अज्ञान और अहंकार का विनाशक स्वरूप है - महादेव का नटराज अवतार

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भगवान शिव, जिन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है, अपने हर रूप और अवतार में गहन रहस्य और दार्शनिक संदेश समेटे हुए हैं। शिव केवल विनाशक ही नहीं, बल्कि सृजन और संरक्षण के भी आधार हैं। जब भी अहंकार, अज्ञान या अधर्म चरम पर पहुँचता है, महादेव अपने विभिन्न स्वरूपों में प्रकट होकर जगत को सही दिशा दिखाते हैं। उन्हीं स्वरूपों में से एक है नटराज अवतार, जिसे शिव के सबसे अद्भुत और कलात्मक रूपों में गिना जाता है। नटराज का अर्थ है "नृत्य का राजा"। यह केवल एक नृत्य मुद्रा नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड की सृष्टि, पालन और संहार की पूरी प्रक्रिया का प्रतीक है। महाशिवरात्रि पर नटराज स्वरूप की कथा का स्मरण करने से जीवन से हर संकट मिट जाता है और आत्मा को पवित्रता की ओर ले जाता है।

नटराज की प्रतिमा या चित्रण में महादेव को विशेष मुद्रा में दिखाया जाता है। गले में सर्प लिपटे हुए। जटाओं से गंगा बह रही है। एक हाथ में डमरू, जो सृष्टि की ध्वनि और नाद का प्रतीक है। दूसरे हाथ में अग्नि, जो संहार और परिवर्तन का संकेत है। एक हाथ "अभय मुद्रा" में, जो सुरक्षा और आशीर्वाद देता है। दाहिना पैर अपस्मार राक्षस पर रखा हुआ, जो अज्ञान और अहंकार का प्रतीक है। दूसरा पैर आकाश की ओर उठा हुआ, जो मुक्ति और मोक्ष की ओर संकेत करता है। यह स्वरूप केवल कला नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक दर्शन का दर्पण है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह कथा तमिलनाडु के चिदंबरम नामक स्थान से जुड़ी है। यहाँ कुछ ऋषि रहते थे जो अपनी विद्या और तपस्या पर घमंड करने लगे थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि उनके मंत्र, यज्ञ और विद्या से ही ब्रह्मांड चलता है। एक दिन भगवान शिव गरीब व्यक्ति का रूप धरकर वहाँ पहुँचे और उनकी परीक्षा लेने लगे। जब ऋषियों को लगा कि उनकी विद्या पर कोई प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है, तो वे क्रोधित हो उठे। पहला प्रयास उन्होंने जहरीले सर्प छोड़कर शिव को मारने की कोशिश की। शिव ने उन्हें गले में हार बना लिया। दूसरा प्रयास ऋषियों ने अग्नि उत्पन्न कर शिव की ओर भेजी। शिव ने उसे हाथ में अग्नि की ज्योति बना लिया। तीसरा प्रयास उन्होंने एक राक्षस "अपस्मार" का सृजन किया। शिव ने उसे पैरों तले दबा दिया और उसी पर खड़े होकर तांडव नृत्य करने लगे। यह देखकर ऋषियों का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने समझ लिया कि ब्रह्मांड किसी मंत्र या यज्ञ से नहीं, बल्कि महादेव की शक्ति से संचालित होता है।



शिव का नटराज नृत्य केवल क्रोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि उसमें गहन आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। डमरू की ध्वनि सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह ब्रह्मांड में गूँजते ॐ नाद का प्रतीक है। अग्नि विनाश और नये निर्माण की शक्ति का प्रतीक है। अभय मुद्रा बताती है कि भक्तों को किसी भी प्रकार से डरने की आवश्यकता नहीं है। अपस्मार दानव पर पैर अज्ञान और अहंकार पर विजय का प्रतीक है। उठा हुआ पैर मोक्ष और मुक्ति का मार्ग है।

महाशिवरात्रि का पर्व हर वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। यह दिन शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाशिवरात्रि की रात शिवजी ने तांडव नृत्य किया था। इसीलिए इस दिन नटराज स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि पर नटराज अवतार की कथा सुनने और उसका ध्यान करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।

नटराज की प्रतिमा केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखती, बल्कि यह ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) और विज्ञान के कई रहस्यों से भी जुड़ी है। डमरू का नाद ब्रह्मांडीय कंपन का प्रतीक है, जिसे आज वैज्ञानिक "Big Bang" कहते हैं। नृत्य की गति इलेक्ट्रॉनों और ग्रहों की गति जैसी है, जो लगातार चक्र में घूमते रहते हैं। अपस्मार दानव यह जड़ता (Inertia) और अज्ञान का प्रतीक है, जिसे तोड़े बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है। यही कारण है कि भारत सरकार ने परमाणु अनुसंधान केंद्र (CERN, स्विट्ज़रलैंड) में भी नटराज की विशाल प्रतिमा स्थापित की है।

नटराज अवतार की कथा कई जीवन-दर्शन सिखाती है। अहंकार का नाश चाहे ऋषि-मुनि ही क्यों न हों, ज्ञान और शक्ति पर घमंड विनाश का कारण बनता है। अज्ञान का अंत अपस्मार राक्षस की तरह अज्ञान जीवन में हर समस्या की जड़ है। शिव इसे पैरों तले कुचलकर बताते हैं कि ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है। संतुलन का संदेश शिव के नृत्य में सृष्टि का संतुलन छिपा है। सृजन और संहार दोनों का महत्व बराबर है। भक्ति का महत्व  अहंकारी को शिव दंडित करते हैं, लेकिन सच्चे भक्त को हमेशा अभयदान देते हैं।

तमिलनाडु का चिदंबरम नटराज मंदिर नटराज स्वरूप का सबसे प्रमुख तीर्थस्थान है। यहाँ भगवान शिव की प्रतिमा नटराज के रूप में स्थापित है। यहाँ हर साल विशेष उत्सव होता है जिसमें शिव के तांडव नृत्य का मंचन किया जाता है। इस मंदिर का दर्शन करने से माना जाता है कि भक्त के जीवन से अज्ञान दूर होता है। मंदिर में एक गुप्त "चिदंबर रहस्य" भी है, जिसमें खाली स्थान को शिव के निराकार स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।

नटराज अवतार ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और कला को गहराई से प्रभावित किया है। भरतनाट्यम, ओडिसी और कथकली जैसे नृत्यों में शिव के नटराज स्वरूप की झलक मिलती है। कलाकार नटराज की मुद्रा से प्रेरणा लेकर नए-नए रूप प्रस्तुत करते हैं। संगीत और नृत्य में शिव के नाद को "आदि नाद" माना जाता है।

आज की व्यस्त और भौतिक जीवनशैली में नटराज स्वरूप यह याद दिलाता है कि जीवन एक नृत्य की तरह है जिसमें संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। हर कठिनाई केवल परीक्षा है, जिसे ज्ञान और भक्ति से पार किया जा सकता है। अहंकार और अज्ञान को कुचलकर ही आत्मा सच्चे आनंद और मोक्ष की ओर बढ़ती है।

महादेव का नटराज अवतार केवल पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रहस्य है। यह अवतार बताता है कि सृष्टि का हर क्षण नृत्य की तरह गतिशील है। अहंकार और अज्ञान का अंत निश्चित है। भक्ति, ज्ञान और संतुलन से ही जीवन सार्थक होता है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर नटराज स्वरूप का ध्यान करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और आत्मा मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होती है।



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