ब्रह्माण्ड अनगिनत रहस्यों से भरा हुआ है। जितना अधिक इसे समझने की कोशिश करते हैं, उतने ही नए सवाल सामने आ जाते हैं। सितारों, ग्रहों और गैलेक्सियों के बीच एक ऐसा अदृश्य तत्व मौजूद है जो पूरे ब्रह्माण्ड को संभाले हुए है। यह है “डार्क मैटर”। वैज्ञानिकों के अनुसार, “डार्क मैटर” ब्रह्माण्ड का लगभग 27% हिस्सा है, जबकि सामान्य पदार्थ मात्र 5%। बाकी का 68% हिस्सा “डार्क एनर्जी” का है। दिलचस्प बात यह है कि “डार्क मैटर” को देख नहीं सकते, केवल इसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को महसूस कर सकते हैं।
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की एक स्टडी ने “डार्क मैटर” से जुड़े एक बेहद चौंकाने वाले रहस्य का खुलासा किया है। शोध के अनुसार, बृहस्पति (जुपिटर) जैसे विशाल गैस ग्रहों के भीतर “डार्क मैटर” जमा होकर उन्हें छोटे ब्लैक होल में बदल सकता है। यह दावा वैज्ञानिकों और आम लोगों, दोनों के लिए रोमांचक है, क्योंकि यदि यह सिद्ध हो गया तो ब्रह्माण्ड की संरचना और विकास की समझ पूरी तरह बदल जाएगी।
“डार्क मैटर” को समझने से पहले यह जानना होगा कि यह आखिर है क्या। सामान्य पदार्थ (जिससे शरीर, पृथ्वी, सूर्य और गैलेक्सियाँ बनी हैं) इलेक्ट्रॉन्स, प्रोटॉन्स और न्यूट्रॉन्स से बना होता है। लेकिन जब वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड का अध्ययन किया तो पाया कि दृश्य पदार्थ से मिलने वाला गुरुत्वाकर्षण ब्रह्माण्ड की गतियों को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
गैलेक्सी की बाहरी तारों की गति, गैलेक्सी क्लस्टर्स की संरचना, कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन, सबने इशारा किया है कि कोई अदृश्य पदार्थ है जो अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से पूरे ब्रह्माण्ड को थामे हुए है। इसी रहस्यमयी पदार्थ को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है “डार्क मैटर”।
सौरमंडल के बाहर अब तक 5000 से अधिक एक्सोप्लैनेट्स की खोज हो चुका है। इन ग्रहों का अध्ययन केवल जीवन की संभावना जानने के लिए ही नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड के रहस्यों को सुलझाने के लिए भी किया जाता है। कैलिफोर्निया की स्टडी में वैज्ञानिकों ने यह प्रस्तावित किया है कि “डार्क मैटर” के भारी कण (Massive Particles) लंबे समय तक जुपिटर जैसे विशाल ग्रहों के भीतर जमा हो सकता है। समय के साथ यह कण एक केंद्र में इकट्ठा होकर इतना घना क्षेत्र बना सकता है कि ग्रह स्वयं ही छोटे ब्लैक होल में बदल जाए। इसका अर्थ यह है कि अगर यह थ्योरी सही हुई, तो हर बड़ा ग्रह “डार्क मैटर” के लिए एक प्रकार का "जाल" बन सकता है।
जुपिटर सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। यह मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से बना है। इसका व्यास पृथ्वी से लगभग 11 गुना और द्रव्यमान 318 गुना अधिक है। इतना विशाल ग्रह डार्क मैटर को अपनी ओर खींचने और उसे भीतर समाहित करने की अद्भुत क्षमता रखता है। यदि जुपिटर जैसे ग्रहों के भीतर डार्क मैटर के कण फंसकर इकट्ठा होने लगें तो धीरे-धीरे उनका घनत्व इतना अधिक हो सकता है कि वे ब्लैक होल बनने की प्रक्रिया शुरू कर दें।
ब्लैक होल बनने की सामान्य प्रक्रिया तारों के ढहने से जुड़ी होती है। जब सूर्य से कई गुना बड़े तारे का ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह अपने गुरुत्वाकर्षण बल से ढहकर ब्लैक होल में बदल जाता है। लेकिन अगर “डार्क मैटर” ग्रहों में इकट्ठा होकर ब्लैक होल बनाए, तो यह बिल्कुल नई और अनोखी प्रक्रिया होगी।
“डार्क मैटर” कणों का ग्रह में प्रवेश- “डार्क मैटर” हर जगह फैला हुआ है। जब ग्रह अपनी कक्षा में घूमता हैं, तो “डार्क मैटर” कण उनके भीतर प्रवेश करता रहता है। कणों का जमावड़ा- धीरे-धीरे यह कण ग्रह के केंद्र में जमा होने लगता है। घनत्व में वृद्धि- समय के साथ घनत्व इतना बढ़ जाता है कि वह सामान्य गुरुत्वाकर्षण को पछाड़ देता है। ब्लैक होल का जन्म- ग्रह का केंद्र ध्वस्त होकर ब्लैक होल का रूप ले सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्पेस टेलीस्कोप्स और नए मिशन इस थ्योरी की जांच कर सकता है। यदि किसी ग्रह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ा हुआ दिखे या वहां से अनजान रेडिएशन निकलता हो, तो यह “डार्क मैटर” की गतिविधि का प्रमाण हो सकता है। नासा का जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) और भविष्य के मिशन जैसे रोमन स्पेस टेलीस्कोप इस रहस्य से पर्दा उठाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
अगर यह सिद्ध हो जाता है कि “डार्क मैटर” ग्रहों को ब्लैक होल में बदल सकता है, तो इसके गहरे प्रभाव होंगे। यह स्वीकार करना होगा कि ग्रह भी ब्लैक होल बनने की क्षमता रखता है। इससे पता चलेगा कि “डार्क मैटर” किस प्रकार के कणों से बना है और वे कैसे व्यवहार करता है। अगर “डार्क मैटर” ग्रहों को निगल सकता है, तो भविष्य में पूरी गैलेक्सियों की संरचना बदल सकता है।
