वर्ष 2001 में आई फिल्म ‘नायक’ का वह संवाद आज अचानक बहुत प्रासंगिक लगने लगता है, जहाँ एक छोटी सी चूक को नजरअंदाज करने का परिणाम भविष्य में एक बड़े प्रहार के रूप में सामने आता है। तब वह संवाद सिनेमा के पर्दे तक सीमित था, लेकिन आज भारतीय विमानन क्षेत्र में जो कुछ घटित हुआ, उसने उस फिल्मी कल्पना को यथार्थ का स्वर दे दिया है। आमतौर पर जब हवाई यात्रा की बात करते हैं, तो एअर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसे नाम स्वतः ही जुबान पर आ जाता है। इसमें भी सबसे अधिक भरोसा और सबसे ज्यादा यात्रियों की पसंद इंडिगो रही है। सस्ती उड़ानें, समयपालन और व्यापक नेटवर्क ने उसे देश की सबसे बड़ी एयरलाइन बना दिया है। लेकिन बीते एक पखवाड़े में जिस तरह से इंडिगो और सरकार के बीच तनाव सामने आया है, उसने यह संकेत दे दिया है कि बाजार में केवल आकार और हिस्सेदारी ही सब कुछ नहीं होती है, बल्कि नीतियों, अनुशासन और राष्ट्रीय हितों के साथ तालमेल भी उतना ही जरूरी होता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय विमानन क्षेत्र में जबरदस्त विस्तार हुआ है। छोटे शहरों को जोड़ने की उड़ानें, क्षेत्रीय संपर्क योजना, नए हवाई अड्डों का निर्माण और यात्रियों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि। इन सबने भारत को दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एविएशन मार्केट्स में शामिल कर दिया है। इस विस्तार में निजी एयरलाइनों की भूमिका अहम रही है और इंडिगो इस कहानी का सबसे बड़ा पात्र बनकर उभरा है। लेकिन जब किसी एक कंपनी का दबदबा बहुत ज्यादा हो जाता है, तो कई बार वह स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगती है। यही वह मोड़ होता है, जहाँ सरकार और नियामकों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।
पिछले पखवाड़े में इंडिगो द्वारा लिए गए कुछ फैसलों और दिए गए बयानों को सरकार ने सीधे चुनौती के रूप में देखा है। चाहे वह स्लॉट आवंटन का मुद्दा हो, विदेशी लीज पर विमानों की संख्या हो या फिर कुछ नीतिगत निर्देशों को लेकर सार्वजनिक रूप से असहमति जताने का तरीका, इन सबने यह साफ कर दिया है कि टकराव केवल तकनीकी नहीं था, बल्कि यह वर्चस्व और नियंत्रण का प्रश्न बन चुका था। किसी भी संप्रभु देश में यह अपेक्षा की जाती है कि बड़ी कॉरपोरेट इकाइयाँ सरकार के साथ संवाद करें, बहस करें, लेकिन सार्वजनिक मंच से दबाव बनाने या ‘पंजा मारने’ की शैली अपनाना अक्सर उलटा पड़ जाता है। नरेन्द्र मोदी सरकार के संदर्भ में तो यह संभावना और भी कम होता है कि वह ऐसे दबाव को चुपचाप सह ले।
मंगलवार को सरकार द्वारा लिया गया फैसला इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह फैसला केवल इंडिगो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे विमानन क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा का स्वागत है, लेकिन मनमानी की नहीं। इसी फैसले के बाद शंख एयर, अल हिन्द एयर और फ्लाई एक्सप्रेस जैसे नए नाम अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया है। यह एयरलाइंस अब जल्द ही भारतीय आसमान में उड़ान भरने को तैयार हैं और आने वाले समय में उड़ानों का हिस्सा बनने जा रही हैं। यह महज संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सरकार एकाधिकार की स्थिति को तोड़कर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना चाहती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के किसी भी क्षेत्र में अगर एक या दो कंपनियाँ अत्यधिक प्रभावशाली हो जाती हैं, तो उपभोक्ताओं के विकल्प सीमित हो जाते हैं और नवाचार की गति धीमी पड़ जाती है। विमानन जैसे क्षेत्र में, जहाँ सुरक्षा, सेवा और कीमत तीनों का संतुलन बेहद जरूरी है, वहाँ विविध खिलाड़ियों की मौजूदगी अनिवार्य हो जाती है। शंख एयर, अल हिन्द एयर और फ्लाई एक्सप्रेस के आने से न केवल यात्रियों के पास अधिक विकल्प होंगे, बल्कि मौजूदा एयरलाइनों पर भी बेहतर सेवा और प्रतिस्पर्धी किराए देने का दबाव बनेगा।
यह भी समझना जरूरी है कि सरकार का यह कदम किसी एक कंपनी के खिलाफ प्रतिशोध नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक संतुलन की कोशिश है। एअर इंडिया के निजीकरण के बाद सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह खुद एयरलाइन चलाने के बजाय नियामक और सुविधा प्रदाता की भूमिका में रहना चाहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह बड़े खिलाड़ियों को खुली छूट दे देगी। नियम सबके लिए समान हैं और जो भी उसका उल्लंघन करेगा, उसे परिणाम भुगतने होंगे। इंडिगो का मामला इसी सिद्धांत की परीक्षा बन गया है।
कहा जाता है कि भारत में सरकारें कॉरपोरेट दबाव में झुक जाती हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कई उदाहरण सामने आया है जहाँ नरेन्द्र मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय हित और नीति अनुशासन से कोई समझौता नहीं होगा। चाहे वह टेलीकॉम सेक्टर हो, बैंकिंग हो या अब विमानन। हर जगह यह संदेश गया है कि बाजार बड़ा हो सकता है, लेकिन कानून उससे भी बड़ा है। इंडिगो के मामले में भी यही हुआ है। सरकार ने संकेत दे दिया है कि अगर आप सहयोग की भाषा समझते हैं, तो आपका स्वागत है, लेकिन अगर आप दबाव की राजनीति करेंगे, तो विकल्प तैयार हैं।
शंख एयर, अल हिन्द एयर और फ्लाई एक्सप्रेस के नाम अपने आप में दिलचस्प हैं। यह नाम न केवल नए कॉरपोरेट ब्रांड हैं, बल्कि एक तरह से यह भी दर्शाता है कि भारतीय विमानन क्षेत्र अब केवल पश्चिमी या बहुराष्ट्रीय पहचान तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें से कुछ एयरलाइंस क्षेत्रीय और धार्मिक पर्यटन को ध्यान में रखकर अपनी सेवाएँ शुरू करने की योजना बना रही हैं, तो कुछ अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी पर फोकस कर रही हैं। इसका सीधा लाभ यात्रियों को मिलेगा, जिन्हें अब अपनी जरूरत और बजट के अनुसार ज्यादा विकल्प मिलेगा।
इस पूरे घटनाक्रम से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है, इरादे मजबूत हो तो हालात अपने आप रास्ता बना देता है। नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों पर चाहे जितनी बहस हो, लेकिन यह मानना पड़ेगा कि उसने कई क्षेत्रों में बड़े और साहसिक फैसले लेने से परहेज नहीं किया है। विमानन क्षेत्र में भी यह फैसला उसी कड़ी का हिस्सा है। सरकार ने यह दिखा दिया है कि वह किसी एक कंपनी के भरोसे पूरे सेक्टर को नहीं छोड़ेगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर नए खिलाड़ियों को मैदान में उतारने का रास्ता खोल देगी।
यात्रियों के दृष्टिकोण से देखें तो यह बदलाव लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकता है। आज भले ही इंडिगो सबसे ज्यादा उड़ानों का संचालन करती हो और सबसे ज्यादा यात्रियों को ढोती हो, लेकिन विकल्पों की कमी हमेशा एक जोखिम होती है। अगर किसी कारण से किसी एक एयरलाइन की सेवाएँ प्रभावित होती हैं, तो पूरा नेटवर्क चरमरा जाता है। नए खिलाड़ियों के आने से यह जोखिम कम होगा और सिस्टम अधिक लचीला बनेगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रतिस्पर्धा केवल किराए तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि सेवा की गुणवत्ता, समयपालन, ग्राहक अनुभव और नवाचार तक फैलती है। जब बाजार में चुनौती होती है, तो कंपनियाँ खुद को बेहतर बनाने के लिए मजबूर होती हैं। शंख एयर, अल हिन्द एयर और फ्लाई एक्सप्रेस की एंट्री इंडिगो और अन्य मौजूदा एयरलाइनों के लिए भी एक चेतावनी है कि अब उन्हें अपने यात्रियों को हल्के में लेने की गुंजाइश नहीं है।
यह पूरा घटनाक्रम यही सिखाता है कि लोकतंत्र और बाजार दोनों में संतुलन जरूरी है। न तो सरकार को मनमानी करनी चाहिए और न ही कंपनियों को। जब दोनों अपने-अपने दायरे में रहकर काम करते हैं, तभी व्यवस्था सुचारू रूप से चलती है। इंडिगो और सरकार के बीच हालिया टकराव इस संतुलन की याद दिलाने वाला उदाहरण बन गया है। यह एक तरह से चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी उन कंपनियों के लिए है जो खुद को अपराजेय समझने लगती हैं, और अवसर उन नए खिलाड़ियों के लिए है जो सही समय पर सही रणनीति के साथ मैदान में उतरने को तैयार हैं।
भविष्य में जब किसी हवाई अड्डे पर खड़े होकर फ्लाइट बोर्ड पर नजर डालेंगे और इंडिगो के साथ-साथ शंख एयर, अल हिन्द एयर या फ्लाई एक्सप्रेस का नाम देखेंगे, तो शायद यह पूरा घटनाक्रम याद आएगा। तब यह महसूस होगा कि बाजार केवल मांग और आपूर्ति से नहीं, बल्कि नीतियों, इरादों और दृढ़ निर्णयों से भी आकार लेता है।
