चित्रगुप्त जी महाराज और वैश्य हित की अमर कथा

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय समाज में चित्रगुप्त जी महाराज का स्थान अनूठा है। वे धर्म, न्याय और लेखा-जोखा के देवता माने जाते हैं। वे केवल मृत्यु के बाद जीवों का लेखा-जोखा रखने वाले ही नहीं है, बल्कि जीवित अवस्था में भी धर्म, नीति और बुद्धि का मार्गदर्शन करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के नेता पवन जायसवाल द्वारा चित्रगुप्त जी महाराज के संबंध में की गई टिप्पणी ने कायस्थ समाज में रोष पैदा कर दिया है। ग्लोबल कायस्थ कॉन्फ्रेंस (जीकेसी) के नेताओं ने इसे भावनाओं को आहत करने वाला बताया और उनसे सार्वजनिक रूप से माफी माँगने की माँग की। यह प्रकरण यह सोचने पर विवश करता है कि चित्रगुप्त जी महाराज का समाज में योगदान कितना गहरा और व्यापक है। केवल कायस्थ ही नहीं, अपितु वैश्य समाज और संपूर्ण हिन्दू संस्कृति में उनका स्थान अपरिहार्य है।

चित्रगुप्त जी को यमराज का प्रधान सचिव और लेखाकार माना जाता है। उनका कार्य जीवों के पाप-पुण्य का लेखा रखना है। परंतु उनकी कथा केवल मृत्यु-लेखा तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में चित्रगुप्त जी को बुद्धि, न्याय और नीति का प्रतीक माना जाता है। उन्हें कायस्थों का कुलदेवता माना जाता है और देशभर में उनकी पूजा-आराधना बड़े उत्साह से की जाती है।

चित्रगुप्त जी निष्पक्ष और न्याय के पक्षधर हैं। वे सभी जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। वे सदैव जीवों को सही दिशा में सोचने की प्रेरणा देते हैं। कठिन समय में चित्रगुप्त जी का मार्गदर्शन व्यक्ति को संकट से उबार देता है।

बहुत समय पहले एक गाँव में एक वैश्य रहता था। वह दोनों आँखों से अंधा था, इसलिए उसे लोग सूरदास वैश्य कहते थे। गरीबी और लाचारी उसकी नियति बन चुकी थी। जीवन के दुख-दर्द से व्याकुल होकर वह किसी तरह चित्रगुप्त जी महाराज के पास पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाने लगा।

सूरदास वैश्य की पीड़ा देखकर चित्रगुप्त जी का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने उसे मार्गदर्शन दिया कि  “तुम भगवान शिव की आराधना करो। तप, जप और पूजा में लग जाओ। जब शिव तुमसे प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहें, तो उनसे तुरंत वरदान न माँगना। उनसे कहना कि वरदान मैं कल माँगूँगा।” सूरदास वैश्य ने वैसा ही किया।

जब भगवान शिव प्रसन्न होकर सूरदास वैश्य के सामने प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा, तो उसने चित्रगुप्त जी के कहे अनुसार कहा कि वह वरदान अगले दिन माँगेगा। अगले दिन जब वह चित्रगुप्त जी के पास पहुँचा, तो चित्रगुप्त जी ने उसे वरदान के लिए विशेष बुद्धि दी।

उन्होंने कहा कि  “भगवान शिव से कहना – ‘प्रभु, मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो सोने की कटोरी में दूध-भात मेरी गोद में बैठकर मुझे अपने हाथों से खिलाए और जिसे मैं अपनी आँखों से देख सकूँ।’”

सूरदास वैश्य ने चित्रगुप्त जी के बताए अनुसार ही वरदान माँगा। यह वरदान कई स्तरों पर महत्वपूर्ण था। पुत्र प्राप्ति – पुत्र की कामना करने से वैश्य का विवाह और परिवार बसना सुनिश्चित हुआ। धन की प्राप्ति – सोने की कटोरी का उल्लेख धनोपार्जन और समृद्धि का प्रतीक था। अच्छा भोजन – दूध-भात उत्तम भोजन और सुखी जीवन का प्रतीक बना। ममता और स्नेह – गोद में खिलाने की इच्छा ने पारिवारिक प्रेम और आनंद को दर्शाया। नेत्र ज्योति – पुत्र को देख पाने की शर्त ने अंधत्व दूर करने का आशीर्वाद सुनिश्चित किया।

भगवान शिव यह सुनकर अचंभित हो गए। उन्होंने पूछा – “तुम्हें इतनी गूढ़ बुद्धि किसने दी?” परंतु सूरदास वैश्य मौन रहा। तब शिव ने कहा: “जिसने तुम्हें यह बुद्धि दी है, वह अपने जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों में पड़ेगा, जहाँ उसे स्वयं बुद्धिहीन होकर दूसरों के सहयोग से समस्याओं का समाधान करना पड़ेगा।”

सूरदास वैश्य को पुत्र, धन, परिवार और नेत्र ज्योति सब प्राप्त हुए। उसका जीवन पूर्णतः बदल गया। आज भी वैश्य समाज इसका लाभ उठा रहे हैं। वहीं चित्रगुप्त जी की यह नीति और बुद्धिमत्ता इतिहास में अमर हो गई।

चित्रगुप्त जी ने दिखाया कि कठिन समय में दूसरों को सहयोग और मार्गदर्शन देना कितना आवश्यक है। वरदान केवल तत्कालिक लाभ के लिए नहीं माँगा जाना चाहिए, बल्कि उसमें दूरदर्शिता और जीवन की संपूर्णता का ध्यान होना चाहिए। जीवन में ज्ञान और बुद्धि सबसे बड़ा धन है। यही बुद्धि किसी भी विपत्ति को अवसर में बदल सकती है। सोने की कटोरी, भोजन, परिवार और नेत्र ज्योति, यह सब जीवन में केवल धन ही नहीं, बल्कि धर्म और स्नेह के संतुलन का प्रतीक है।

यह कथा विशेष रूप से वैश्य समाज के लिए प्रेरणादायी है। व्यापार, धन-संपत्ति और परिवार का महत्व वैश्य जीवन का आधार है। चित्रगुप्त जी ने जिस प्रकार एक गरीब अंधे वैश्य के जीवन में समृद्धि और आनंद का मार्ग प्रशस्त किया, उसने यह संदेश दिया कि धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलकर हर वर्ग सुख और समृद्धि पा सकता है।

आज जब राजनीतिक बयानों से समाज की भावनाएँ आहत होती हैं, तब यह कथा स्मरण कराती है कि चित्रगुप्त जी महाराज केवल कायस्थों के ही नहीं, अपितु हर वर्ग के हितैषी हैं। उनके कार्य और उनके मार्गदर्शन ने समाज के हर वर्ग,  विशेषकर वैश्य समाज, को उन्नति और समृद्धि की ओर प्रेरित किया है।

चित्रगुप्त जी महाराज की यह कथा केवल धार्मिक आस्था की बात नहीं करती, बल्कि जीवन के गहरे सत्यों को उजागर करती है। उन्होंने दिखाया कि बुद्धि, धर्म और सहयोग से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। एक अंधे, गरीब वैश्य का जीवन बदलकर उन्होंने यह संदेश दिया कि भगवान और धर्म केवल पूजने की वस्तु नहीं हैं, बल्कि जीवन में सही मार्गदर्शन और निर्णय लेने की प्रेरणा भी देते हैं।

आज के समय में जब समाज विभाजन, विवाद और राजनीति की आँधियों में उलझा हुआ है, तब चित्रगुप्त जी की यह कथा एकता, सहयोग और धर्म की ओर लौटने का संदेश देती है।



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