नवरात्र के चौथे दिन होती है “मां कूष्मांडा” की पूजा

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारतीय संस्कृति में नवरात्र का विशेष महत्व है। यह केवल धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, साधना, भक्ति और शक्ति का उत्सव है। नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है, जिनमें प्रत्येक रूप का अपना विशेष स्वरूप, महत्व और साधना-विधि है। नवरात्र का चौथा दिन “मां कूष्मांडा” को समर्पित होता है। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। “मां कूष्मांडा” को सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है। पुराणों के अनुसार जब चारों ओर अंधकार था और सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, तब “मां कूष्मांडा” ने अपनी दिव्य मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण इन्हें सृष्टि की प्रथम रचयिता कहा जाता है।

“मां कूष्मांडा” का स्वरूप अत्यंत दैदीप्यमान है। इनके आठ भुजाएँ हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी कहा जाता है। कमंडल तपस्या और त्याग का प्रतीक है। धनुष और बाण शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। कमल पुष्प शुद्धता और ज्ञान का प्रतीक है। अमृतपूर्ण कलश आरोग्य और अमरत्व का प्रतीक है। चक्र समय और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक है। गदा बल और साहस का प्रतीक है। जपमाला सिद्धियों और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। अभय मुद्रा भक्तों को निर्भयता और वरदान प्रदान करने वाली मुद्रा।

इनका वाहन सिंह है, जो साहस और पराक्रम का द्योतक है। मां का शरीर सूर्य के समान प्रकाशमान है और कहा जाता है कि सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता केवल इन्हीं में है।

पुराणों में वर्णन है कि जब सृष्टि का आरंभ नहीं हुआ था, जब चारों ओर केवल अंधकार और शून्य था, तब “मां कूष्मांडा” ने अपनी मंद मुस्कान से सृष्टि की उत्पत्ति की। ‘कूष्मांडा’ शब्द तीन भागों से बना है कु- छोटा, उष्मा- ऊर्जा या उष्णता, अंड- ब्रह्मांड, अर्थात् छोटा ब्रह्मांडीय अंड जिसे मां ने अपनी ऊर्जा से उत्पन्न किया। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा और आदिशक्ति कहा जाता है।

नवरात्र के चौथे दिन साधक का मन अनाहत चक्र में स्थित होता है। यह चक्र हृदय में स्थित है और इसे प्रेम, करुणा, शांति और संतुलन का केंद्र कहा जाता है। “मां कूष्मांडा” की पूजा के माध्यम से साधक अपने हृदय में शुद्ध भाव जागृत करता है और जीवन में सामंजस्य प्राप्त करता है।




“मां कूष्मांडा” की पूजा नवरात्र के चौथे दिन प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनकर की जाती है। पूजा में लाल या पीला फूल, कुम्हड़ा (विशेष प्रिय) रोली, अक्षत, सिंदूर, गंगाजल, धूप, दीप, नैवेद्य, मिठाई और फल शामिल है।


मूल मंत्र

ॐ कूष्माण्डायै नमः॥

ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥

स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्र में भक्तजन व्रत रखते हैं। केवल जल और दूध का सेवन श्रेष्ठ माना गया है। फलाहार पर रहना उत्तम है। कठिनाई होने पर संध्या के समय अरवा चावल, सेंधा नमक, चने की दाल, और घी से बनी सब्जी खाई जा सकती है। कागजी नींबू और गंगा जल का सेवन भी विशेष लाभकारी है।

“मां कूष्मांडा” रोग और शोक का नाश करती है। आयु, यश, बल, सुख और समृद्धि देती है। अल्प सेवा और भक्ति से ही मां प्रसन्न होकर कृपा करती हैं। जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और तेज की वृद्धि होती है। साधक के हृदय में स्थिरता और शांति आती है।

भारत के विभिन्न राज्यों में “मां कूष्मांडा” की पूजा विशेष रूप से होती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में कुम्हड़े का विशेष भोग लगाया जाता है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पंडालों में “मां कूष्मांडा” के स्वरूप की झलक मिलती है। मध्य भारत में भक्तजन मां की आराधना कर स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना करते हैं। ग्रामीण भारत में कुम्हड़े को शुभ फल माना जाता है और देवी को अर्पित किया जाता है।

“मां कूष्मांडा” केवल सृष्टि की रचयिता ही नहीं है बल्कि जीवन में प्रकाश और ऊर्जा की देवी हैं। इनकी पूजा से साधक को आत्मबल प्राप्त होता है। साधना से अनाहत चक्र जाग्रत होता है। साधक करुणा, प्रेम और सेवा भाव से परिपूर्ण होता है।

एक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों में युद्ध हुआ, तब मां कूष्मांडा ने अपने तेज से असुरों का नाश किया और देवताओं को विजयी बनाया। एक अन्य कथा में कहा गया है कि मां के तेज से ही सूर्य, चंद्र और ग्रहों की रचना हुई है।

आयुर्वेद में कुम्हड़े को पचने में आसान और रोग नाशक माना गया है। चूंकि यह मां को प्रिय है, इसलिए इसका सेवन शरीर को आरोग्य और मन को शांति प्रदान करता है।

“मां कूष्मांडा” सृष्टि की उत्पत्ति की प्रतीक हैं। इन्हें अष्टभुजा देवी और आदिशक्ति कहा जाता है। नवरात्र के चौथे दिन मां की पूजा करने से भक्त को आरोग्य, बल, तेज, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। मां की कृपा से साधक का जीवन सकारात्मकता से भर जाता है और उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।



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