भारतीय राजनीति हमेशा से संघर्ष, मतभेद और विचारधाराओं की भिन्नताओं पर टिकी रही है। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि अलग-अलग विचारधाराएँ जनता के बीच जाती हैं और जनता तय करती है कि किसे सत्ता की बागडोर सौंपी जाए। लेकिन जब यह संघर्ष व्यक्तिगत कटुता और दुश्मनी में बदल जाए, तो राजनीति अपने पवित्र स्वरूप को खो देती है। चुनाव प्रचार का मंच, जो मतदाताओं तक नीतियाँ और दृष्टिकोण पहुँचाने का माध्यम होना चाहिए, यदि गालियों और व्यक्तिगत आक्षेपों से भर जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 भी अब ऐसे ही मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। राहुल गांधी की भाषा और उनके मंचीय भाषणों में आई तीखी कटुता ने राजनीति की गरिमा को चोट पहुँचाई है। दरभंगा की घटना, जिसमें खुले मंच से प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ, केवल एक चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत है।
भारत की राजनीति में मर्यादा और शिष्टाचार का बड़ा महत्व रहा है। चाहे नेहरू-शास्त्री युग हो या अटल-आडवाणी काल, राजनीतिक विरोध का स्वर कभी इतना असभ्य नहीं हुआ कि वह व्यक्तिगत गालियों में बदल जाए। विपक्ष की भूमिका सरकार की गलतियों को उजागर करना, वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करना और जनता के सवालों को उठाना है, लेकिन यदि विपक्ष का स्वर केवल नफरत और गाली-गलौज तक सीमित हो जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
गांधी जी ने राजनीति को सत्य और अहिंसा पर आधारित करने की बात कही थी। लेकिन आज के माहौल में भाषा की मर्यादा इतनी टूट चुकी है कि चुनावी सभाएँ अब गाली-गलौज और कटाक्ष का अखाड़ा बन चुका है।
राहुल गांधी हाल के वर्षों में अपनी राजनीति को आक्रामक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष को यह लगता है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता को चुनौती देने के लिए उन्हें सख्त और आक्रामक रुख अपनाना पड़ेगा। लेकिन आक्रामकता और असभ्यता में बहुत बारीक अंतर है। दरभंगा में प्रधानमंत्री को लेकर जिस प्रकार की अपशब्दावली का प्रयोग हुआ, वह न केवल राहुल गांधी की छवि को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों को भी भारी पड़ सकता है।
राजद के तेजस्वी यादव, जो बिहार की राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकते थे, अब राहुल गांधी की भाषा का खामियाजा भुगतते दिख रहे हैं। जनता यह समझ रही है कि अगर चुनाव केवल गालियों तक सिमट गया, तो भविष्य में राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद बेमानी होगी।
चुनाव में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं। कोई भी विपक्ष सरकार की गलतियों को गिनाएगा, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार को कटघरे में खड़ा करेगा। लेकिन जब यह आलोचना व्यक्तिगत अपमान या गाली तक पहुँच जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो जाता है।
दरभंगा का मामला इसीलिए अलग है क्योंकि इसमें केवल एक नेता की आलोचना नहीं हुई, बल्कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा को भी चोट पहुँचाई गई। प्रधानमंत्री केवल एक पार्टी का नेता नहीं होता है, बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधि होता है। जब उसके लिए मंच से अपमानजनक शब्द कहे जाते हैं, तो यह पूरे लोकतंत्र का अपमान होता है।
यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि इस्लाम या किसी भी बड़े धर्म में गाली देने की परंपरा नहीं है। इस्लाम में आदाब और तहजीब पर बहुत जोर दिया जाता है। गाली देना न केवल पाप माना गया है बल्कि यह इंसान की शख्सियत को भी छोटा करता है। कुरान और हदीस दोनों में ही स्पष्ट कहा गया है कि इंसान की जुबान से केवल अच्छे शब्द निकलने चाहिए।
दरभंगा की घटना में जिस प्रकार से धार्मिक पहचान वाले मंच से गाली निकली, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अब राजनीति धर्म की बुनियादी शिक्षाओं को भी दरकिनार कर देगी? गाली की यह संस्कृति न केवल राजनीति को खोखला करेगी बल्कि समाज के ताने-बाने को भी कमजोर करेगी।
गालियों का चुनावी मंच पर इस्तेमाल केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है। इसका सीधा असर समाज पर पड़ता है। जब नेता गाली देते हैं, तो समर्थक भी उसी भाषा को अपनाने लगते हैं। इससे समाज में कटुता, नफरत और विभाजन गहराने लगता है। लोकतंत्र का असली उद्देश्य समाज को जोड़ना है, लेकिन गाली की राजनीति समाज को तोड़ने का काम करती है।
आज जिस प्रकार से सोशल मीडिया पर गालियों और व्यक्तिगत आक्षेपों की बाढ़ आई हुई है, उसमें चुनावी मंच से गालियों का इस्तेमाल आग में घी डालने जैसा है। यह संस्कृति आने वाली पीढ़ी को गलत संदेश दे रही है कि राजनीति का मतलब केवल विरोधी को नीचा दिखाना है, न कि जनता की समस्याओं का समाधान।
बिहार हमेशा से भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ के चुनाव पूरे देश के लिए एक राजनीतिक दिशा तय करते हैं। लेकिन अगर बिहार चुनाव गालियों के कारण सुर्खियों में आ जाए, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
राहुल गांधी की भाषा और दरभंगा की घटना ने बिहार चुनाव को एकतरफा मोड़ पर ला दिया है। जनता अब मुद्दों से ज्यादा नेताओं की भाषा को लेकर चिंतित है। तेजस्वी यादव, जो युवाओं के नेता के रूप में उम्मीदें जगा सकते थे, अब राहुल गांधी की गलतियों की सजा भुगत रहे हैं।
राजनीति जब व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाती है, तो वह अपनी ही बर्बादी की तस्वीरें उकेरती है, वही स्थिति अब दिखाई दे रही है। बिहार चुनाव अब केवल सत्ता परिवर्तन का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा भी बन गया है।
यदि चुनावी मंच गालियों और व्यक्तिगत हमलों से भरे रहेंगे, तो लोकतंत्र की चिता पर राजनीति की लकीर खिंच जाएगी। यह लकीर आने वाली पीढ़ियों के लिए गलत संदेश छोड़ेगी कि राजनीति में जीतने का तरीका विरोधी को अपमानित करना है, न कि जनता की सेवा करना।
अब सवाल यह है कि इस स्थिति से बाहर कैसे निकला जाए। सबसे पहला कदम होना चाहिए कि सभी राजनीतिक दल गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों से परहेज करें। चुनाव आयोग को भी ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। नेताओं को यह समझना होगा कि जनता गालियों से नहीं, बल्कि नीतियों और विकास के वादों से प्रभावित होती है।
राजनीति को पुनः जनता के मुद्दों पर केंद्रित करना होगा। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्या, महिला सुरक्षा, यह वह विषय है जिन पर नेताओं को बोलना चाहिए, न कि विरोधियों पर अपशब्द।
बिहार चुनाव 2025 केवल एक चुनाव नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की मर्यादा का भी इम्तहान है। राहुल गांधी की भाषा और दरभंगा की घटना ने यह साफ कर दिया है कि यदि राजनीति से मर्यादा गायब हो जाए, तो वह दुश्मनी का रूप ले लेती है। और जब दुश्मनी सर पर चढ़कर तांडव करती है, तो अपनी ही बर्बादी की तस्वीरें बनाती है।
