“चंद्रभागा शक्तिपीठ” (देवी सती का ‘उदर’ (पेट) गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना 


भारत की सनातन संस्कृति में शक्ति उपासना का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। माँ सती के अंगों के पृथ्वी पर गिरने से शक्ति के विभिन्न रूपों की उपासना के लिए 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई, जो आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए दिव्य स्थलों के रूप में पूजित हैं। इन्हीं पवित्र स्थानों में से एक है “चंद्रभागा शक्तिपीठ”, जो भारत के पश्चिमी छोर गुजरात के प्रभास क्षेत्र में अवस्थित है। यह वही प्रभास क्षेत्र है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर का त्याग किया था और जहाँ विश्वप्रसिद्ध सोमनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, “चंद्रभागा शक्तिपीठ” में देवी सती का ‘उदर’ (पेट) गिरा था। इसीलिए यहाँ माता को चंद्रभागा नाम से पुकारा जाता है। इस पीठ के भैरव वक्रतुंड कहे जाते हैं।

प्रभास क्षेत्र गुजरात के जूनागढ़ जिला अंतर्गत है और वेरावल रेलवे स्टेशन से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान समुद्र तट के निकट है, जहाँ अरब सागर की लहरें सनातन संस्कृति की सहस्राब्दियों पुरानी धरोहर को स्पर्श करती प्रतीत होती हैं। प्रभास क्षेत्र तीन बातों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। पहला सोमनाथ मंदिर, दूसरा चंद्रभागा शक्तिपीठ और तीसरा श्रीकृष्ण का देहत्याग स्थल।

प्रभास क्षेत्र को "त्रिवेणी संगम" भी कहा गया है। एक ऐसा संगम जहाँ तीन पवित्र नदियाँ (सरस्वती, हिरण और कपिला) भूमिगत रूप से मिलकर समुद्र में प्रवेश करती हैं।

यह पीठ सोमनाथ मंदिर से अधिक दूरी पर नहीं है। कई श्रद्धालु पहले सोमनाथ के दर्शन करते हैं और फिर माता चंद्रभागा की पूजा करने पहुँचते हैं। मार्ग सुगम है और यह क्षेत्र अत्यंत विकसित तीर्थों में से एक माना जाता है।

सती ने जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर देह त्याग किया, तब भगवान शिव ने उसका शरीर उठाकर ब्रह्मांड भर में विलाप के साथ भ्रमण किया। देवताओं ने शिव के दुःख को शांत करने और ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु से सहायता मांगी। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर दिया। यही अंग भारत के विभिन्न भागों में जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।

‘उदर’ शब्द शरीर के उस स्थान को दर्शाता है जहाँ से ऊर्जा, पोषण और जीवन का संवर्धन होता है। इसलिए “चंद्रभागा शक्तिपीठ” पोषण, मातृत्व, समृद्धि और जीवनशक्ति का प्रतीक माना जाता है। ‘चंद्रभागा’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला चंद्र- शीतलता, सौम्यता, मन, शांति और दूसरा भागा- तेज, उर्जा, शक्ति, प्रखरता। इस प्रकार चंद्रभागा के रूप में देवी शक्ति, सौम्यता और शक्ति दोनों की धारक मानी जाती हैं।

प्रत्येक शक्तिपीठ के साथ एक भैरव विराजते हैं जो उस शक्ति स्वरूप की रक्षा करते हैं। यहाँ के भैरव को वक्रतुंड कहते हैं। "वक्रतुंड" का अर्थ है वक्र (मुड़े हुए) और तुंड (सूंड/मुख)। भैरव का यह रूप ऐसे प्रदर्शित किया गया है जैसे वे सभी नकारात्मक शक्तियों, दुष्ट प्रवृत्तियों और बाधाओं को अपनी शक्ति से घेरकर समाप्त कर देते हों।

प्रभास क्षेत्र का इतिहास वैदिक युग जितना पुराना माना जाता है। पुराणों में यह क्षेत्र "तीर्थराज" कहलाता है। यहाँ सोमराज ने चंद्रमा देव को जीवनदान दिया था। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अपना अंतिम समय बिताया था। यह क्षेत्र बार-बार विदेशी आक्रमणों का लक्ष्य रहा था, लेकिन हर बार सोमनाथ और आसपास के मंदिरों ने पुनर्निर्माण कर शक्ति और श्रद्धा का संदेश दिया है। इसी पवित्र धरती पर चंद्रभागा शक्तिपीठ की स्थापना श्रद्धालुओं को यह अहसास कराती है कि शक्ति का भाव इतिहास के किसी भी उतार-चढ़ाव में नष्ट नहीं होता है।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग और चंद्रभागा शक्तिपीठ एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। शिव के रूप में सोमनाथ और शक्ति के रूप में चंद्रभागा। शिव और शक्ति का यह दिव्य संयुक्त रूप पूरे क्षेत्र को अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

मंदिर गुजरात की पारंपरिक नागर शैली में बना हुआ है। मुख्य विशेषताएँ हैं शिखर ऊँचा और स्थापत्य कला से युक्त, गर्भगृह छोटा लेकिन अत्यंत दिव्य, चारों ओर खुला वातावरण, समुद्री हवा का स्पर्श और परिसर में छोटे-छोटे मंदिर, देवी का रूप सौम्यता और करुणा से भरा हुआ प्रतीत होता है।



यहाँ प्रतिदिन सुबह और शाम के आरती समय को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मुख्य पूजा है चंद्रभागा देवी का श्रृंगार, रात्रि में दीपदान, भैरव वक्रतुंड का अभिषेक और नवचंडी पाठ (विशेष अवसरों पर)। श्रद्धालु देवी के सामने धूप दीप अर्पित कर मनोकामना करते हैं। यहाँ नवरात्र के नौ दिनों में देवी का विशेष श्रृंगार, दुर्गापाठ और गरबा नृत्य का आयोजन होता है। सावन में सोमनाथ आने वाले शिव भक्त यहाँ भी दर्शन करते हैं।चैत्र पूर्णिमा और शारदीय पूर्णिमा को देवी के दर्शन के लिए विशेष दिन माना जाता है। 

सती का उदर यहाँ गिरा था, इसलिए इस पीठ को मातृत्व का प्रतीक भी माना जाता है। देवी चंद्रभागा जीवन को पोषण देने वाली, संसार को ऊर्जा देने वाली, मन को शीतलता प्रदान करने वाली और भक्तों की समस्याओं को अपने में समाहित कर उन्हें हल करने वाली है। शास्त्रों में कहा गया है कि क्षुधा-तृष्णा-विकार-दुःखौः नाशयति चंद्रभागा। यानि जीवन की पीड़ाएँ, भूख-प्यास जैसी मूलभूत कठिनाइयाँ और मानसिक विकार यहाँ देवी की कृपा से मिटता है। देवी के स्मरण से मन शांत होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। चिंताओं में कमी आती है और आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव होता है।

पुराणों में उल्लेख है कि जब यदुवंश के विनाश के बाद भगवान कृष्ण प्रभास क्षेत्र में बैठे थे, तब उन्हें एक शिकारी के बाण से चोट लगी। यहीं पर उन्होंने अपना देह त्यागकर अपने धाम गमन किया। ऐसी मान्यता है कि उस समय प्रभास क्षेत्र में देवत्व की ऊर्जा का प्रवाह अत्यंत बढ़ गया था, और चंद्रभागा शक्तिपीठ भी इसी ऊर्जा की धारा का केंद्र बना।

सोमनाथ मंदिर के निर्माण से भी पहले इस क्षेत्र में सोमराज (चंद्रमा देव) ने तप किया था। कहा जाता है कि देवी चंद्रभागा की कृपा से ही सोमराज को रोगमुक्ति और तेज पुनः प्राप्त हुआ था।

“चंद्रभागा शक्तिपीठ” के आस-पास दर्शनीय स्थल हैं- सोमनाथ मंदिर, त्रिवेणी संगम, भीमरथ, गोलोक तीर्थस्थान, गीता मंदिर, बालाजी मंदिर और सरस्वती उद्गम स्थल। अधिकांश श्रद्धालु बताते हैं कि यहाँ की शांति अवर्णनीय है। सोमनाथ की भव्यता और चंद्रभागा का आंतरिक आध्यात्म का अनोखा संगम मिलता है। समुद्री हवा और शक्ति स्थान का वातावरण मन को तुरंत शांत कर देता है। 

“चंद्रभागा शक्तिपीठ” में  उदर गिरा था, इसलिए यह स्थान सिखाता है कि “जो जीवन का पोषण करता है, वही सच्चा तपस्वी है।” अर्थात दूसरों की मदद करना, जीवनदायिनी प्रकृति की रक्षा करना और प्रेम और करुणा का प्रसार करना। उदर शक्ति का प्रतीक है रचनात्मकता, सृजन, संरक्षण और उन्नति। चंद्रभागा सिखाती हैं कि शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप विनाश में नहीं, बल्कि सृजन में है।

प्रभास क्षेत्र में निरंतर पुरातात्विक शोध कार्य होते रहे हैं। अनेक प्रमाण बताता हैं कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों से एक अत्यंत उन्नत आध्यात्मिक केंद्र रहा है। यदि चंद्रभागा शक्तिपीठ को विश्व स्तरीय आध्यात्मिक धरोहर के रूप में विकसित किया जाए तो यह गुजरात पर्यटन, भारत के सांस्कृतिक इतिहास और हिन्दू धर्म की शक्ति उपासना के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।

भक्तों का मानना है कि  “चंद्रभागा शक्तिपीठ” पर दर्शन करने से परिवारिक कलह शांत होता है। मनोविकार दूर होता है। प्रसन्नता और शांति बढ़ती है। संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती है और शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है। क्योंकि यहाँ उदर (मूल ऊर्जा केंद्र) की शक्ति का वास माना जाता है, इसलिए यह स्थान विशेष शक्तिपूर्ण माना जाता है।

“चंद्रभागा शक्तिपीठ” केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि पोषण, करुणा, ऊर्जा और पवित्रता का शक्तिपुंज है। यहाँ देवी चंद्रभागा अपने भक्तों को वह ऊर्जा प्रदान करती हैं जिसके बल पर जीवन में संघर्षों को सहजता से पार किया जा सके। यह स्थान इतिहास, पौराणिकता, भूगोल, अध्यात्म और दर्शन, सभी का अद्भुत मेल प्रस्तुत करता है। सोमनाथ की भव्यता और चंद्रभागा के सौम्य मातृत्व रूप का संगम प्रभास क्षेत्र को संसार में अद्वितीय तीर्थ बनाता है। भक्तों की आँखों में चमक, समुद्र की लहरों की मधुर गूंज और देवी चंद्रभागा की करुणा, सब मिलकर भक्त को ऐसा एहसास होता है कि वह स्वयं शक्ति की गोद में है।



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