आभा सिन्हा, पटना,
नवरात्र हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। नौ दिनों तक चलने वाला यह उत्सव शक्ति की उपासना का पर्व है, जिसमें भक्तगण माँ दुर्गा के नौ रूपों की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। घर-घर में कलश स्थापना, अखंड ज्योति, उपवास, भजन-कीर्तन और प्रतिमा या घट की पूजा का विशेष महत्व होता है। लेकिन आज के व्यस्त जीवन में एक प्रश्न अक्सर सामने आता है क्या नवरात्र के दौरान घर बंद करके कहीं बाहर जाना उचित है? कई लोग नौकरी, पढ़ाई, यात्रा या किसी अन्य कारण से घर खाली करने की स्थिति में आ जाते हैं। ऐसे में धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार क्या करना चाहिए?
नवरात्र केवल व्रत-उपवास या अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और दिव्य ऊर्जा को आमंत्रित करने का अवसर है। शास्त्रों में वर्णन है कि जब भक्त अपने घर में कलश स्थापना कर दुर्गा माँ का आह्वान करते हैं, तो मान्यता है कि इन नौ दिनों तक देवी माँ स्वयं घर में वास करती हैं।
जब देवी माँ का आगमन होता है तो घर का वातावरण दिव्य और ऊर्जावान हो जाता है। माना जाता है कि नवरात्र में पूजा करने से घर में नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। यदि घर में प्रतिमा या कलश स्थापित है तो यह देवी माँ के निवास का प्रतीक होता है। इसे अकेला छोड़ना अशुभ माना गया है।
धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो नवरात्र में घर पूरी तरह से बंद कर कहीं जाना उचित नहीं माना जाता है। जब भक्त देवी माँ को आमंत्रित करके उनकी प्रतिमा या कलश की स्थापना करते हैं, तो उन्हें अकेला छोड़ना पूजा आचार संहिता के विपरीत है। यदि अखंड ज्योति प्रज्वलित की गई है, तो उसे निरंतर जलते रहना चाहिए। घर खाली छोड़ने पर यह बाधित हो सकता है, जो अशुभ माना जाता है। परंपरा के अनुसार, प्रतिदिन प्रातः और सायं देवी की पूजा आवश्यक है। यदि घर में कोई नहीं है तो यह क्रम टूट जाता है।
नवरात्र में अखंड ज्योति का विशेष महत्व है। यह दीपक न केवल देवी माँ का प्रतीक है, बल्कि जीवन में अंधकार दूर कर ज्ञान और प्रकाश का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता है कि अखंड ज्योति बुझना अशुभ होता है। इसे जलाए रखने के लिए घर में किसी का होना जरूरी है। दीपक जलते समय सुरक्षा का भी ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि घर खाली छोड़ देने पर दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।
नवरात्र में पूजा स्थल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा स्थल की सफाई होनी चाहिए। देवी माँ को प्रतिदिन ताजे फूल, भोग और नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र आदि का पाठ नियमित होना चाहिए। यदि घर खाली हो और ये सब न हो पाए तो पूजा अधूरी मानी जाती है।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य और धर्मगुरु इस विषय पर एकमत हैं कि नवरात्र के दौरान घर पूरी तरह से बंद कर जाना उचित नहीं है। “नवरात्र में घर को अकेला छोड़ना उचित नहीं है। यदि कोई मजबूरी है तो बेहतर है कि प्रतिमा की स्थापना ही न करें।” यदि पूजा अधूरी रह जाए तो इसका फल नहीं मिलता और कभी-कभी विपरीत प्रभाव भी हो सकता है। घर के किसी सदस्य का रहना अनिवार्य माना गया है ताकि पूजा क्रम चलता रहे।
आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में कई बार यह संभव नहीं हो पाता है कि पूरा परिवार नवरात्र के दौरान घर पर रहे। नौकरी, पढ़ाई, विदेश यात्रा, या अन्य जिम्मेदारियाँ अक्सर आड़े आ जाती हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे, जिनमें हमेशा कोई न कोई घर पर रहता था। अब छोटे परिवार होने के कारण समस्या बढ़ गई है। युवा पीढ़ी अक्सर हॉस्टल या पीजी में रहते है, जहाँ पूजा स्थल को लगातार संभालना कठिन हो जाता है। व्यावसायिक कारणों से कई लोग नवरात्र के दौरान यात्रा करने को मजबूर होते हैं।
यदि मजबूरीवश घर खाली करना पड़े, तो कुछ उपाय अपनाया जा सकता है। यदि आप जानते हैं कि नवरात्र के दौरान घर खाली रहेगा, तो प्रतिमा की स्थापना न करें। केवल मानसिक पूजा और उपवास भी मान्य है। अखंड ज्योति तभी जलाएँ जब आप पूरे समय घर पर रहने में सक्षम हों। यदि पड़ोस में विश्वसनीय लोग हैं तो उनसे पूजा स्थल की देखभाल करने का अनुरोध किया जा सकता है। बड़े अनुष्ठान न करें, केवल साधारण पूजा करें ताकि नियमों का पालन करना आसान रहे। आजकल कई लोग नवरात्र में मंदिरों से लाइव दर्शन या ऑनलाइन पूजा सेवा लेते हैं। यह एक आधुनिक विकल्प है।
धार्मिक शास्त्रों में पूजा-पद्धति का उल्लेख अवश्य है, लेकिन साथ ही लचीलापन भी है। भगवान केवल आडंबर नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति को स्वीकार करते हैं। यदि आप परिस्थितिवश घर में पूजा न कर सकें, तो मन से की गई प्रार्थना भी स्वीकार होती है। माँ दुर्गा करुणामयी हैं। वे अपने भक्तों की विवशता को समझती हैं। दिखावे की बजाय सरल और सच्ची पूजा अधिक फलदायी होती है।
नवरात्र केवल व्यक्तिगत पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है। जब सभी मिलकर पूजा करते हैं, तो रिश्तों में प्रेम और सहयोग बढ़ता है। गाँव-गाँव में सामूहिक दुर्गा पूजा होती है, जहाँ व्यक्तिगत अनुपस्थिति से भी पूजा बाधित नहीं होती। घर में पूजा से बच्चों में धर्म और संस्कृति के प्रति सम्मान विकसित होता है।
