केरल में फैली दिमाग खाने वाले - “अमीबा”

Jitendra Kumar Sinha
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भारत के दक्षिणी राज्य केरल ने हाल के वर्षों में कई स्वास्थ्य संकट देखे हैं, चाहे वह निपाह वायरस हो, कोविड-19 की लहरें हो, या फिर डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियाँ। लेकिन इन सबके बीच अब एक नया और भयावह खतरा सिर उठा रहा है “नेगलेरिया फाउलेरी”, जिसे दुनिया “ब्रेन-ईटिंग अमीबा” या दिमाग खाने वाला अमीबा कहती है। यह ऐसा सूक्ष्मजीव है जो दिखाई नहीं देता है, लेकिन शरीर में प्रवेश करते ही सीधा इंसान के मस्तिष्क तक पहुँचकर उसे नष्ट कर देता है।

इस अमीबा से होने वाला संक्रमण प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफेलाइटिस (PAM) कहलाता है। यह बीमारी इतनी तेजी से बढ़ती है कि अक्सर डॉक्टरों के पास सही निदान करने का समय भी नहीं बचता है।

नेगलेरिया फाउलेरी एक फ्री-लिविंग अमीबा है, जो प्रोटोजोआ वर्ग का सूक्ष्मजीव है। यह मुख्य रूप से गर्म मीठे पानी जैसे झीलों, तालाबों, नदियों और गर्म पानी के झरनों में पनपता है। इसका आकार माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है। यह 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म पानी में जीवित रह सकता है। आमतौर पर यह शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाता है, लेकिन जब पानी नाक के जरिए भीतर चला जाता है तो यह olfactory nerve के रास्ते सीधे मस्तिष्क तक पहुँच जाता है।

जब कोई व्यक्ति झील, नदी या तालाब में तैरता है। गोताखोरी करते समय पानी नाक में प्रवेश करता है। नाक की नलियों से यह अमीबा घ्राण तंत्रिका (olfactory nerve) के जरिए मस्तिष्क तक जाता है। वहां पहुँचकर यह मस्तिष्क ऊतकों को खाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि इसे ‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ कहा जाता है।

शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसा लगता है, इसीलिए पहचान मुश्किल हो जाता है। इसमें तेज बुखार, सिरदर्द, मतली और उल्टी, गर्दन में अकड़न, सूंघने की क्षमता का कम होना, कुछ ही दिनों में भ्रम, दौरे (seizures), संतुलन बिगड़ना और अंततः कोमा में चला जाता है। संक्रमण के बाद आमतौर पर 5 से 7 दिन में मरीज की मौत हो जाती है।

पहला मामला केरल में वर्ष 2016 में दर्ज हुआ था। उसके बाद हर साल गर्मियों और बारिश के मौसम में sporadic (छिटपुट) मामले सामने आते हैं। 2025 में अब तक कई बच्चों और युवाओं के संक्रमित होने की खबरें मिल चुकी हैं। स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने माना है कि यह समस्या गंभीर होती जा रही है और जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

अमेरिका में हर साल औसतन 0–8 मामले सामने आता है, लेकिन मृत्यु दर 97% तक रहती है। पाकिस्तान में कराची जैसे गर्म और भीड़भाड़ वाले शहरों में कई मौतें दर्ज हुई हैं। थाईलैंड, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अब भारत भी इससे जूझ रहा है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग इस खतरे को और बढ़ा रहा है। बढ़ते तापमान से नदियों और झीलों का पानी गर्म हो जाता है। गर्म पानी में यह अमीबा तेजी से पनपता है। सूखे की स्थिति में जब जलस्रोत सिकुड़ते हैं, तब भी पानी का तापमान बढ़ जाता है। इस तरह, क्लाइमेट चेंज इसे और खतरनाक बना रहा है।

नेगलेरिया फाउलेरी संक्रमण का कोई निश्चित और प्रमाणित इलाज अभी तक मौजूद नहीं है। अब तक जिन कुछ मरीजों को बचाया जा सका है, उन्हें एम्फोटेरिसिन बी, मिल्टेफोसिन, रिफाम्पिसिन और फ्लुकोनाजोल जैसी दवाओं का संयोजन दिया गया। मस्तिष्क की सूजन कम करने के लिए स्टेरॉयड और supportive care दिया जाता है। लेकिन सफलता दर बहुत कम है।

झील, नदी, तालाब या असुरक्षित जलस्रोत में तैराकी से बचना चाहिए।  तैरते समय नाक में पानी न जाने दें। नाक क्लिप का उपयोग करना चाहिए। घरेलू पानी की टंकी और पाइपलाइन की सफाई नियमित करना चाहिए। स्विमिंग पूल में क्लोरीन की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना चाहिए।

जागरूकता अभियान के तहत स्कूलों और पंचायत स्तर पर लोगों को जानकारी दी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की मॉनिटरिंग अंतर्गत अस्पतालों में संदिग्ध मामलों पर तुरंत जांच किया जा रहा है। लैब सुविधा के तहत समय पर निदान के लिए लैब में विशेष टेस्ट की व्यवस्था किया गया है।

भारत और दुनिया के वैज्ञानिक इस पर लगातार शोध कर रहे हैं। मिल्टेफोसिन को एक उम्मीद की किरण माना जा रहा है। वैक्सीन और नई एंटी-अमीबिक दवाओं पर शोध जारी है। नेक्स्ट-जेनरेशन डायग्नॉस्टिक टेस्ट विकसित करने की कोशिशें तेज हैं।

दिमाग खाने वाले अमीबा ने यह साबित कर दिया है कि प्रकृति के छोटे-से छोटे जीव भी इंसान के लिए घातक साबित हो सकता है। यह संकट केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, जल प्रबंधन और जन-जागरूकता से भी जुड़ा हुआ है। 



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