दशहरा पर होगा दीपोत्सव - पटना के एतवारपुर जगमगाएगा रोशनी से

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार की राजधानी पटना इस वर्ष दशहरा के अवसर पर एक अनोखा और भव्य आयोजन की गवाह बनने जा रहा है। दशहरा पर्व तो सदियों से बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता रहा है, लेकिन इस बार पटना के सिपारा स्थित एतवारपुर इलाके में इसे और भी खास बनाया जाएगा। यहाँ दशहरा के साथ-साथ दीपोत्सव भी मनाया जाएगा, जिससे पूरे क्षेत्र में एक दिव्य और अलौकिक वातावरण का सृजन होगा।

पूजा समिति के अध्यक्ष ने बताया है कि इस बार का पंडाल अयोध्या में बन रहे भव्य श्रीराम मंदिर की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है। इसका निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है और पंचमी तिथि तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। समिति का मानना है कि पंचमी तिथि को ही भगवान श्रीराम 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। इसी ऐतिहासिक प्रसंग को ध्यान में रखते हुए इस बार के पंडाल और दीपोत्सव की थीम तय की गई है।

आयोजन की सबसे खास बात यह है कि एतवारपुर इलाके के लगभग आठ हजार घरों में इस अवसर पर दीप जलाए जाएंगे। अनुमान है कि कुल मिलाकर दो लाख से ज्यादा दीप प्रज्ज्वलित होंगे, जिससे पूरा क्षेत्र दीपावली की तरह आलोकित दिखाई देगा। यह दृश्य न केवल स्थानीय लोगों के लिए अविस्मरणीय होगा, बल्कि दूर-दराज से आने वाले भक्तों और दर्शकों को भी आकर्षित करेगा।

दशहरा का पर्व रावण दहन और श्रीराम की विजय कथा का प्रतीक है, वहीं दीपोत्सव अयोध्या में श्रीराम के आगमन पर नगरवासियों द्वारा जलाए गए दीपों की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। पटना में इन दोनों पर्वों का संगम न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करेगा, बल्कि यह सांस्कृतिक एकता और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक बनेगा। इस आयोजन में सभी समुदायों के लोग उत्साहपूर्वक भाग लेंगे, जिससे सामाजिक सौहार्द और भाईचारा भी मजबूत होगा।

पूजा समिति और स्थानीय प्रशासन ने आयोजन को सफल बनाने के लिए विशेष व्यवस्था की है। बिजली, सुरक्षा, सफाई और यातायात प्रबंधन के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं। साथ ही, स्थानीय युवाओं और महिलाओं को भी दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया है।

पटना का यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि किस तरह परंपराओं को नए आयाम देकर समाज में उत्साह और ऊर्जा का संचार किया जा सकता है। दशहरा और दीपोत्सव का यह संगम न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक होगा, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति और मूल्यों से जोड़ने का भी माध्यम बनेगा। निश्चित ही इस वर्ष का दशहरा एतवारपुर के लिए इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो जाएगा।



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