फारूक अब्दुल्ला की चेतावनी - राज्य का दर्जा नहीं मिला तो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

Jitendra Kumar Sinha
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जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की मांग को लेकर राजनीतिक सरगर्मी एक बार फिर तेज होने लगा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने शनिवार को अनंतनाग में बड़ा बयान देते हुए साफ कहा है कि यदि केन्द्र सरकार ने राज्य का दर्जा बहाल करने में और देरी की, तो उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेगी।

डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि हाल में सम्पन्न हुए आम चुनावों में जम्मू-कश्मीर की जनता ने लोकतंत्र में भरोसा दिखाया है और अब समय आ गया है कि केन्द्र सरकार भी जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए जल्द से जल्द राज्य का दर्जा बहाल करे। उन्होंने कहा है कि “लोगों ने वोट दिया है ताकि उनके मुद्दों का समाधान हो। लेकिन हम देख रहे हैं कि हर बार बहानेबाजी करके राज्य का दर्जा टाल दिया जाता है।”

5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था, तब केन्द्र सरकार ने आश्वासन दिया था कि "स्थिति सामान्य होने पर राज्य का दर्जा पुनः बहाल किया जाएगा।" लेकिन अब लगभग पाँच साल बीत चुका हैं, और यह वादा अब तक अधूरा है। इससे स्थानीय राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच नाराजगी और असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

फारूक अब्दुल्ला ने अपने बयान में कहा है कि राज्य का दर्जा केवल राजनीतिक मांग नहीं है, बल्कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। “हम संविधान के अनुसार, अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। यदि केन्द्र सरकार हमारी बात नहीं सुनती है, तो सुप्रीम कोर्ट हमारा अगला रास्ता होगा,” उन्होंने चेतावनी दी है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) सहित कई कश्मीरी दल लगातार यह मांग कर रहा हैं कि जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए। फारूक अब्दुल्ला का यह बयान आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर की सियासत में नई बहस और संभावित आंदोलन की शुरुआत कर सकता है।

जम्मू-कश्मीर की जनता ने बार-बार लोकतंत्र में भरोसा जताया है। अब बारी केन्द्र सरकार की है कि वह भरोसे के इस पुल को मजबूत करे। राज्य का दर्जा बहाल करना केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि संविधानिक न्याय का प्रश्न है। यदि इसमें और देरी होती है, तो न्याय की अंतिम उम्मीद के तौर पर न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना स्वाभाविक कदम होगा।


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