बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मुहाने पर खड़ी है, जहां से भविष्य की दिशा तय होगी। 2025 का विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि नीतीश कुमार के दो दशकों के 'सुशासन' के दावों और जनता की आकांक्षाओं के बीच का संवाद होगा। यह एक ऐसा चुनाव होगा, जहां अतीत के कार्यों का लेखा-जोखा भविष्य के वादों पर भारी पड़ेगा। इस चुनावी महासमर में नीतीश कुमार और उनके सहयोगी दल, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर, जनता के सामने उन उपलब्धियों को रखने की तैयारी में हैं, जिन्होंने पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय में बिहार की तस्वीर और तकदीर को बदलने का काम किया है।
यह कहानी है उस बिहार की, जो कभी सड़कों में गड्ढों या गड्ढों में सड़कों के लिए जाना जाता था। यह कहानी है उस प्रदेश की, जहां शाम ढलते ही बेटियां घरों में कैद हो जाती थी। यह कहानी है उस राज्य की, जहां विकास की धारा कुछ गिने-चुने शहरों तक सिमटी हुई थी। नीतीश कुमार की सरकार इन कहानियों को बदलने का दावा करती है। उनका चुनावी अभियान सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का पुलिंदा नहीं होगा, बल्कि यह एक भावनात्मक अपील होगा 'वापसी का भरोसा' दिलाने की, 'फिर से विकास की रेलगाड़ी' को गति देने की। यह इस बात पर केंद्रित होगा कि कैसे एक बीमारू राज्य की छवि से निकलकर बिहार आज देश की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की राह पर अग्रसर है।
किसी भी राज्य के विकास की पहली शर्त उसकी उन्नत कनेक्टिविटी होती है। सड़कें महज रास्ते नहीं, बल्कि प्रगति की वे धमनियां होती है, जो गांवों को शहरों से, खेतों को बाजारों से और लोगों को अवसरों से जोड़ती हैं। नीतीश कुमार ने जब 2005 में बिहार की बागडोर संभाली थी, तो प्रदेश की सड़कें जर्जर अवस्था में थी। राजधानी पटना से राज्य के किसी भी कोने में पहुंचने में 10 से 12 घंटे लगना आम बात थी। आज सरकार का दावा है कि राज्य के किसी भी कोने से 5-6 घंटे में पटना पहुंचा जा सकता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति और अथक प्रयासों का परिणाम है।
नीतीश सरकार ने सत्ता में आते ही सड़क निर्माण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा। पिछले करीब 20 वर्षों में बिहार के सड़क नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। आंकड़ों पर गौर करें तो 2005 से 2025 के बीच सड़कों की लंबाई दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है।
सरकार ने न केवल नई सड़कें बनाईं है, बल्कि मौजूदा सड़कों का चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण भी किया है। राजकीय उच्च पथों की लंबाई 2,382 किलोमीटर से बढ़कर 3,638 किलोमीटर हो गई है। राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास में भी केंद्र सरकार के सहयोग से तेजी आई है।
'मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना' और 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' के तहत दूर-दराज के गांवों और टोलों को पक्की सड़कों से जोड़ा गया है। मार्च 2025 तक 1,360 किलोमीटर और 2026 तक 8,283 किलोमीटर नई ग्रामीण सड़कों के निर्माण का लक्ष्य है। पिछले 10 वर्षों में ही लगभग 55,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई गति प्रदान की है।
कनेक्टिविटी के लिए पुलों का महत्व भी सर्वोपरि है। बिहार सरकार ने गंगा, कोसी, गंडक जैसी बड़ी नदियों पर कई महासेतुओं का निर्माण कर उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच की दूरी को पाट दिया है। छोटे-बड़े हजारों पुल-पुलियों ने आवागमन को सुगम बनाया है।
बिहार अब एक्सप्रेसवे के युग में प्रवेश कर रहा है, जो राज्य की आर्थिक प्रगति को नए पंख लगाएगा। कई महत्वाकांक्षी एक्सप्रेसवे परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं या प्रस्तावित हैं, जो बिहार को पूर्वी भारत का एक प्रमुख लॉजिस्टिक हब बनाने की क्षमता रखता है।
रक्सौल-हल्दिया एक्सप्रेसवे (408 किमी) उत्तर बिहार को सीधे हल्दिया बंदरगाह से जोड़ेगा, जिससे आयात-निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे (417 किमी) बिहार के उत्तरी जिलों से होकर गुजरेगा, जिससे पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी। पटना-पूर्णिया एक्सप्रेसवे (250 किमी) राजधानी को सीमांचल के इलाके से जोड़ेगा। बक्सर-भागलपुर एक्सप्रेसवे (300 किमी) बिहार के दो प्रमुख शहरों को जोड़ेगा और गंगा के किनारे एक नया विकास गलियारा बनाएगा। वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे (161 किमी) का एक बड़ा हिस्सा बिहार से होकर गुजरेगा, जो राज्य को देश के दो प्रमुख आर्थिक केंद्रों से सीधे जोड़ेगा।
यह सिर्फ सड़कों का जाल नहीं है, बल्कि यह विकास का वह ताना-बाना है जो किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाएगा, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा और बिहार के समग्र विकास को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। 2025 के चुनाव में नीतीश कुमार इन सड़कों को 'विकास के पथ' के रूप में पेश करेंगे, जिस पर चलकर बिहार समृद्धि की मंजिल तक पहुंचेगा।
नीतीश कुमार की राजनीतिक विचारधारा का एक केंद्रीय तत्व हमेशा से महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समावेशन रहा है। उन्होंने बार-बार यह कहा है कि जब तक महिलाएं और समाज के वंचित वर्ग का विकास नहीं होगा, तब तक राज्य का समग्र विकास संभव नहीं है। उनके कार्यकाल में उठाए गए कदमों ने न केवल महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत किया है, बल्कि उनमें एक नया आत्मविश्वास भी पैदा किया है।
नीतीश कुमार के सबसे क्रांतिकारी फैसलों में से एक पंचायती राज संस्थाओं (2006) और नगर निकाय चुनावों (2007) में महिलाओं को 50% आरक्षण देना था। इस एक कदम ने बिहार की हजारों महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व की मुख्यधारा में ला खड़ा किया है। इसके बाद 2016 में सभी सरकारी सेवाओं में महिलाओं को 35% आरक्षण दिया गया, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का मार्ग प्रशस्त किया।
विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की गई 'जीविका' योजना आज महिला सशक्तीकरण का पर्याय बन चुकी है। 11 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 1.40 करोड़ से अधिक 'जीविका दीदियां' जुड़ी हुई हैं। इन समूहों ने न केवल महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा है, बल्कि सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाह, दहेज प्रथा और शराबबंदी के खिलाफ एक मजबूत आवाज भी बुलंद की है।
सरकार ने 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' का ऐलान किया है। इस योजना के तहत, हर परिवार की एक महिला को उनकी पसंद का रोजगार शुरू करने के लिए पहली किस्त के रूप में ₹10,000 की आर्थिक सहायता दी जा रही है। छह महीने के प्रदर्शन के आधार पर बाद में ₹2 लाख तक की अतिरिक्त मदद का भी प्रावधान है। यह योजना सीधे तौर पर महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और उद्यमिता को बढ़ावा देने का एक बड़ा माध्यम बनेगी।
सरकार ने आंगनवाड़ी सेविकाओं का मानदेय ₹7,000 से बढ़ाकर ₹9,000 और सहायिकाओं का मानदेय ₹4,000 से बढ़ाकर ₹4,500 करने का निर्णय लिया है। इससे राज्य की 2.10 लाख से अधिक आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को सीधा लाभ मिलेगा, जो जमीनी स्तर पर महिला एवं बाल पोषण की रीढ़ हैं।
नीतीश कुमार की सरकार ने 'न्याय के साथ विकास' के अपने नारे को चरितार्थ करने का प्रयास किया है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अति पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं। छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावासों का निर्माण और उद्यमिता के लिए विशेष योजनाओं ने इन वर्गों को समाज की मुख्यधारा में शामिल होने में मदद की है।
2025 के चुनाव में, नीतीश कुमार इन उपलब्धियों को केवल योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि 'बदलते बिहार में महिलाओं और वंचितों के बढ़ते स्वाभिमान' की कहानी के रूप में पेश करेंगे। यह एक भावनात्मक अपील होगी कि जिस सरकार ने आधी आबादी को सम्मान और अवसर दिया, उसे एक बार फिर सेवा का मौका मिलना चाहिए।
विकास का पैमाना केवल राजमार्गों और बड़ी योजनाओं से ही नहीं, बल्कि शहरों की स्वच्छता और गांवों की आत्मनिर्भरता से भी मापा जाता है। नीतीश सरकार ने शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास पर समान रूप से ध्यान केंद्रित करने का दावा किया है। उनका तर्क है कि जब तक गांव और शहर कंधे से कंधा मिलाकर विकास नहीं करेंगे, तब तक एक 'विकसित बिहार' का सपना साकार नहीं हो सकता।
स्मार्ट सिटी मिशन और अन्य शहरी विकास योजनाओं के तहत बिहार के शहरों की तस्वीर बदल रही है। पटना, गया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में फ्लाईओवर, एलिवेटेड रोड, और नए संपर्क मार्गों का निर्माण किया जा रहा है। हाल ही में पटना में 355 करोड़ रुपये से अधिक की तीन सड़क परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया, जिससे ट्रैफिक जाम से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
शहरों में कूड़ा प्रबंधन, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और पार्कों के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है। 'नमामि गंगे' परियोजना के तहत गंगा किनारे के शहरों में घाटों का जीर्णोद्धार और रिवरफ्रंट का विकास किया गया है।
सरकार ने हर जिला की जरूरतों के अनुसार, विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी है। उदाहरण के लिए, हाल ही में सीवान जिले में लगभग 558 करोड़ रुपये की नौ विकास परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया। इनमें ग्रिड सबस्टेशन, रेल ओवरब्रिज और सड़कों का चौड़ीकरण शामिल है। इसी तरह गया में पर्यटन और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं।
सरकार का मानना है कि बिहार की आत्मा गांवों में बसती है। इसलिए ग्रामीण विकास हमेशा से उनकी प्राथमिकता में रहा है। 'सात निश्चय' कार्यक्रम के तहत 'हर घर नल का जल' योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित की है। यह न केवल एक सुविधा है, बल्कि इसने महिलाओं को दूर-दराज से पानी लाने के श्रम से भी मुक्ति दिलाई है और जल-जनित बीमारियों में कमी लाई है। इस योजना के तहत गांवों की गलियों को पक्का किया गया है और नालियों का निर्माण किया गया है, जिससे गांवों में स्वच्छता का स्तर बेहतर हुआ है और बरसात के दिनों में होने वाली कीचड़ की समस्या से निजात मिली है।
केंद्र सरकार के सहयोग से 'प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत बिहार में 57 लाख से अधिक पक्के घर बनाए गए हैं, जिससे लाखों गरीब परिवारों का अपने घर का सपना साकार हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में 45,000 से अधिक कॉमन सर्विस सेंटर खोले गए हैं, जो ग्रामीणों को डिजिटल सेवाएं और सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच प्रदान कर रहे हैं।
2025 के चुनाव में, जदयू-भाजपा गठबंधन शहरी और ग्रामीण विकास की इन दोहरी उपलब्धियों को जनता के सामने रखेगा। यह संदेश देने का प्रयास होगा कि उनकी सरकार 'सर्वसमावेशी विकास' में विश्वास रखती है, जहां शहर की चमक भी हो और गांव की मजबूती भी।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती है। नीतीश कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 'जल-जीवन-हरियाली' जैसी दूरदर्शी योजना की शुरुआत की। यह अभियान सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से बिहार के भविष्य को सुरक्षित करने का एक संकल्प है। 2 अक्टूबर 2019 को शुरू किया गया यह अभियान जल संरक्षण और पर्यावरण सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके 11 प्रमुख घटक हैं, जिनमें तालाबों, पोखरों और कुओं का जीर्णोद्धार, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, सोख्ता निर्माण, पौधारोपण और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना शामिल है। इस योजना के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने तीन वर्षों में इस पर 24,524 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा। 2025-26 के लिए 528.87 करोड़ रुपये आवंटित किया गया है। अभियान के तहत बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया गया है। चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-28) के तहत 20 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य है। 2024-25 में ही 4.14 करोड़ से अधिक पौधा लगाया जा चुका है। सार्वजनिक जल संचयन संरचनाओं को अतिक्रमण से मुक्त कराना और उनका जीर्णोद्धार करना इस मिशन की प्राथमिकता है। इससे भूजल स्तर को रिचार्ज करने और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है।
यह नीतीश सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी और अनूठी परियोजनाओं में से एक है। 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान के तहत, मानसून के दौरान गंगा नदी के अतिरिक्त पानी को लिफ्ट कर पाइपलाइन के माध्यम से दक्षिण बिहार के जल-संकट वाले शहरों - राजगीर, गया और बोधगया तक पहुंचाया जा रहा है। इस शोधित जल को पेयजल के रूप में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 135 लीटर की दर से आपूर्ति की जा रही है। 2023 में इस योजना का विस्तार नवादा तक किया गया है। यह इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है और यह दर्शाता है कि सरकार बिहार की भौगोलिक चुनौतियों का समाधान करने के लिए कितनी प्रतिबद्ध है।
2025 के चुनाव में, इस अभियान को नीतीश कुमार की 'दूरदृष्टि' और 'भविष्य की चिंता' के प्रतीक के रूप में पेश किया जाएगा। यह बताया जाएगा कि कैसे उनकी सरकार न केवल आज की जरूरतों को पूरा कर रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरा-भरा और जल-समृद्ध बिहार बनाने की नींव भी रख रही है।
बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट 'डबल इंजन' की सरकार का टैग है। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का तालमेल, विकास परियोजनाओं को गति देने में एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ है। 2025 के चुनाव में यह गठबंधन इस 'डबल इंजन' की ताकत को अपनी सबसे बड़ी यूएसपी के रूप में पेश करेगा।
केंद्र-राज्य सहयोग की मिसाल बिहार में चल रही अधिकांश बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, चाहे वो एक्सप्रेसवे हो, नए पुल हो या रेल लाइनें, केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयास का परिणाम है। हाल ही में केंद्रीय सड़क और बुनियादी ढांचा कोष से बिहार के आठ जिलों में दस सड़कों के लिए 675 करोड़ रुपये की मंजूरी इसका ताजा उदाहरण है। प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार को कई नई ट्रेनों की सौगात दी है, जिसमें अमृत भारत एक्सप्रेस और नमो भारत रैपिड ट्रेन शामिल हैं। नई रेल लाइनों और ओवरब्रिजों के उद्घाटन ने राज्य में यातायात को सुगम बनाया है। 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' के तहत कोसी-मेची अंत:राज्यीय लिंक परियोजना को मंजूरी दी गई है। 6,282 करोड़ रुपये की इस परियोजना से सीमांचल के चार जिलों (अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार) में 2.10 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा मिलेगी। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान निधि जैसी केंद्रीय योजनाओं को बिहार में प्रभावी ढंग से लागू करने का श्रेय राज्य सरकार को दिया जाएगा। यह दिखाया जाएगा कि कैसे दोनों सरकारों के मिलकर काम करने से योजनाओं का लाभ सीधे गरीबों और जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है।
चुनावी अभियान का मुख्य संदेश यह होगा कि 'डबल इंजन' की सरकार बिहार के विकास को डबल रफ्तार दे रही है। यह तर्क दिया जाएगा कि जब केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होती है, तो योजनाओं को मंजूरी मिलने में और उनके लिए फंड जारी होने में कोई देरी नहीं होती है। यह बिहार की जनता के लिए एक स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करेगा।
