भारतीय न्याय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर की न्यायालयों, चाहे वह उच्च न्यायालय हो या जिला न्यायालय, के लिए दूसरे और चौथे शनिवार की छुट्टियों को समाप्त कर दिया है। यह फैसला लंबित मामलों के तेजी से निपटारे के उद्देश्य से किया गया है और यह नई व्यवस्था 14 जुलाई 2025 से लागू हो जाएगी।
भारत में लाखों केस वर्षों तक लंबित रहता हैं, जिससे न्याय में देरी होती है और जनता का भरोसा डगमगाता है। न्यायपालिका पर बढ़ते दबाव और मामलों के बोझ को कम करने के लिए यह एक बड़ा और साहसिक कदम माना जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि यह निर्णय “त्वरित और समयबद्ध न्याय” की दिशा में एक आवश्यक पहल है। अदालतें अब दूसरे और चौथे शनिवार को भी पूरे दिन सामान्य कार्य करेंगी, जिससे प्रत्येक माह दो अतिरिक्त कार्यदिवस जुड़ जाएंगे।
अब लंबित मामलों में तेजी आएगी। देशभर में करोड़ों केस पेंडिंग हैं। अतिरिक्त कार्यदिवस मिलने से इसकी सुनवाई तेज होगी। आम जनता को लाभ मिलेगा। लोगों को वर्षों की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। विशेष रूप से छोटे मुकदमों और जमानत मामलों में तेजी आएगी। अधिवक्ताओं और कर्मचारियों पर असर पड़ेगा। कोर्ट स्टाफ और वकीलों पर कार्यभार बढ़ेगा, लेकिन न्याय वितरण प्रणाली की दक्षता में सुधार आएगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि यह निर्णय स्थायी नहीं बल्कि “समीक्षा योग्य” है। यदि इससे वांछित परिणाम नहीं मिलता है, तो आगे जाकर बदलाव भी संभव है। लेकिन फिलहाल यह एक सकारात्मक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ अधिवक्ताओं और न्यायिक कर्मचारियों के संगठनों ने संकेत दिया हैं कि वह इस निर्णय के खिलाफ प्रतिवाद कर सकते हैं, क्योंकि इससे उनके आराम के दिन प्रभावित होंगे। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि न्याय प्राथमिकता है और समय की मांग है कि न्यायालय अधिक कार्यदिवसों में काम करें।
इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका अब परिणाम आधारित सुधारों की ओर बढ़ रही है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो आने वाले समय में भारतीय न्याय प्रणाली में “न्याय में देरी” की छवि बदलेगी।
