कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 19 जून को एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी करते हुए यह फैसला लिया कि राज्य के सभी न्यायालयों में चाहे वह उच्च न्यायालय हो या अधीनस्थ अदालत, सभी में संविधान निर्माता और समाज सुधारक डॉ. भीमराव आंबेडकर का चित्र प्रमुख स्थान पर लगाया जाएगा।
यह निर्णय न केवल प्रतीकात्मक है, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के प्रति एक सशक्त संदेश भी देता है। अधिसूचना के अनुसार, यह फैसला हाल ही में हुई "पूर्ण पीठ बैठक" (Full Court Meeting) में लिया गया है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों, आम जनता, अधिवक्ताओं और संगठनों, द्वारा दिए गए प्रस्तावों के साथ-साथ राज्य सरकार के आग्रहों पर भी विचार किया गया।
डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान के शिल्पकार माने जाते हैं। उन्होंने न केवल दलितों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया है, बल्कि एक समतामूलक समाज की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका योगदान केवल विधिक जगत तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता की बात किया था। ऐसे में न्यायालयों जो संविधान की व्याख्या और पालन सुनिश्चित करता है में उनका चित्र होना एक नैतिक और वैचारिक संगति को दर्शाता है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह निर्णय ऐसे समय में दिया है जब आम जनता और अधिवक्ता समुदाय से इस संबंध में निरंतर मांगें उठ रही थी। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने यह मांग की थी कि जिस महापुरुष ने न्याय, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को संविधान में स्थापित किया था, उनकी उपस्थिति न्यायालयों में दृष्टिगत होनी चाहिए। यह फैसला न्यायालयों के सामाजिक उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
डॉ. आंबेडकर का चित्र लगाना केवल एक औपचारिकता नहीं है, यह एक व्यापक सामाजिक संदेश भी है कि न्याय का मंदिर केवल कानूनी प्रक्रिया का स्थल नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों की स्थली है जो समाज को समता, न्याय और स्वतंत्रता की ओर ले जाता हैं। यह कदम विशेषकर उन वंचित वर्गों को सशक्त अनुभव कराएगा, जिन्होंने सदियों तक भेदभाव झेला है।
