भारत दुनिया की उन कुछ प्राचीनतम सभ्यताओं में से है जिसने समय का हर उतार–चढ़ाव देखा है, सहा है और फिर भी जीवित रही है, लेकिन जीवित रहना और अपनी मूल आत्मा के साथ जीवित रहना दोनों भिन्न बातें हैं। भारत का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता का नहीं था, बल्कि उससे कहीं गहरा सांस्कृतिक, भाषिक, सभ्यतागत और स्वत्व की रक्षा का संघर्ष था।
मुगलों ने तलवार के बल पर शासन किया, अंग्रेज़ों ने बंदूकें, कानून और शिक्षा तंत्र के माध्यम से मन को जीता, और दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद, भारत की आत्मा पर तीसरी चोट आई, एक स्वघोषित सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा, जिसने कलम और वाद का प्रयोग कर भारत की पहचान को ही धुँधला करने का प्रयास किया।
आज जब देश में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का अभियान चल रहा है, चाहे वह सड़कों के नाम बदलना हो, संस्थानों का पुनर्रचना, इतिहास का पुनर्पाठ, या संस्कृति की पुनर्स्थापना। यह केवल प्रतीकात्मक परिवर्तन नहीं है, बल्कि स्वत्व की वापसी का ऐतिहासिक क्षण है।
मुगलों का शासन केवल राजनीतिक कब्जा नहीं था। वह एक सांस्कृतिक अधिरचना की स्थापना थी, जिसके माध्यम से मंदिरों का विध्वंस, जबरन धार्मिक परिवर्तन, सांस्कृतिक प्रतीकों का अपमान, स्थानीय भाषाओं पर ऊपरी भाषायी संरचना का वर्चस्व और प्राचीन साहित्यकारों, कवियों का उपेक्षण, परिणामस्वरूप भारतीय समाज की धड़कन टूटने लगी।
अकबर, भारतीय इतिहास लेखन का सर्वप्रिय पात्र बना, लेकिन क्यों? क्योंकि जो इतिहास दरबारों में लिखा गया, वह शासन की सुविधा के अनुसार लिखा गया। राजपूत वीरता, हिंदू प्रतिरोध, स्थानीय जन-आंदोलन, यह सब सीमित कर दिया गया। मुगलकाल में इतिहास सत्ता का ग्रंथ बना, समाज का नहीं।
मुगलों ने केवल मंदिर नहीं तोड़े बल्कि उन्होंने मानसिक संरचना भी तोड़ी। हमारी तिथियाँ बदलीं। समय गणना बदली। त्योहारों पर प्रतिबंध लगाए गए। कला को ‘इस्लामीकरण’ के साँचे में ढाला गया। भारत की आत्मा पर यह पहला बड़ी चोट थी।
अंग्रेजों ने जब भारत पर कब्जा किया तो उन्होंने समझ लिया था कि “भारत को तलवार से नहीं, दिमाग से जीता जा सकता है।” और फिर शुरू हुआ ब्रेन इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा प्रयोग। मैकाले का लक्ष्य साफ था “ऐसे मानसिक गुलाम तैयार करो जो रंग से भारतीय हों, लेकिन सोच से अंग्रेज़।” परिणाम हुआ भारतीय आत्मविश्वास का ह्रास। अंग्रेजी को श्रेष्ठता की भाषा बना देना। भारतीय भाषाओं को पिछड़ा घोषित करना। पढ़े-लिखे वर्ग को ब्रिटिश नीतियों का वाहक बनाना। इस शिक्षा नीति ने भारत के सबसे प्रतिभाशाली मस्तिष्कों को औपनिवेशिक मानसिकता का गुलाम बना दिया।
अंग्रेजों ने दुनिया के सामने भारत का ऐसा चित्र बनाया कि भारत अवैज्ञानिक है। भारत गैर-तार्किक है। भारतीय धर्म ‘अतार्किक’ हैं और भारतीय समाज पिछड़ा है। यह छवि इतनी प्रबल थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का असली ज्ञान हाशिये पर चला गया।
अंग्रेजों ने इतिहास को तीन खंडों में बाँटा पहला हिंदू काल, दूसरा मुस्लिम काल और तीसरा ब्रिटिश काल। और उन्होंने स्वयं को 'सभ्यता' का वाहक बताया। उन्होंने यह नहीं बताया कि भारत एक निरंतर सभ्यता है, जिसका कोई ‘अंधकार युग’ नहीं था। भारत का इतिहास फिर से सत्ता के अनुसार गढ़ा गया।
मुगल और अंग्रेज विदेशी थे, लेकिन तीसरा हमला भीतर से हुआ। कुछ बुद्धिजीवी वर्ग ने पश्चिमी चश्मे को ही ज्ञान का आधार मान लिया। उन्होंने परंपरा को पिछड़ा घोषित किया। संस्कृति को साम्प्रदायिक बताया। धर्म को ‘अंधविश्वास’ कहा। पुरातन ग्रंथों को कूड़ा करार दिया। ‘भारत’ शब्द को भी संकीर्ण बताने की कोशिश की। इस मानसिकता ने भारतीय समाज में आत्मद्वेष पैदा किया।
देश में एक ऐसी सेक्युलर परिभाषा थोपी गई जिसमें राम कहना कट्टरता, कृष्ण महज चरवाहा, शिव पौराणिक मिथक, भारत माता राष्ट्रवाद नहीं, ‘सांप्रदायिकता’, गाय संरक्षण पिछड़ेपन का प्रतीक और संस्कृत ‘ब्राह्मणवादी षड्यंत्र’। इस मानसिकता ने भारत को ही भारत से दूर कर दिया।
विश्वविद्यालयों में वह इतिहास पढ़ाया गया जो अंग्रेजों ने लिखा। मुगलों के दरबारों ने अनुमोदित किया और स्वतंत्र भारत के ‘विचारकों’ ने उसे सत्य मानकर आगे बढ़ाया। परिणाम स्वरूप सत्य का पूर्ण लोप। वेद, उपनिषद, पुराण, ज्योतिष, गणित, सब उपहास का विषय बना दिए गए।
स्वतंत्र भारत में एक लंबे समय तक साहित्यिक पुरस्कार, विश्वविद्यालय, ऐतिहासिक शोध, मीडिया कवरेज और सांस्कृतिक संस्थान, सब एक ही वैचारिक दिशा में बहते रहे। यह भारत की आत्मा के लिए सबसे गहरा घाव था, क्योंकि इस बार दमन तलवार या बंदूक से नहीं बल्कि कलम से हुआ।
पिछले वर्षों में देश में एक नई प्रक्रिया शुरू हुई है, एक राष्ट्रचेतना का पुनर्जागरण, जो केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक भी है। यह अभियान तीन स्तरों पर दिखाई देता है। पहला प्रतीकात्मक पुनर्स्थापना- सड़कों व भवनों के नाम। दूसरा सांस्कृतिक पुनर्जागरण- मंदिरों का पुनर्निर्माण, परंपराओं की पुनर्परिभाषा। और तीसरा ज्ञान परंपरा का पुनरुद्धार- नए शोध, वैदिक विज्ञान की पहचान, भारतीय भाषाओं का सम्मान।
नाम परिवर्तन प्रतीक नहीं, स्वत्व का महाआंदोलन है। लोक भवन- जनता का घर यानि शासन जनता के नाम पर नहीं, जनता के लिए। सेवा-तीर्थ- कर्तव्य को तीर्थ की तरह पवित्र माना जाना। कल्ल्याण मार्ग- मार्ग जो केवल यातायात का नहीं, बल्कि विचार का भी मार्ग है। कर्तव्यपथ- भारत का हृदय यानि जहाँ अंग्रेजों द्वारा निर्मित किंग्सवे अब इतिहास बन चुका है। यह परिवर्तन ‘राजनीतिक शासन’ से अधिक, मानसिक स्वतंत्रता का संकेत है। डॉ. कलाम मार्ग- अंग्रेजी लाट के नाम हटाकर भारत के वैज्ञानिकों और सनातन प्रेरणाओं को स्थान देना। यह नाम परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि “शब्द केवल शब्द नहीं होते, वह सभ्यता की आत्मा के दर्पण होते हैं।” जब आपकी गलियाँ, संस्थान, सड़कें, भवन आपकी संस्कृति के प्रतीक बनता है, तभी राष्ट्रस्वाभिमान पुनर्जीवित होता है।
अब भारत मुगलकाल को ‘स्वर्णयुग’ कहने की मजबूरी से मुक्त हो रहा है। अंग्रेजी शासन को ‘भला-चंगा सुधारक’ का दर्जा देने से इंकार कर रहा है। अपने नायकों को खोज रहा है। छुपाए गए संघर्षों को सामने ला रहा है। भूले-बिसरे वीरों का पुनः सम्मान कर रहा है। यह सिर्फ इतिहास का सुधार नहीं है बल्कि सभ्यता का पुनर्जन्म है।
गर्व से हिन्दी, संस्कृत, तमिल, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, कश्मीरी, मैथिली बोलने का दौर आया है। भारत समझ रहा है कि “भाषा ही विचार का घर होता है। जिसकी भाषा पर कब्ज़ा, उसकी सोच पर कब्ज़ा।”
स्वत्व का अर्थ है अपनी पहचान। अपनी जड़ें। अपना गौरव। अपनी सभ्यता। अपनी भाषा। अपना ज्ञान। अपना सत्य। स्वत्व खो देने वाला समाज, स्वतंत्र होकर भी पराधीन रहता है।
आज का संघर्ष है सही इतिहास बनाम विकृत इतिहास। संस्कृति बनाम उपहास। आत्मगौरव बनाम आत्मद्वेष। ज्ञान परंपरा बनाम नकली पश्चिमी श्रेष्ठताबोध। भारत अब इस वैचारिक संघर्ष में विजयी होने की राह पर है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा सबक है। उन्हें समझना होगा कि भारत केवल भौगोलिक भूभाग नहीं है बल्कि एक मूल्य प्रणाली है। संस्कृति केवल धर्म का अंग नहीं है बल्कि जीवनशैली है। इतिहास केवल तारीखों का संग्रह नहीं है बल्कि आत्मा की स्मृति है। भाषा केवल संप्रेषण नहीं है बल्कि चिंतन का आधार है। यदि यह बच गया तो भारत बचा रहेगा। यदि यह खो गया तो भारत केवल नक्शे में लिखा नाम रह जाएगा।
भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ मुगलों द्वारा दी गई तलवार का घाव, अंग्रेजों द्वारा दी गई मानसिक गुलामी और स्वतंत्र भारत में थोपे गए वैचारिक उपनिवेशवाद, तीनों के निशान मिटाया जा रहा है। नाम परिवर्तन, सांस्कृतिक पुनर्जीवन, इतिहास सुधार, यह सब मिलकर एक ही दिशा में जा रहा है। “भारत को भारत की ओर वापस ले जाना।” यह केवल सड़कों के नाम बदलने का काम नहीं है बल्कि यह स्वत्व की वापसी का महाअभियान है। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हम पहली बार अपनी ही आँखों से स्वयं को देखने की प्रक्रिया में हैं। यह यात्रा अभी जारी है और यह यात्रा ही भारत का वास्तविक नवजागरण है।
