सिंहासन बत्तीसी भारत की लोककथाओं का एक अनमोल रत्न है, जिसमें उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य की 32 पुतलियाँ जीवंत होकर उनके महान कार्यों की कहानियाँ सुनाती हैं। यह कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि न्याय, धर्म, त्याग और वीरता की मिसाल हैं। जब वर्षों बाद राजा भोज को विक्रमादित्य का राजसिंहासन प्राप्त होता है, तो वे जब भी उसपर बैठने का प्रयास करते हैं, एक-एक करके पुतलियाँ उन्हें रोकती हैं और पूछती हैं – क्या तुम विक्रम के समान योग्य हो?
पहली पुतली का नाम था रत्नमंजरी। वह प्रकट होकर राजा भोज से पूछती है – क्या तुम्हारे भीतर वैसा ही त्याग, न्याय और जनकल्याण की भावना है, जैसी विक्रम में थी? क्या तुम भी उस सिंहासन पर बैठने के योग्य हो? यदि हाँ, तो मेरी कहानी सुनो, और निर्णय स्वयं करो। इसके बाद वह विक्रमादित्य की एक कथा सुनाती है, जो उनके अडिग न्याय का प्रतीक है।
कहानी थी एक बूढ़े ब्राह्मण की, जो अपनी बेटी की अस्थियाँ लेकर दरबार में आता है। उसका आरोप था कि उसकी बेटी को दहेज के लोभी ससुराल वालों ने जला दिया, लेकिन इसे आत्महत्या का रूप दे दिया गया। राजा विक्रम ने मामले को गंभीरता से लिया और बिना देर किए अपने गुप्तचरों को सच्चाई की जांच के लिए भेजा। जांच में आरोप सही पाए गए। राजा ने न केवल दोषियों को पकड़वाया, बल्कि उन्हें ऐसी सजा दी कि पूरे राज्य में संदेश गया – स्त्री पर अत्याचार अब बर्दाश्त नहीं होंगे। उन्होंने ब्राह्मण को न्याय दिया और मृत बेटी के सम्मान में राज्य में नारी शिक्षा और सुरक्षा के लिए विशेष योजना शुरू करवाई। राजा विक्रम का यह निर्णय समाज में न्याय की नई नींव बन गया।
रत्नमंजरी ने कहा – विक्रम वह राजा था, जो केवल सिंहासन पर नहीं बैठा, बल्कि जनता के हृदय में राज करता था। क्या तुम वैसी निस्वार्थता और निर्णायकता रखते हो, राजा भोज? यह सुनकर भोज चुप रहे। उन्होंने महसूस किया कि अभी वे विक्रम की महानता के समकक्ष नहीं पहुँच सके हैं।
सिंहासन बत्तीसी की यह पहली कथा हमें यह सिखाती है कि सच्चा शासक वह नहीं जो केवल ताज पहनता है, बल्कि वह है जो जनता के दुख-सुख में सहभागी होता है, अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, और धर्म की रक्षा करता है। रत्नमंजरी की कथा नारी सम्मान, न्याय और राजा के कर्तव्य की प्रेरणादायक मिसाल है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस काल में थी।
