूरी भारतीय हॉकी बिरादरी के लिए किसी स्वर्ण से कम नहीं था। इसके बाद उन्होंने पेरिस ओलंपिक क्वालीफाइंग में भी टीम के लिए अहम योगदान दिया और एक बार फिर कांस्य पदक के साथ अपने नाम को इतिहास में दर्ज किया।
ललित कुमार उपाध्याय की खेलने की शैली हमेशा टीम को प्रेरित करता था। वह तेज, चुस्त, और विपरीत टीम के डिफेंस को भेदने में माहिर रहा। उनकी मौजूदगी टीम के लिए हमेशा ऊर्जा का स्रोत रहा है। कठिन मुकाबलों में उन्होंने कई बार भारत के लिए निर्णायक गोल किया और संकट की घड़ी में नेतृत्व की भूमिका निभाई।
अपने संन्यास की घोषणा करते हुए ललित ने लिखा है कि "यह एक शानदार सफर रहा। देश के लिए खेलना हर खिलाड़ी का सपना होता है और मुझे गर्व है कि मैंने इसे जिया। अब वक्त है नई पीढ़ी को मंच देने का। मैं भारतीय हॉकी को हमेशा दिल से समर्थन देता रहूंगा।"
हॉकी के जानकारों का मानना है कि ललित की समझ, अनुभव और रणनीतिक सूझबूझ को देखते हुए वे भविष्य में कोचिंग या तकनीकी सलाहकार की भूमिका निभा सकता है। भारतीय हॉकी को उनके जैसे मार्गदर्शकों की जरूरत हमेशा रहेगी।
