राजनीति मानव सभ्यता के आरंभ से ही समाज का अभिन्न हिस्सा रही है। यह कभी घर-परिवार के विवाद सुलझाने का साधन बनी, तो कभी राष्ट्रों के बीच शक्ति संतुलन का खेल। चाहे राजनीति घर की दहलीज में लिपटी हो या फिर संयुक्त राष्ट्र के मंच पर राष्ट्रीय झंडों के बीच अपना प्रदर्शन कर रही हो, इसकी बुनियादी प्रकृति समान ही रहती है सोच, नीयत और कृत एक ही धागे से बंधे होते हैं। आज राजनीति को विभिन्न रूपों में देखते हैं, अमेरिका के चुनावी खेल से लेकर भारत की सियासत तक, सुप्रीम कोर्ट की दलीलों से लेकर गांव-गांव में पनपती खेमेबाजी तक। राजनीति का यह रंगमंच इतना व्यापक है कि हर आमजन कहीं न कहीं इसका हिस्सा बन जाता है।
राजनीति केवल संसद की बहस या चुनावी रैली तक सीमित नहीं है। यह घर के भीतर, मोहल्ले में, कार्यालयों में, और यहां तक कि मित्र मंडली में भी मौजूद रहती है। घर के बड़े-बुजुर्ग जब यह तय करते हैं कि किसका निर्णय अंतिम होगा, वहां भी राजनीति है। मोहल्ले की किसी समिति में अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान होती है, तो वह भी राजनीति का हिस्सा है।
संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर जब महाशक्तियां अपने-अपने हित साधने में जुटी रहती हैं, तब यह राजनीति वैश्विक हो जाती है। लेकिन मूल तत्व वही रहता है हितों की रक्षा, सत्ता की पकड़, और प्रभाव का विस्तार।
अमेरिका में हाल ही में हुई घटनाएं यह बताती हैं कि वहां की राजनीति भी संवेदनाओं और रणनीतियों पर आधारित है। किसी भारतीय की मृत्यु पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आँसू बहाते हुए मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन को दोषी ठहराया। यह शोकाभिव्यक्ति जितनी भावनात्मक दिखी, उतनी ही यह राजनीतिक हथियार भी थी।
यहां प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच यह रुदन सच्चा था या मात्र राजनीतिक चाल? क्योंकि चुनावी मौसम में हर नेता अपने वोट बैंक को साधने के लिए भावनाओं का सहारा लेता है। भारतीय समुदाय अमेरिका में तेजी से बढ़ रहा है और उसका राजनीतिक प्रभाव भी गहराता जा रहा है। ऐसे में उनकी भावनाओं को साधना किसी भी उम्मीदवार के लिए रणनीतिक कदम है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की राजनीति बहुरंगी और बहुस्तरीय है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क पर खड़े आम नागरिक तक, हर जगह राजनीतिक बहसें और तकरारें मौजूद हैं।
वोट चोरी और वक्फ बिल जैसे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष की दलीलें यह साबित करती हैं कि न्यायपालिका भी राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। राजनीतिक दल अदालतों में अपनी लड़ाई लड़ते हैं और आम जनता इस सबका दर्शक बन जाती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्णिया की रैली से लालू यादव और राहुल गांधी पर तीखे तीर छोड़े। यह तीर केवल विपक्ष पर नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में मौजूद समीकरणों पर भी निशाना साध रहा था। बिहार की राजनीति जातीय और पारिवारिक समीकरणों पर आधारित रही है, और नरेन्द्र मोदी का यह बयान इन समीकरणों को हिलाने की कोशिश थी।
लालू प्रसाद, जिन्हें सजा याफ्ता होने के बाद भी राजनीति से अलग करना संभव नहीं हुआ, अक्सर खुद को हरिश्चंद्र की तरह ईमानदार साबित करने की कोशिश करते हैं। उनके भाषणों में नैतिकता की दुहाई होती है, लेकिन जनता जानती है कि हकीकत क्या है। यही राजनीति का विरोधाभास है, जहां शब्द और कर्म में अंतर अक्सर साफ दिखाई देता है।
बिहार की राजनीति को समझना मानो सत्ता के शतरंज को समझना है। यहां दल टूटते हैं, फिर जुड़ते हैं। चुनाव के पहले अंतर्कलह इतनी गहराती है कि पुराने साथी दुश्मन बन जाते हैं और दुश्मन साथी।
बिहार में यह परंपरा रही है कि हर बड़ी पार्टी के भीतर एक और पार्टी आकार ले लेती है। नेताओं की महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल होती हैं कि वे अलग होकर नया दल बना लेते हैं। यहां राजनीति में कोई किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। आस्तीन में छुपे सांप की तरह, सहयोगी ही सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं। बिहार के नेताओं की जुबान पर शहद टपकता है, वे जनता के लिए मधुर वचन बोलते हैं, लेकिन मन में सत्ता की कटार छुपाए रहते हैं। चुनाव खत्म होते ही यह असली चेहरा सामने आ जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरी राजनीति में आमजन महज प्यादा बनकर रह जाता है। जैसे शतरंज में प्यादे को आगे बढ़ाकर राजा-रानी अपनी जीत सुनिश्चित करते हैं, वैसे ही राजनीतिक दल जनता को नारों, वादों और घोषणाओं के जरिए आगे कर देते हैं। जनता वोट डालती है, रैलियों में शामिल होती है, पोस्टर लगाती है, लेकिन सत्ता मिलने के बाद वही जनता भुला दी जाती है। यही कारण है कि लोग अक्सर राजनीति से मोहभंग महसूस करते हैं, फिर भी चुनाव आते ही वही लोग उम्मीद के साथ मतदान केंद्रों पर कतार में खड़े हो जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब विश्व नेता भाषण देते हैं, तब भी यह राजनीति का ही विस्तार होता है। वहां गरीबी, जलवायु परिवर्तन और युद्ध जैसे मुद्दों पर बातें होती हैं, लेकिन हर देश अपने राष्ट्रीय हित साधने की कोशिश करता है। भारत जब वैश्विक मंच पर आतंकवाद या सुरक्षा परिषद सुधार की बात करता है, तो यह उसकी राजनीति है। अमेरिका जब लोकतंत्र और मानवाधिकार की दुहाई देता है, तो उसके पीछे भी अपने भू-राजनीतिक हित छुपे होते हैं। चीन, रूस, यूरोपीय संघ सभी अपने-अपने हितों की रक्षा में लगे रहते हैं।
आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट है नैतिकता का ह्रास। शब्दों और कार्यों में इतना अंतर हो गया है कि जनता का विश्वास डगमगाने लगा है। सजायाफ्ता नेता खुद को हरिश्चंद्र बताते हैं, सत्ता पक्ष खुद को जनता का सेवक कहता है, जबकि असल में लक्ष्य सत्ता और धन ही होता है।
राजनीति की यह विडंबना जनता को भ्रमित करता है। एक ओर नेता विकास और पारदर्शिता की बातें करते हैं, दूसरी ओर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद बढ़ाते हैं। यही कारण है कि आज राजनीति आमजन के लिए अविश्वसनीय होता जा रहा है।
राजनीति केवल नेताओं का खेल नहीं है। यह जीवन का हिस्सा है और निर्णयों को प्रभावित करता है। लेकिन दुख की बात है कि जनता इसमें प्यादे बनकर रह गए हैं।
चाहे अमेरिका में ट्रम्प और बाइडेन का संघर्ष हो, भारत में सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष की दलीलें हों, या बिहार में लालू, नीतीश और मोदी की राजनीति, हर जगह जनता को मोहरा बनाकर खेला जा रहा है।
राजनीति को बदलने का असली अधिकार जनता के पास है। यदि जनता सजग हो जाए, प्रश्न पूछे, और केवल जाति-धर्म या वादों पर नहीं, बल्कि काम और नीयत पर वोट डाले, तभी राजनीति की दिशा बदल सकता है।
