आभा सिन्हा, पटना
भारतवर्ष को शक्ति की भूमि कहा गया है। यहाँ आदिकाल से ही देवी के अनेक रूपों की उपासना होती रही है। देवी महात्म्य और शक्ति पुराण के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में स्वयं का आहुति दी, तो भगवान शिव दुःख में उनकी देह को लेकर विचरण करने लगे। उसी समय भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती की देह को खंड-खंड कर दिया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों का उद्भव हुआ। इन्हीं में से एक पवित्र स्थान है “त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ”, जो त्रिपुरा राज्य के उदयपुर के समीप राधाकिशोरपुर गाँव में ‘माताबाड़ी’ के नाम से विख्यात है। माना जाता है कि यहाँ माता का दायाँ पैर गिरा था। इस स्थल की अधिष्ठात्री शक्ति त्रिपुर सुंदरी कहलाती हैं और यहाँ के भैरव त्रिपुरेश हैं। यह धाम न केवल त्रिपुरा की पहचान है, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष और विश्व के शाक्त अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है।
त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर उदयपुर (पूर्व नाम राधाकिशोरपुर) में स्थित है। यह स्थान ‘माताबाड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि 1501 ईस्वी में त्रिपुरा के महाराजा धर्मा माणिक्य ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर एक छोटे से पहाड़ी टीले पर स्थित है और यहाँ से उदयपुर शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। त्रिपुरा का यह क्षेत्र प्राचीनकाल से ही तंत्र साधना, शक्ति उपासना और देवी की आराधना का केंद्र रहा है। अनेक तांत्रिक और सिद्ध योगी यहाँ आकर साधना करते रहे हैं।
त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ को देवी त्रिपुरेश्वरी, राजराजेश्वरी और माताबाड़ी नामों से भी जाना जाता है। देवी का यह स्वरूप शाक्त, शैव और वैष्णव परंपराओं में समान रूप से पूजनीय है। त्रिपुर सुंदरी शक्ति, सौंदर्य और करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ देवी की मूर्ति काले कस्तूरी पत्थर से बनी हुई है और इसका स्वरूप अत्यंत मनमोहक है। त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमा 5 फीट ऊँची है, जिसमें देवी को चरणों में गिरी हुई महिषासुर पर आसीन दिखाया गया है।
त्रिपुर सुंदरी मंदिर त्रिपुरा के प्राचीन वास्तुशिल्प का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का आकार त्रिकोणाकार है, जो माँ के यंत्र का प्रतीक माना जाता है। मंदिर के शिखर पर सुनहरी कलश स्थापित है। गर्भगृह में देवी की प्रतिमा स्थित है और भक्त चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मंदिर के परिसर में एक विशाल कालीसागर तालाब है, जिसमें हजारों कछुए पाए जाते हैं। भक्त यहाँ आकर कछुओं को भोजन कराते हैं, जिसे पुण्यकारी माना जाता है।
शक्ति परंपरा के अनुसार, प्रत्येक शक्तिपीठ में एक शक्ति और उनके साथ एक भैरव का निवास होता है। यहाँ की शक्ति है त्रिपुर सुंदरी, जो परम सौंदर्य, शक्ति और आनंद की अधिष्ठात्री मानी जाती है। यहाँ के भैरव हैं त्रिपुरेश, जो मंदिर की रक्षा करते हैं और साधकों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को विभाजित किया, तो माता का दाहिना पैर यहाँ गिरा। तभी से यह स्थल शक्तिपीठ बन गया है। कहा जाता है कि त्रिपुरा के महाराजा ने देवी के आदेश से मंदिर बनवाया। जब निर्माण कार्य पूरा हुआ, तो लोगों ने इसे माँ का घर अर्थात माताबाड़ी कहना शुरू कर दिया। आज भी स्थानीय लोग देवी को घर की माता की तरह पूजते हैं। माना जाता है कि मंदिर परिसर के समीप स्थित तालाब में कभी राक्षसों का निवास था। माता ने उन्हें पराजित कर इस तालाब को शुद्ध किया। तभी से यहाँ कछुआ पवित्र माना जाता है और भक्त उन्हें अन्न खिलाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
त्रिपुर सुंदरी मंदिर तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। देवी त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या साधना का मूल स्वरूप हैं। तंत्र शास्त्र में त्रिपुर सुंदरी को ‘श्रीविद्या महात्रिपुरसुंदरी’ कहा गया है। साधक यहाँ ‘श्रीचक्र’ की आराधना करते हैं। दीपावली के समय विशेष तांत्रिक पूजा आयोजित की जाती है।
दीपावली पर यहाँ विशाल मेला लगता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से माता के दर्शन करने आते हैं। तंत्र साधना करने वाले साधकों के लिए यह अवसर विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष अनुष्ठान होता है। भक्तजन नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं। मकर संक्रांति, होली, और वैशाख मास में भी मंदिर में विशेष आयोजन होता है।
त्रिपुर सुंदरी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि त्रिपुरा की संस्कृति और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहाँ के लोकगीतों और कथाओं में देवी का वर्णन मिलता है। मंदिर के मेले स्थानीय हस्तशिल्प और कला के प्रचार का केंद्र होता है। लोकनृत्यों और धार्मिक आयोजनों में देवी की स्तुति अनिवार्य होती है।
त्रिपुर सुंदरी साधना करने वालों के लिए ‘मूलाधार से सहस्रार तक’ ऊर्जा जागरण की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। साधक मानते हैं कि माता त्रिपुर सुंदरी तीनों लोकों को अपने सौंदर्य और शक्ति से मोहित करती हैं। योग और तंत्र में उन्हें ‘कुंडलिनी शक्ति’ के रूप में पूजते हैं। वे भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं और आत्मज्ञान प्रदान करती हैं।
आज भी त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। त्रिपुरा सरकार और स्थानीय प्रशासन ने यहाँ तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएँ विकसित की हैं। मंदिर के पास आवास, श्रद्धालु गृह और भोजनालय की व्यवस्था है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह मंदिर शाक्त उपासना का प्रतीक बन चुका है।
त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ न केवल त्रिपुरा की पहचान है, बल्कि यह संपूर्ण भारत की शक्ति परंपरा का अभिन्न अंग है। यहाँ माता का आशीर्वाद प्राप्त करने से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं और आत्मिक शांति मिलती है। यह स्थान इतिहास, संस्कृति, वास्तुकला और आध्यात्मिक साधना का संगम है। इसलिए इसे ‘त्रिपुरा का हृदय’ भी कहा जा सकता है।
