आभा सिन्हा, पटना
नवरात्रि पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस आध्यात्मिक धारा का द्योतक है जिसमें शक्ति की उपासना को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का विधान है और प्रत्येक स्वरूप का अपना विशेष महत्व है। छठे दिन पूजित मां कात्यायनी” शक्ति, साहस, सौंदर्य और सिद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में “मां कात्यायनी” विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं। विवाह की इच्छा रखने वाली कन्याएं श्रद्धापूर्वक इनकी उपासना करती हैं और मनोवांछित वर की प्राप्ति करती हैं।
भारतीय धर्म और संस्कृति में नवरात्र का विशेष स्थान है। वर्ष में दो बार चैत्र और आश्विन माह में नवरात्रि का पर्व आता है। शारदीय नवरात्र को विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि यह दुर्गा पूजा के रूप में पूरे भारतवर्ष में धूमधाम से मनाया जाता है।
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना होती है। ये स्वरूप हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा
कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। छठे दिन पूजित “मां कात्यायनी” का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि वे शक्ति की प्रतीक होने के साथ-साथ विवाह और वैवाहिक जीवन की संरक्षिका मानी जाती हैं।
स्कंद पुराण के अनुसार, स्कंद पुराण में उल्लेख है कि “मां कात्यायनी” की उत्पत्ति परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से हुई थी। जब देवता महिषासुर के अत्याचारों से व्याकुल हो उठे, तब भगवान शिव, विष्णु और अन्य देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का संचार किया। इस संयुक्त ऊर्जा से एक दैदीप्यमान स्वरूप प्रकट हुआ। यह स्वरूप था “मां कात्यायनी”।
वामन पुराण के अनुसार, वामन पुराण में कथा थोड़ी भिन्न है। देवताओं ने अपनी शक्तियों का संचय कात्यायन ऋषि के आश्रम में किया। ऋषि ने उन शक्तियों को एक रूप दिया और वह रूप ‘देवी कात्यायनी’ कहलाया। चूंकि ऋषि कात्यायन ने इन्हें जन्म दिया था, इसलिए इन्हें "कात्यायनी" कहा गया।
देवी भागवत पुराण में यह वर्णन मिलता है कि जब देवताओं ने मिलकर महिषासुर के संहार के लिए सामूहिक संकल्प लिया, तभी “कात्यायनी देवी” का आविर्भाव हुआ। हजारों सूर्यों के समान उनका तेज इतना प्रखर था कि असुरों की शक्ति क्षीण हो गई।
ब्रज की गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना तट पर “मां कात्यायनी” की पूजा की थी। इस कारण “मां कात्यायनी” को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है।
“मां कात्यायनी” का प्रमुख परिचय महिषासुरमर्दिनी के रूप में मिलता है। महिषासुर, जो कि असुरों का अत्याचारी राजा था, देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर बैठा था। उसकी शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। परेशान देवता त्रिमूर्ति के पास पहुंचे। विष्णु, शिव और ब्रह्मा समेत अन्य देवताओं ने अपने तेज का अंश दिया। इस तेजपुंज से “मां कात्यायनी” प्रकट हुईं। देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र उन्हें भेंट किए। सिंह पर आरूढ़ होकर “मां कात्यायनी” ने महिषासुर से युद्ध किया। युद्ध कई दिनों तक चला। अंत में देवी ने महिषासुर को बैल रूप में परास्त किया और तलवार से उसका वध किया। तभी से वह महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।
“मां कात्यायनी” का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और भव्य बताया गया है। इनके चार भुजाएं हैं। दाहिने हाथ में ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला वर मुद्रा में। बाएं हाथ में ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प। इनका वाहन सिंह है, जो साहस और पराक्रम का प्रतीक है। देवी का रंग स्वर्ण जैसा चमकीला है और उनका आभामंडल असुरों का नाश करने में समर्थ है।
अमरकोष में पार्वती को ही “कात्यायनी” कहा गया है। संस्कृत ग्रंथों में उन्हें उमा, गौरी, काली, हेमवती और ईश्वरी भी कहा गया है।
देवी महात्म्य, जो शक्तिवाद का प्रमुख ग्रंथ है, उसमें “मां कात्यायनी” का महिमा वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें उनका महिषासुर वध प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
कालिका पुराण (10वीं शताब्दी) में उड़ीसा क्षेत्र में “देवी कात्यायनी” और भगवान जगन्नाथ की उपासना का उल्लेख है।
बौद्ध और जैन साहित्य में भी “मां कात्यायनी” का उल्लेख मिलता है। यहां उन्हें शक्ति, करुणा और ज्ञान की देवी के रूप में स्वीकार किया गया है।
योग दर्शन के अनुसार, नवरात्रि के छठे दिन साधक का मन "आज्ञा चक्र" में स्थित होता है। यह चक्र भौंहों के मध्य स्थित है और ज्ञान एव शक्ति का केंद्र माना जाता है। “मां कात्यायनी” की उपासना से आज्ञा चक्र जागृत होता है। साधक को आत्मज्ञान और दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। भक्त “मां कात्यायनी” के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
कन्याओं के लिए “मां कात्यायनी” की उपासना विशेष फलदायी मानी गई है। जिन कन्याओं का विवाह बाधित हो या विलंबित हो रहा हो, वे नवरात्रि में “मां कात्यायनी” की श्रद्धापूर्वक पूजा करती हैं।
विवाह के लिए मां कात्यायनी मंत्र
ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥
इस मंत्र का नवरात्र के दिनों में नियमित जप करने से इच्छित वर की प्राप्ति होती है।
“मां कात्यायनी” की भक्ति से विवाह में आ रही बाधाओं का नाश। रोग, शोक और भय का नाश। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति। शत्रुओं का विनाश और साहस में वृद्धि। आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
ब्रज की गोपियों ने यमुना तट पर “मां कात्यायनी” की उपासना की थी ताकि उन्हें भगवान श्रीकृष्ण पति रूप में प्राप्त हो। तभी से ब्रजवासियों में यह मान्यता बनी है कि “मां कात्यायनी” ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं। आज भी वृंदावन और मथुरा में नवरात्र के दौरान “मां कात्यायनी” की पूजा विशेष श्रद्धा से की जाती है।
आज की भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवनशैली में “मां कात्यायनी” की उपासना न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि मानसिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विवाह योग्य युवतियां आत्मविश्वास और आशा पाती हैं। विवाहित महिलाएं पारिवारिक सुख और संतोष अनुभव करती हैं। साधक शक्ति और साहस का संचार पाता है। समाज में स्त्री शक्ति के महत्व को स्थापित करने में देवी कात्यायनी का स्वरूप प्रेरणा देता है।
“मां कात्यायनी” शक्ति, सौंदर्य, करुणा और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी हैं। नवरात्रि के छठे दिन इनकी पूजा से साधक को अद्भुत शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त होता है। ब्रज की गोपियों की तरह आज भी विवाह की इच्छा रखने वाली कन्याएं इनकी आराधना करती हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य प्राप्त करती हैं।
