सिद्धिदा (अंबिका) शक्तिपीठ (देवी सती का जीभ गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
0

 

सिद्धिदा (अंबिका) शक्तिपीठ (देवी सती का जीभ गिरा था)

आभा सिन्हा, पटना

भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म, आस्था और आध्यात्मिकता जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यहाँ अनगिनत मंदिर, तीर्थ और शक्तिपीठ स्थित हैं, जिनका महत्व न केवल धार्मिक दृष्टि से है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अनुपम है। हिमाचल प्रदेश की वादियों में स्थित “सिद्धिदा (अंबिका) शक्तिपीठ”, जिसे प्रायः ज्वालाजी मंदिर के नाम से जाना जाता ह। यह स्थान माँ शक्ति के उन 51 शक्तिपीठों में शामिल है जहाँ देवी सती के अंग गिरे थे। मान्यता है कि यहाँ देवी की जीभ गिरी थी। इसी कारण, यहाँ प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई ज्वालाओं को, देवी की शक्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप माना जाता है।

शक्तिपीठों की कथा का संबंध सती और शिव से है। जब राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और उसमें शिव का अपमान किया गया, तब सती ने क्रोधित होकर आत्मदाह कर लिया। इस दुःख से व्याकुल शिव सती के शरीर को उठाकर तांडव करने लगे। तब सृष्टि को बचाने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों का उद्भव हुआ।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला में स्थित ज्वालाजी वही स्थान है जहाँ सती की जीभ गिरी थी। इसीलिए यहाँ प्रकट हुई अनंत ज्वालाओं को माता की शक्ति माना जाता है। इस स्थान की शक्ति को सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव को उन्मत्त कहा जाता है।

ज्वालाजी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में स्थित है, जो शिमला से लगभग 150 किलोमीटर और कांगड़ा नगर से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 610 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। मंदिर का मुख्य आकर्षण है प्राकृतिक अग्नि ज्वालाएँ। मंदिर में कई स्थानों से निरंतर ज्वालाएँ निकलती हैं, जो बिना किसी ईंधन या तेल के हजारों वर्षों से प्रज्वलित हैं। इन्हें नौ विभिन्न रूपों में देखा जाता है और इन ज्वालाओं को माता के नौ रूपों  यथा- महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका, अंजना।  इन ज्वालाओं का दर्शन करना भक्तों के लिए अत्यंत पावन माना जाता है।

"सिद्धिदा" शब्द का अर्थ है,  सिद्धियाँ प्रदान करने वाली। ज्वालाजी की यह शक्ति भक्तों की साधना को सिद्ध करने वाली, उनकी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली और जीवन में सफलता प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। अंबिका स्वरूप माँ का वह रूप है जो समस्त जगत की जननी है। यहाँ माता का स्वरूप विशेष रूप से "सिद्धियों की दात्री" के रूप में प्रतिष्ठित है।

हर शक्तिपीठ में देवी के साथ एक भैरव की उपस्थिति मानी जाती है। ज्वालाजी में भैरव का नाम है उन्मत्त। "उन्मत्त" का अर्थ है,  दिव्य उन्माद में रहने वाले, जो भक्ति और शक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक हैं।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है ज्वालाएँ, जो अनादिकाल से जल रही हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से माना जाता है कि यह ज्वालाएँ भूमिगत प्राकृतिक गैस के स्रोत से निकलती हैं। परंतु धार्मिक आस्था के अनुसार ये स्वयं देवी का प्रत्यक्ष स्वरूप हैं।

कहा जाता है कि इन ज्वालाओं को बुझाने के अनेक प्रयास हुए, पर वे कभी नहीं बुझीं। चाहे आंधी हो, तूफान हो या बारिश, ये ज्वालाएँ निरंतर जलती रहती हैं।

ज्वालाजी मंदिर का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक ग्रंथों और यात्रावृतांतों में मिलता है। महाभारत में भी इस स्थान का उल्लेख आता है। मुगल बादशाह अकबर ने भी इस मंदिर की ज्वालाओं को देखकर अपनी तलवार अर्पित की थी। कहा जाता है कि अकबर ने ज्वालाओं को बुझाने का प्रयास किया, पर असफल रहा। इसके बाद उसने देवी की शक्ति को स्वीकार कर मंदिर में स्वर्ण छत्र चढ़ाया। सिक्ख गुरुओं, विशेषकर गुरु गोबिंद सिंह जी, ने भी इस स्थान का दर्शन किया था।

ज्वालाजी मंदिर का निर्माण शैली उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य की झलक प्रस्तुत करती है। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि केवल ज्वालाएँ हैं। यही इस मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता है। मंदिर में भक्तजन तेल, घी और नारियल अर्पित करते हैं।

ज्वालाजी शक्तिपीठ को प्रायः हिंगलाज माता का अवतार भी माना जाता है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर आज भी विद्यमान है। भारत विभाजन के बाद वहाँ जाना कठिन हो गया, तो ज्वालाजी का महत्व और भी अधिक बढ़ गया।

ज्वालाजी में वर्ष भर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, लेकिन विशेष अवसरों पर यहाँ भव्य मेला आयोजित होता हैं। चैत्र और अश्विन नवरात्रों में यहाँ लाखों भक्त आते हैं। भक्त यहाँ नारियल, चुनरी और सोने-चाँदी के आभूषण चढ़ाते हैं। प्रतिदिन यहाँ विशेष आरती होती है।

ज्वालाजी केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा का स्रोत है। यहाँ पहुँचकर साधक को आत्मिक शांति और शक्ति की अनुभूति होती है। आस्था है कि जो भक्त सच्चे मन से ज्वालाजी के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यहाँ साधना करने से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। निसंतान दंपति यहाँ संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

ज्वालाजी से जुड़ी अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं, कहते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहाँ पूजा किया था। राजा अकबर की तलवार का प्रसंग तो प्रसिद्ध है ही, इसके अलावा राणा प्रताप जैसे शूरवीरों ने भी यहाँ आशीर्वाद लिया था। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहाँ माता की ज्वालाओं में कभी कमी नहीं आई और न कभी आएगी।

आज ज्वालाजी मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं।

जब भक्त मंदिर में प्रवेश करता है और गर्भगृह में जल रही ज्वालाओं को देखता है, तो उसके हृदय में श्रद्धा और विस्मय दोनों भाव उत्पन्न होते हैं। ये ज्वालाएँ मानो कहती हैं कि माँ की शक्ति शाश्वत है।

सिद्धिदा (अंबिका) शक्तिपीठ अर्थात ज्वालाजी मंदिर, आस्था, शक्ति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। यह स्थान इस बात का प्रतीक है कि देवी शक्ति अनादि और अनंत है। यहाँ की ज्वालाएँ यह स्मरण कराती हैं कि माँ की शक्ति कभी क्षीण नहीं होती, बल्कि वह सदा अपने भक्तों का कल्याण करती रहती है।हिमाचल की वादियों में स्थित यह शक्तिपीठ केवल पूजा का स्थान ही नहीं, बल्कि यह श्रद्धा, भक्ति और संस्कृति की धरोहर भी है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top