आभा सिन्हा, पटना
भारत की आध्यात्मिक चेतना में शक्तिपीठ केवल मंदिर नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति के स्पंदन केंद्र माना गया है। यह वह स्थान है जहाँ देवी सती के अंग, आभूषण या रक्त की बूंदें गिरी थी, और पृथ्वी पर स्वयं शक्ति का अद्वितीय आविर्भाव हुआ था। इन्हीं 51 शक्तिपीठों में से एक है “भ्रामरी शक्तिपीठ”, जो महाराष्ट्र के नासिक नगर में पवित्र गोदावरी नदी घाटी के जनस्थान क्षेत्र में स्थित है।
यह वही स्थान है जहाँ मान्यता अनुसार, माता सती की ठोड़ी (चिबुक) गिरी थी, और यहाँ देवी का रूप भ्रामरी के नाम से विराजित है। इनके साथ भैरव रूप में विकृताक्ष की उपासना की जाती है।
नासिक की पौराणिक परंपरा, रामायण की कथाओं और गोदावरी की अध्यात्म-धारा से जुड़ा यह शक्तिपीठ भक्तों के लिए श्रद्धा, सिद्धि और संरक्षण का सर्वोच्च स्थल माना जाता है।
शक्तिपीठों की उत्पत्ति की कथा भारतीय पुराणों में अत्यंत विह्वल कर देने वाला प्रसंग है। जब दक्ष ने अपने यज्ञ में अपने ही दामाद भगवान शिव का अपमान किया और सती अपने पिता के घर अपमान सहकर अपने ही यज्ञकुंड में प्रवेश कर गईं, तब विश्व में ऐसा कंपन हुआ कि स्वयं भगवान शिव का रुद्र रूप प्रकट हो उठा। उन्होंने सती के दग्ध शरीर को उठाकर ब्रह्मांड में तांडव आरंभ किया। देवता भयभीत हुए। तब भगवान विष्णु ने ‘सुदर्शन चक्र’ से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुआ।
महाराष्ट्र का “भ्रामरी शक्तिपीठ” इसी श्रृंखला की एक अत्यंत शक्तिशाली कड़ी है, जहाँ माता की चिबुक (ठोड़ी) गिरी थी।
पुराणों में इस शक्तिपीठ का वर्णन मिलता है। यह स्थान नासिक के जनस्थान क्षेत्र में स्थित है, जो रामायण काल में पवित्र तपोभूमि और दैत्यों के नाश का स्थल रहा है। भ्रामरी नाम का अर्थ ही है, भ्रमर (मधुमक्खियों) से घिरी हुई, भयंकर असुरों को नाश करने वाली और मधुर, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड शक्ति का रूप। माता की ठोड़ी गिरने से इस क्षेत्र में सौम्यता और तीक्ष्णता, दोनों का अद्भुत संगम माना जाता है।
देवी का यह रूप ‘देवी भागवत’, ‘तंत्रचूड़ामणि’ और ‘कालिका पुराण’ में विस्तृत रूप से बताया गया है। भ्रमर स्वरूपा देवी- जो अनगिनत मधुमक्खियों के समान शक्तिरूपी कम्पन से असुरों का नाश करती हैं। मधुपान की देवी- जिनके स्पर्श से चेतना में मिठास, शांति और आह्लाद का संचार होता है। तांत्रिक ऊर्जा का केंद्र- जो साधकों को मनोबल, तेज, आध्यात्मिक जागरण और कुंडलिनी शक्ति प्रदान करती हैं। रक्षा-शक्ति- जिनके स्वर के कंपन से विषैले तत्व, नकारात्मक शक्तियाँ और रोग दूर होते हैं।
जनस्थान वह भूमि है जहाँ भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने दीर्घ समय व्यतीत किया था। जहाँ खर-दूषण के अत्याचार समाप्त हुए थे। जहाँ सीता-हरण का प्रसंग घटित हुआ था। गोदावरी की शांत धारा और नासिक के पर्वत इस क्षेत्र को आज भी दिव्य स्पंदन प्रदान करती हैं।
नासिक का नाम ‘नासिका’ प्रसंग से जुड़ा है, जहाँ लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। गोदावरी भारत की ‘दक्षिण गंगा’ कही जाती है। इस नदी का पौराणिक एवं सांस्कृतिक महत्व अपरंपार है। “भ्रामरी शक्तिपीठ” इसी गोदावरी तट पर स्थित होने से जल-ऊर्जा और शक्ति का समेकित केंद्र माना जाता है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप कई बार निर्मित और जीर्णोद्धार किया गया है। नासिक में होने वाले कुंभ के समय यहाँ विशेष श्रद्धालु आते हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह स्थान आदिकालीन है और युगों-युगों से साधना का केंद्र रहा है।
भैरव यहाँ विकृताक्ष यानि ‘बड़े नेत्रों वाले’ रूप में माने जाते हैं। यह भ्रामरी देवी के रक्षक, स्वामी और ऊर्जा-संतुलक हैं। भैरव उपासना से साधक निर्भय होता है। मन की नकारात्मकता दूर होती है और तंत्र ऊर्जा में प्रगति मिलती है।
“भ्रामरी शक्तिपीठ” में विशेष रूप से नींबू, हल्दी, काला तिल, गुड़ और मधु (शहद) अर्पित किया जाता है। इन तत्वों का संबंध भ्रमर ऊर्जा और विषहरण शक्ति से है। भ्रामरी देवी का सीधा संबंध व्याघ्र शक्ति,विषहरण तंत्र, मन और प्राण की कंपन ऊर्जा, भ्रमर नाद योग से माना जाता है। योग में ‘भ्रामरी प्राणायाम’ इसी देवी से प्रेरित है। इससे मानसिक तनाव दूर होता है। ध्यान जाग्रत होता है। नाड़ी शुद्धि होती है और तीसरे नेत्र की सक्रियता होती है।
कथा है कि किसी समय दानव वृष को मारने के लिए देवी ने अपने शरीर से हजारों भ्रमर उत्पन्न किए और उसे नष्ट किया। इसी कारण से वे विष, रोग, नकारात्मक शक्ति और भय को मिटाने वाली मानी जाती हैं। नासिक क्षेत्र में विष-उपचार करने वाले कई परंपरागत लोग भ्रामरी देवी की उपासना करना अनिवार्य मानते हैं।
भक्त मानते हैं कि यहाँ मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। भय और मानसिक तनाव दूर होते हैं। घर-गृहस्थी में शांति आती है। शारीरिक रोगों से राहत मिलती है और साधक को सिद्धि प्राप्त होती है। स्थानीय वासियों के अनेक चमत्कारिक अनुभव इस बात के साक्षी हैं।
कई कहानियाँ यहाँ प्रचलित हैं। देवी द्वारा एक साधक को भ्रमरों से ढंककर उसकी रक्षा करना, रात में मंदिर क्षेत्र में दिव्य प्रकाश दिखाई देना और अकारण मधुमक्खियों का झुंड मंदिर की रक्षा करना, यह घटनाएँ इस स्थल की दिव्यता को और प्रबल करती हैं।
भ्रामरी शक्तिपीठ के अलावा नासिक में त्र्यंबकेश्वर, कालाराम मंदिर, सीता गुम्फा, पंचवटी, कपिल तीर्थ और रामकुंड जैसे महत्वपूर्ण धर्मस्थल हैं। यह नासिक को संपूर्ण धार्मिक नगर बनाता है।
तनावपूर्ण जीवन में भ्रामरी शक्ति मानसिक संतुलन, सकारात्मक ऊर्जा, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति का अद्भुत स्रोत बन सकता है। भ्रामरी प्राणायाम, देवी मंत्र और गोदावरी तट पर ध्यान करने से आध्यात्मिक अनुभव और गहन होता है।
भ्रामरी शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं है, यह ऊर्जा, श्रद्धा, तांत्रिक शक्ति, पौराणिक इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। माता की ठोड़ी गिरने से यह स्थान सौम्यता और शक्ति दोनों का केंद्र माना जाता है। जो भी प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के साथ भ्रामरी देवी की शरण में आता है, उसके जीवन में भय का नाश, रोगों से मुक्ति, मन की शांति, आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्णता अवश्य प्राप्त होती है।
