आभा सिन्हा, पटना
हिन्दू धर्म में शक्ति उपासना का विशेष महत्व है। देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के लिए शारदीय नवरात्र को एक महापर्व के रूप में मनाया जाता है। नवरात्र का हर दिन एक विशिष्ट देवी स्वरूप को समर्पित होता है। पांचवें दिन “मां स्कंदमाता” की पूजा का विधान है। “मां स्कंदमाता” संतान सुख प्रदान करने वाली, ज्ञान-विज्ञान की दात्री और भक्तों को मोक्ष तक पहुंचाने वाली मानी जाती हैं।
मां दुर्गा का पांचवा स्वरूप स्कंदमाता कहलाता है। वे भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय यानि स्कंद कुमार की माता हैं। मां का शरीर पूर्णतः शुभ्र (सफेद) है। वे कमल पुष्प पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इन्हें पद्मासना देवी भी कहते हैं। उनकी चार भुजाएं हैं, एक में पुत्र स्कंद को गोद में धारण करती हैं, दूसरी में कमल पुष्प, तीसरी वर मुद्रा और चौथी अभय मुद्रा। “मां स्कंदमाता” का वाहन सिंह है। उनका यह स्वरूप भक्तों को यह सिखाता है कि संसारिक मोह-माया में रहते हुए भी ईश्वर भक्ति और ज्ञान की साधना संभव है।
देवी दुर्गा को “स्कंदमाता” इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने स्कंद कुमार (कार्तिकेय) को जन्म दिया। कार्तिकेय देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने। इसी कारण से माता पार्वती को इस स्वरूप में "स्कंद की माता" यानि “स्कंदमाता” कहा गया है।
नवरात्र का पांचवा दिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त विशुद्धि चक्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह चक्र गले में स्थित होता है और ज्ञान, शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र है। इस दिन की पूजा से साधक को संतान सुख मिलता है। ज्ञान और विवेक की वृद्धि होती है। साधक का मन आध्यात्मिक तेज से आलोकित हो जाता है।
स्कंदमाता का प्रमुख मंत्र
ॐ स्कन्दमात्रै नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
संतान की प्राप्ति और उसकी दीर्घायु के लिए स्कंदमाताकी पूजा अत्यंत प्रभावी माना जाता है। ज्ञान और विवेक की वृद्धि होती है। घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। सांसारिक कष्टों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मान्यता है कि एक समय देवासुर नामक राक्षस ने वाराणसी में संतों और आम लोगों पर अत्याचार शुरू किया। तब “मां स्कंदमाता” ने उसका विनाश किया और काशी की रक्षा की। तभी से काशी में उनके स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।
कहा जाता है कि “मां स्कंदमाता” की कृपा से ही कवि कालिदास ने रघुवंशम और मेघदूत जैसे महाकाव्य रचे। उनका यह रूप विद्यावाहिनी देवी के रूप में भी पूजनीय है।
“मां स्कंदमाता” का स्वरूप गहरी आध्यात्मिक शिक्षा देता है। सिंह पर आरूढ़ होना, क्रोध और आवेग को नियंत्रित करने का प्रतीक है। पुत्र को गोद में धारण करना, सांसारिक मोह-माया के बीच भी ईश्वर भक्ति का मार्ग संभव होना। कमल पर विराजमान होना, पवित्रता, शांति और ज्ञान की अभिव्यक्ति है।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) जगतपुरा क्षेत्र के बागेश्वरी देवी मंदिर परिसर में “मां स्कंदमाता” का प्राचीन मंदिर है। काशी खंड और देवी पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि यह मंदिर काशी की रक्षा करता है।
विदिशा (मध्य प्रदेश) पुराना बस स्टैंड के पास सांकल कुआं के पास दुर्गाजी का मंदिर है। यहां 1998 से “स्कंदमाता” का विशेष पूजन होता है।
आज के समय में जब परिवार संतान सुख और मानसिक शांति की कामना करता है, “मां स्कंदमाता” की पूजा विशेष महत्व रखती है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति मां की पूजा से विशेष फल पाते हैं। विद्यार्थी ज्ञान और एकाग्रता के लिए माता की आराधना करते हैं। गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है।
नवरात्र का पांचवा दिन “मां स्कंदमाता” की पूजा के लिए समर्पित है। यह दिन भक्तों को संतान सुख, ज्ञान, शांति और मोक्ष का मार्ग प्रदान करता है। “मां स्कंदमाता” सिखाती हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी मोह-माया और कठिनाइयाँ क्यों न हो, यदि मन में ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास हो तो आध्यात्मिक साधना और जीवन की सफलता दोनों संभव हैं।
