स्त्री की आस्था, श्रद्धा और तपस्या का पर्व है - “हरतालिका तीज”

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारतीय संस्कृति का आधार व्रत, तप और साधना है। जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर धर्म यह सिखाता है कि मनुष्य केवल भौतिक सुख-सुविधाओं से संतुष्ट नहीं होता है, बल्कि आत्मिक उन्नति और सामाजिक संतुलन भी उसके लिए आवश्यक है। इसी भाव को साकार करने वाले पर्वों में से एक है हरतालिका तीज। यह केवल एक व्रत ही नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन का वह दिव्य यज्ञ है, जिसमें स्त्री अपनी आस्था, श्रद्धा और तपस्या से जीवन को परम सुख और सौभाग्य से भर देती है।

हरतालिका तीज, भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं और कन्याओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इसका मूल स्वरूप माता पार्वती की आराधना से जुड़ा है। इस व्रत का पालन करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कन्याओं को मनोनुकूल वर की प्राप्ति होती है।

यह पर्व केवल पति-पत्नी के दांपत्य प्रेम और सौभाग्य तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह तप, साधना, संयम और आत्मबल की शिक्षा भी देता है। हरतालिका तीज वास्तव में गृहस्थ जीवन का सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है, जो पति-पत्नी के बीच अटूट विश्वास और गहन प्रेम की आधारशिला रखता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। उनकी सखियों ने उनका हरण कर उन्हें घने वन में ले जाकर छोड़ दिया, ताकि वे अपने पिता हिमालय के दबाव में आकर किसी और से विवाह न कर लें। पार्वतीजी ने घने वन में तपस्या की और अंततः शिव को प्राप्त किया।

इसी घटना के कारण इस पर्व का नाम हरतालिका पड़ा। ‘हरित’ का अर्थ है हरियाली और जीवन की ताजगी, जबकि ‘आलिका’ का अर्थ है सखी। पार्वती की यह तपस्या इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि तप, संयम और ध्यान से ही जीवन में इच्छित फल प्राप्त होता है।

हरतालिका तीज का व्रत बहुत कठिन माना जाता है। इसमें महिलाएँ निर्जला उपवास करती हैं, अर्थात जल तक ग्रहण नहीं करती। व्रत का आरंभ प्रातःकाल स्नान-ध्यान से होता है। महिलाएँ सुंदर वस्त्र धारण कर श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र का विधिपूर्वक पूजन करती हैं।



व्रत की प्रमुख विशेषताएँ हैं, निर्जला उपवास- न जल, न अन्न ग्रहण किया जाता है। पूजन विधान- बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेशजी की प्रतिमा बनाकर पूजन। श्रृंगार- महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं और सुहाग का प्रतीक वस्त्राभूषण धारण करती हैं। रात्रि जागरण- रात्रि में गीत, भजन और कथाओं का आयोजन होता है। यह व्रत अगले दिन प्रातःकाल भगवान शिव-पार्वती की आरती और व्रत-समापन के साथ संपन्न होता है।

हरतालिका तीज केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह तप और साधना का प्रतीक है। इस व्रत से स्त्रियों को आत्मबल और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। जब स्त्री अपने पति की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली के लिए कठोर तप करती है, तो यह गृहस्थ जीवन के लिए एक महान यज्ञ बन जाता है।

यह पर्व सिखाता है कि आत्म-संयम और धैर्य से जीवन में सभी कठिनाइयों को पार किया जा सकता है। तप और ध्यान से प्राप्त होने वाली ऊर्जा मनुष्य को निर्भय और संतुलित बनाता है।

हरतालिका तीज का संबंध हरियाली और प्रकृति से भी है। भाद्रपद का महीना वर्षा ऋतु का समय होता है, जब प्रकृति हरी-भरी हो जाती है। इसीलिए इसे ‘हरित’ से जोड़कर देखा जाता है। पार्वती स्वयं पर्वतपुत्री और प्रकृति की प्रतीक हैं। इस पर्व के माध्यम से मानव और प्रकृति के बीच का अटूट संबंध भी प्रकट होता है।

भारतीय समाज में हरतालिका तीज का विशेष सामाजिक महत्व है। इस दिन महिलाएँ एक साथ इकट्ठा होकर गीत-भजन करती हैं, अपने अनुभव साझा करती हैं और एक-दूसरे को आशीर्वाद देती हैं। यह पर्व महिलाओं के बीच सामाजिक एकता और आनंद का प्रतीक बन जाता है।

पारिवारिक दृष्टिकोण से भी यह पर्व विशेष है। पति-पत्नी के बीच का गहरा विश्वास, परिवार की खुशहाली और संतुलित गृहस्थ जीवन, हरतालिका तीज से जुड़े हैं।

हरतालिका तीज केवल व्रत का पर्व नहीं है, बल्कि यह उमंग और उल्लास का भी उत्सव है। इस दिन पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं, नृत्य और झूले का आयोजन होता है। स्त्रियाँ पारंपरिक गीतों के माध्यम से शिव-पार्वती की महिमा गाती हैं। यह दिन प्रेम, आनंद और मिलन का संदेश लेकर आता है।

भारतीय दर्शन में गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। गृहस्थ ही वह केंद्र है, जहाँ से समाज की अन्य व्यवस्थाएँ संचालित होती हैं। हरतालिका तीज इसी गृहस्थ धर्म का महायज्ञ है, जिसमें स्त्रियाँ अपने तप और साधना से परिवार को सुदृढ़ बनाती हैं।

यह व्रत सिखाता है कि परिवार और समाज की मजबूती के लिए त्याग, संयम और तप आवश्यक है। जब परिवार मजबूत होता है, तभी समाज और राष्ट्र सशक्त बनते हैं।

आज की व्यस्त जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश में भी हरतालिका तीज का महत्व कम नहीं हुआ है। भले ही परंपराओं का स्वरूप बदल रहा हो, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वैसी ही है। आज भी स्त्रियाँ पूरे उत्साह से इस व्रत को करती हैं और जीवन में प्रेम, सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

हरतालिका तीज आधुनिक युग में भी यह संदेश देती है कि आत्मबल, धैर्य और संयम ही सच्चे सुख और सफलता की कुंजी हैं।

हरतालिका तीज गृहस्थ जीवन का महान यज्ञ है, जिसमें तप, संयम और आस्था की आहुति देकर जीवन को संपूर्ण बनाया जाता है। यह पर्व सिखाता है कि तप और ध्यान से ही जीवन में सिद्धि प्राप्त होती है। शिव और शक्ति का यह मिलन केवल दांपत्य प्रेम का ही प्रतीक नहीं, बल्कि यह संपूर्ण जीवन की पूर्णता का संदेश है। हरतालिका तीज वास्तव में भारतीय संस्कृति का वह अद्भुत उत्सव है, जो स्त्री-पुरुष, मानव-प्रकृति और समाज-परिवार के बीच संतुलन स्थापित करता है।



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