नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह नौ दिनों के दुर्गा पूजा-अर्चना की शुरुआत होती है। घटस्थापना से पहले व्यक्ति स्नान करे, व्रत हेतु संकल्प ले और पूजा स्थल की सफाई सुनिश्चित हो। पंचांग अनुसार इस वर्ष घटस्थापना के लिए दो मुहूर्त विशेष रूप से शुभ हैं — लगभग सुबह 6:09 बजे से 8:06 बजे तक, और अभिजीत मुहूर्त में 11:49 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक।
पूजा सामग्री में शामिल हैं: एक सुंदर कलश, गंगाजल, साफ ज़वा या अनाज (जौ), सुपारी, रोली, मौली, जटा वाला नारियल, आम या अशोक के पत्ते, मिट्टी का बर्तन, मंदिर आदि पवित्र स्थान की मिट्टी, अखंड ज्योति के लिए बड़ा दिया व रुई की बाती, लाल सूत्र, सिक्का, लाल कपड़ा, फूल और फूलों की माला, इलायची, लौंग, कपूर, अक्षत, हल्दी आदि।
विधि इस प्रकार है कि: प्रातः स्नान कर लेने के बाद पूजा स्थान उत्तर या पूर्व दिशा की ओर facing हो, वहाँ कलश स्थपित करें। कलश में गंगाजल भरें, उसके अंदर अनाज या ज़वा डालें, सिक्का व लाल कपड़ा रखें। नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर कलश के ऊपर रखें। कलश के चारों ओर फूल, अक्षत, हल्दी आदि अर्पित करें। दीप, धूप, कपूर से पूजन करें। दुर्गा माता को मनचाहा भोग चढ़ाएँ। पूजन के बाद माता की आरती करें और व्रत कथा या देवी चालीसा का पाठ करें।
मंत्र आमतौर पर “ॐ देवी घटस्थापना-मंत्र” अथवा “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” आदि उच्चारित किए जाते हैं।
माता की आरती के शब्द इस तरह हो सकते हैं:
“जय देवि जय देवि जय जय देवि मतजे, नमस्ते माता जय जय माता मतजे” (यह एक सामान्य आरती का प्रारूप है, क्षेत्रीय भिन्नताएँ हो सकती हैं)।
