केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सभी मंत्रालयों और विभागों में दिवाली तथा अन्य त्योहारों पर गिफ्ट देने की प्रथा पर रोक लगा दी है। यह आदेश वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग की सहमति से जारी किया गया है। सरकार का मानना है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग न्यायपूर्ण और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए, इसलिए उपहार जैसी परंपराओं को बंद करना समय की मांग है।
भारत में लंबे समय से त्योहारों के अवसर पर विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में गिफ्ट देने की परंपरा रही है। विशेषकर दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर मिठाइयाँ, सजावटी वस्तुएँ, इलेक्ट्रॉनिक सामान, ड्राई फ्रूट्स और अन्य गिफ्ट बास्केट्स वितरित किए जाते थे। हालांकि यह परंपरा एक उत्सव की तरह दिखती थी, लेकिन सरकारी खजाने पर इसका अतिरिक्त बोझ पड़ता था। लाखों-करोड़ों रुपये ऐसे खर्चों में चले जाते थे, जिनका सीधा लाभ जनता को नहीं मिल पाता था।
वित्त मंत्रालय का यह निर्णय न केवल वित्तीय अनुशासन स्थापित करने की ओर इशारा करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि सरकार अब उपहार संस्कृति के बजाय कार्य संस्कृति पर अधिक ध्यान देना चाहती है। जब जनता से करों के रूप में पैसा लिया जाता है तो उसका इस्तेमाल केवल आवश्यक विकास कार्यों और योजनाओं में होना चाहिए। उपहार वितरण जैसी परंपराएँ कहीं न कहीं इस जवाबदेही की भावना को कमजोर कर देती थी।
इससे पहले आर्थिक सलाहकार ने केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (CPSU) में भी गिफ्ट प्रथा को रोकने की सिफारिश की थी। उनका तर्क था कि ऐसे गिफ्ट्स न केवल अनावश्यक खर्च हैं बल्कि कभी-कभी पक्षपात और भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देता है। अब जब मंत्रालयों और विभागों में भी यह रोक लागू कर दी गई है तो यह स्पष्ट है कि सरकार इस दिशा में एक समग्र सुधार चाहती है।
त्योहारों पर गिफ्ट देने से अक्सर यह धारणा भी बनती थी कि उच्च पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों को विशेष सुविधाएँ मिल रही हैं। इससे निचले स्तर के कर्मचारी और आम जनता में असमानता की भावना पैदा होती थी। इस निर्णय से सरकार प्रशासनिक स्तर पर समानता और निष्पक्षता को प्रोत्साहित करना चाहती है।
इस निर्णय पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है। एक ओर इसे पारदर्शिता और बचत की दिशा में अच्छा कदम बताया जा रहा है, वहीं कुछ लोग इसे त्योहारों की खुशियों को सीमित करने वाला कदम मान रहा है। लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह आदेश जनता के हित में है, क्योंकि इससे बचाए गए धन का उपयोग सामाजिक योजनाओं और विकास कार्यों में किया जा सकेगा।
केंद्र सरकार का यह निर्णय केवल उपहारों पर रोक नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है कि जनता का धन जनता के लिए होना चाहिए। त्योहारों की खुशी उपहारों से नहीं बल्कि साफ-सुथरे प्रशासन और बेहतर नीतियों से बढ़ाई जा सकती है। आने वाले समय में यह कदम सरकारी खर्चों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक मजबूत आधार बनेगा।
