आभा सिन्हा, पटना,
उत्तराखंड देवभूमि कहलाता है। यहाँ की हर घाटी, हर नदी, हर पर्वत किसी न किसी देवी-देवता से जुड़ा हुआ है। हिमालय की गोद में बसे इन गांवों में ऐसी-ऐसी मान्यताएँ और आस्थाएँ देखने को मिलती हैं जो आज भी विज्ञान को चुनौती देती हैं। इन्हीं रहस्यमयी और अलौकिक स्थलों में से एक है “लाटू देवता का मंदिर”, जो चमोली जिले के देवाल ब्लॉक के वाण गांव में स्थित है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं, गूढ़ रहस्यों और गहरी आस्था के लिए पूरे उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चित है।
वाण गांव, चमोली जिले के अंतर्गत एक सुंदर और सुरम्य स्थल है। यह गांव नंदा देवी राजजात यात्रा का भी प्रमुख पड़ाव है। चारों ओर फैली हरियाली, बुग्यालों से घिरे पर्वत और परंपराओं से ओतप्रोत यह गांव देवभूमि की वास्तविक झलक दिखाता है। यहीं स्थित है “लाटू देवता का मंदिर”, जो मान्यता के अनुसार देवी नंदा देवी के क्षेत्रपाल (क्षेत्रपालन देवता) माने जाते हैं।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार वैशाख पूर्णिमा के दिन ही खुलते हैं। उस दिन लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं। कपाट खुलने के साथ ही पूरे क्षेत्र में लोकगीत, जागर, झोड़ा और झुमेला की धुन गूंज उठती है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कपाट खुलने पर भी कोई भक्त मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं कर सकता। यहाँ तक कि पुजारी भी गर्भगृह में आँख और मुँह पर काली पट्टी बाँधकर ही प्रवेश करते हैं।
मान्यता है कि “लाटू देवता” नागराज के रूप में मंदिर के गर्भगृह में विराजमान हैं। उनके पास एक अद्भुत मणि भी है, जिसकी चमक और तेज इतना प्रखर है कि जो भी उसे देख ले, वह तत्काल अपनी आँखों की रोशनी खो बैठता है। इसलिए किसी को भी सीधे गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। पुजारी भी केवल सफाई और पूजा-अर्चना के लिए आँखों पर पट्टी बाँधकर ही अंदर जाते हैं। यह परंपरा सदियों से निर्वाह की जा रही है।
“लाटू देवता” को लेकर अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे नंदा देवी के भाई हैं और उनके क्षेत्रपाल भी। नंदा देवी की यात्रा (नंदा राजजात यात्रा) जब-जब निकलती है, “लाटू देवता” का आशीर्वाद अनिवार्य रूप से लिया जाता है।
एक अन्य मान्यता यह भी है कि “लाटू देवता” युद्धकला में निपुण थे और उन्होंने अपने शौर्य और पराक्रम से पूरे क्षेत्र की रक्षा की। उनकी शक्ति और तेज ही उन्हें नागराज के रूप में पूजनीय बनाता है।
जब वैशाख पूर्णिमा को मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो वाण गांव में एक विशाल मेला लगता है। ढोल-दमाऊ की थाप पर जागर गाए जाते हैं। झोड़ा और झुमेला जैसे लोकनृत्य श्रद्धालुओं और ग्रामीणों द्वारा सामूहिक रूप से किए जाते हैं। पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठता है "जय लाटू देवता की" इस अवसर पर पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुँचते हैं और स्थानीय संस्कृति से रूबरू होते हैं।
“लाटू देवता” के मंदिर से जुड़ी सबसे बड़ी रहस्यपूर्ण बात है- उनकी मणि। कहा जाता है कि इस मणि का तेज साधारण इंसान की आँखें सहन ही नहीं कर सकतीं। यह भी मान्यता है कि कई शताब्दियों पहले कुछ लोगों ने मंदिर के भीतर जाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी आँखों की रोशनी चली गई। इसके बाद से किसी ने भी यह साहस नहीं किया।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि “लाटू देवता” सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। लोग दूर-दूर से मन्नतें मांगने आते हैं। खेतों की उपज, पशुधन की वृद्धि, परिवार की खुशहाली और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति के लिए श्रद्धालु यहाँ प्रार्थना करते हैं।
मंदिर हिमालयी शैली की पारंपरिक वास्तुकला में निर्मित है। लकड़ी और पत्थर की नक्काशी, मंदिर परिसर में बने छोटे-छोटे पत्थरों के ढेर और ध्वज श्रद्धालुओं की आस्था को दर्शाते हैं। मंदिर अपेक्षाकृत छोटा जरूर है, लेकिन इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत विशाल है।
यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के पीछे कोई ऊर्जा स्रोत या प्राकृतिक रेडिएशन भी हो सकता है। हिमालयी क्षेत्र में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ प्राकृतिक चुंबकीय तरंगें या अन्य ऊर्जा प्रभाव मौजूद रहते हैं। संभवतः “लाटू देवता” का मंदिर भी इसी प्रकार की किसी अदृश्य ऊर्जा का केंद्र हो। हालांकि विज्ञान आज तक इस रहस्य को सुलझा नहीं पाया है।
नंदा देवी को उत्तराखंड की आराध्य देवी माना जाता है। हर 12 साल में निकलने वाली नंदा राजजात यात्रा में “लाटू देवता” की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब तक “लाटू देवता” की अनुमति नहीं मिलती, यात्रा आगे नहीं बढ़ती। यह परंपरा आज भी अक्षुण्ण है और “नंदा देवी और लाटू देवता” के भाई-बहन संबंध की पुष्टि करती है।
“लाटू देवता मंदिर” के कपाट खुलने के समय बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु वाण गांव आते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। होटल, होमस्टे, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की बिक्री से ग्रामीणों को आय प्राप्त होती है। इस प्रकार यह धार्मिक आयोजन स्थानीय विकास का भी साधन है।
“लाटू देवता का मंदिर” इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार आस्था और रहस्य एक साथ मिलकर किसी स्थल को विशेष बना देते हैं। यहाँ श्रद्धा है, परंपरा है, रहस्य है और हिमालय की आध्यात्मिक छाया है। यही कारण है कि यह मंदिर हर उस व्यक्ति के लिए विशेष है जो देवभूमि की आत्मा को महसूस करना चाहता है।
“लाटू देवता का मंदिर” केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और रहस्य का अद्भुत संगम है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी अदृश्य शक्ति का अनुभव अवश्य करता है। विज्ञान इसे भले ही रहस्य कहे, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी आस्था और विश्वास का आधार मानते हैं।
