भारत जैसा विशाल लोकतंत्र जब-जब वैश्विक केंद्रों के निशाने पर आता है, तब उसके भीतर किसी अदृश्य शक्ति का हस्तक्षेप दिखाई देने लगता है। इतिहास उठाकर देखा जाए तो, जब-जब देश किसी बड़े राजनीतिक, आर्थिक या कूटनीतिक मोड़ पर खड़ा होता है, तभी कोई ऐसा विचित्र और असामान्य घटना-संयोग सामने आता है जो सिर्फ “संयोग” जैसा नहीं लगता है, बल्कि “संदिग्ध प्रयोग” की शक्ल लेने लगता है।
भारत एक उभरती महाशक्ति है। यह तथ्य न तो अमेरिका को अज्ञात है, न चीन को, न यूरोप को और न मध्य-पूर्व की शक्तियों को। लेकिन भारत की मजबूती तभी तक है जब तक उसका भीतरी ढांचा संतुलित है।
ध्यान देने वाली बात है कि भारत में बड़ी अस्थिरताएं कब पैदा होती हैं? जब कोई वैश्विक नेता भारत दौरे पर हो। जब भारत किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय करार के मुहाने पर हो। जब भारत विदेशी निवेश या रक्षा साझेदारी में चमक दिखा रहा हो। जब भारत अपनी घरेलू नीतियों में निर्णायक सुधार करने का संकेत दे रहा हो। जब भारत की शक्ति किसी प्रतिद्वंदी शक्ति के हितों को चोट पहुँचाती हो। यह पैटर्न इतना सीधा-सादा नहीं है कि उसे सतह से देखा जा सके, लेकिन इतना जटिल भी नहीं है कि इसे समझा न जा सके।
भारत एक खुला, लोकतांत्रिक और अत्यधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र है। यहां दबाव बनाने के लिए आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, कॉर्पोरेट और डिजिटल सभी रास्ते उपलब्ध हैं। यहां बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं। यहां विदेशी निवेश है। यहां मीडिया-धाराएँ हैं। यहां राजनीतिक असहमति है। यहां सामाजिक संवेदनशीलताएँ हैं। किसी भी बड़े वैश्विक खिलाड़ी के लिए यह पूरा भू-तंत्र एक “प्रेशर सिस्टम” की तरह काम करता है, जहाँ बस एक छोटा-सा धक्का भी हलात को विकराल बना सकता है।
जब डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर आए थे, पूरी दुनिया की नजर दिल्ली पर थी। भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी नई ऊंचाइयाँ छू रही थी। लेकिन उसी समय दिल्ली भयंकर दंगे में जल उठी। दंगा ऐसे समय शुरू हुआ जब भारत दुनिया के स्पॉटलाइट में था। ऐसा लगता था जैसे “किसी को” इस बात से दिक्कत है कि भारत-अमेरिका संबंधों को सकारात्मक संदेश मिले। इस आग में देश की राजनीतिक छवि को गहरा नुकसान हुआ। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस घटना को तुरंत उछाल दिया, प्रायः समन्वित रूप से। एक प्रश्न हर भारतीय के मन में उठना चाहिए कि क्या ऐसे “संयोग” किसी बड़े खेल का हिस्सा होता हैं?
भारत और रूस के रिश्तों में नया पुनर्जीवन आ रहा है। रूस-चीन समीकरण बदल रहा है और भारत इसके केंद्र में है। जब व्लादिमीर पुतिन दिल्ली आए, उसी समय एयरस्पेस में तकनीकी हाहाकार, रूट्स में अचानक बदलाव, उड़ानों पर प्रभाव और हवाई चेतावनी का माहौल। ऐसा लगा कि किसी अदृश्य शक्ति ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को “स्थिरता” का प्रमाणपत्र न मिले। जब दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही हो, तब भारत का स्थिर रहना कई देशों के लिए खतरा बनता है और इसीलिए, ऐसे समय में “हलात” अपने आप नहीं बिगड़ते हैं बल्कि उन्हें बिगाड़ा जाता है।
इंडिगो भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइन है। बाजार हिस्सेदारी 55% से ऊपर। हजारों उड़ानें। मिलियन्स यात्री। ऐसे समय में यदि इंडिगो अचानक किसी बड़े संकट, तकनीकी या ऑपरेशनल कुहासे में फंसता है तो यह सिर्फ एक एयरलाइन का संकट नहीं हो सकता है। यह भारत की घरेलू एविएशन स्थिरता पर हमला होता है। यह यात्रियों का भरोसा हिलाने की कोशिश होती है। यह विदेशी निवेशक को डराने की चाल होती है और यह सरकार को घुटनों पर लाने का दबाव तरीका भी हो सकता है।
आखिर ऐसा क्यों? क्योंकि एयरलाइंस सीधे-सीधे अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट दबाव की लेन में होती हैं। प्राइवेट एयरलाइंस की नीतिगत निर्भरता सरकार पर बहुत अधिक होती है। एयरलाइंस किसी भी देश की “इमेज” का वास्तविक चेहरा होती हैं। एयरलाइंस पर संकट का मतलब पूरे बाजार में तनाव होता है। एयरलाइंस “सॉफ्ट टारगेट” होती हैं। इसलिए, इंडिगो जैसी कंपनी का किसी बड़े खेल में मोहरा बनना बिल्कुल असंभव नहीं है।
आज भारत 5G और 6G टेक्नोलॉजी का केंद्र बनने की तैयारी में है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह भारतीय कंपनियों के हाथ में जा रहा है। ग्लोबल टेलीकॉम मार्केट में भारत का दखल बढ़ रहा है। डेटा-सुरक्षा का मुद्दा वैश्विक खुफिया तंत्र को प्रभावित करता है। ऐसे में यदि एयरटेल को डगमगाया जाए, तो भारत के नेटवर्क पर असर होगा। यदि जियो/रिलायंस पर प्रहार हो, तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर दबाव बनेगा। यदि इंडिगो को असंतुलित किया जाए, तो भारत की लॉजिस्टिक और छवि पर चोट लगेगी। याद रखना चाहिए कि कॉर्पोरेट युद्ध भी एक प्रकार का आधुनिक भू-राजनीतिक युद्ध होता है। आज कंपनियाँ राष्ट्र शक्ति का एक्सटेंशन बन चुकी हैं और राष्ट्र नियति भी कंपनियों के हाथों में बंधी दिखती है।
प्रश्न यह है कि आखिर भारत पर दबाव क्यों बढ़ाया जा रहा है? कारण स्पष्ट दिखता हैं कि भारत अब “खरीदार” नहीं, “निर्माता” बन रहा है और यह बदलाव कई देशों के हितों के खिलाफ है। भारत वैश्विक कूटनीति में “साइड रोल” से “मुख्य भूमिका” में आ रहा है और यह कई शक्तियों को असहज करता है। भारत की घरेलू नीतियों से विदेशी कॉर्पोरेट का नियंत्रण घट रहा है और इसे वे बर्दाश्त नहीं करते हैं। भारत अब “चाहिए तो चलेगा, नहीं तो भी चलेगा” वाले दौर में नहीं है बल्कि वह अपनी शर्तों पर फैसला ले रहा है। भारत की सैन्य और डिजिटल क्षमता बढ़ने से कई देशों का संतुलन बिगड़ता है और यह बिगड़ना उन्हें भयभीत करता है।
सरकारें तब घुटनों पर आती हैं जब उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो। जनता असंतुष्ट हो। मीडिया नकारात्मक हो। कॉर्पोरेट दबाव बढ़ जाए। अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल हो। विपक्ष आक्रामक हो और राष्ट्रीय स्तर पर अस्थिरता फैलाई जाए।
इंडिगो जैसी घटना, पुतिन-काल का हाहाकार, ट्रंप-युग का दंगा, यह सब मिलकर एक दबाव-तंत्र बनाता है। यह दबाव सरकार को नीतिगत रियायतें देने पर मजबूर कर सकता है। यह सरकार को अपने निर्णय बदलने पर बाध्य कर सकता है। यह सरकार की लोकप्रियता को कम कर सकता है।
भारत में एक प्रवृत्ति है जब हलात बिगड़ते हैं, जनता भावनाओं में बह जाती है। जब हलात और बिगड़ते हैं, तो सरकारी तंत्र भी दबाव में आ जाता है और यही वह समय होता है जब संयम की सबसे अधिक जरूरत होती है। क्योंकि भावनाएं निर्णय को प्रभावित करता है। निर्णय देश को प्रभावित करता है और देश का भविष्य वैश्विक समीकरणों को प्रभावित करता है। इसलिए, हलात बिगाड़ने वाले वही लोग होते हैं जिन्हें पता है कि जब भारत अस्थिर होता है, तब वे मजबूत होता है।
किसी भी घटना को संयोग कहना आसान होता है। लेकिन जब एक ही समय पर, एक ही प्रकार के, एक जैसे असर वाले, और एक जैसे संकेत देने वाले संकट बार-बार होता है तो संयोग की जगह संदेह होना स्वाभाविक हो जाता है। ऐसे देखा जाए तो यह भी संभव है कि वैश्विक या घरेलू शक्तियां भारत को किसी खास नीति, साझेदारी या आर्थिक ढांचे की ओर धकेलने के लिए यह प्रयोग कर रही हों। कॉर्पोरेट, कूटनीति और खुफिया तंत्र का संयुक्त खेल भी हो सकता है। भारत को 2030 तक रोकने की अंतरराष्ट्रीय नीति भी संभव हो सकता है। इसमें से कोई भी संभावना पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता है।
भारत आज दो रास्तों पर खड़ा है। एक ओर बढ़ते अवसर तो दूसरी ओर सुनियोजित बाधाएँ। इंडिगो इसका ट्रेलर हो सकता है। रिलायंस और एयरटेल संभवतः अगला अध्याय भी हो सकता है। दंगे, डिजिटल अशांति, एविएशन संकट, आर्थिक दबाव, यह सब “किसी” रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। भारत को संयम, समझदारी और सजगता की सबसे अधिक आवश्यकता आज है। क्योंकि भविष्य उसी का होगा जो हलातों को नियंत्रित करे, न कि हलातों द्वारा नियंत्रित हो।
भारत के हलात जब विकराल स्वरूप लेता है, तब केवल सरकार ही नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की परीक्षा होती है। इंडिगो हो या कोई और, घटनाएँ अपने आप में संदेश देती हैं कि भारत अब वैश्विक समीकरणों के केंद्र में बैठा है और केंद्र में बैठने वाले देशों को अक्सर सबसे तेज़ आंधियाँ झेलनी पड़ती हैं, लेकिन जो देश इन आंधियों में भी स्थिर रहता हैं उसे ही इतिहास “महाशक्ति” कहता है।
